काश्मीर के पत्थरबाजों को खदेड़ने फेंकना होगा बिजली का झटका देने वाला रंगीन पानी

kashmir stone pelters pellet gun making india

काश्मीर की जो वर्तमान हालत है सच में चिन्ता की बात है. पाकिस्तान के दुष्प्रचार ने कश्मीरियों के जहन में देश की फौज और संविधान के प्रति जो जहर घोल दिया है, उसका असर है कि जब कभी सुरक्षा बल आतंकियों को घेरते हैं, तो स्थानीय नागरिक और छोटे बड़े बच्चे उनको बचाने  के लिए जवानों पर पत्थर फेंकने लगते हैं.

सुरक्षा बल इन पत्थरबाजों से निपटने के लिये ‘ पेलेट गन ‘ का उपयोग करते हैं. पर पेलट गन के छर्रों से कई किशोरों की आंखे चली गई. अनेक गंभीर रूप से घायल हो गए. आये दिन फायरिंग से किसी का मरना आम बात हो गई है. देश की उच्च अदालतों ने भी सलाह दी है कि ‘ पेलट गन ‘ के स्थान पर कोई अन्य विकल्प ढूँढने चाहिये. जिससे कम से कम हानि बच्चों को पहुंचे और सुरक्षा बलों का मिशन भी पूरा हो जाए.

मुझे याद है मध्य भारत राज्य के समय जब गोपीकृष्ण विजयवर्गीय मुख्य मंत्री थे, उस समय ग्वालियर में गोली काण्ड़ हुआ था. गोली काण्ड में ‘हरी सिंह ‘और ‘दर्शन सिंह’ नाम के दो छात्र शहीद होगए थे.

पूरे मघ्य भारत में मानो छात्र उपद्रवों की बाढ़ आ गई थी. जगह जगह नारे लगाए जा रहे थे , “छात्र एकता ज़िन्दाबाद”, ” जो हमसे टकरायेगा मिट्टी में मिल जाएगा” ,” हरी दर्शन ज़िन्दाबाद”. उस समय मैं आर्यसमाज स्कूल गुना में पांचवी कक्षा में पड़ता था.

यद्यपि छात्र आन्दोलन से हमारा कोई लेना देना नहीं था पर मुझे और मेरे छोटे छोटे सहपाठियों को पत्थर फेंककर सिपाहियों की टोपी पर निशाना लगाने में बहुत मजा आता था. इसी तरह जब उज्जैन के भूत मास्टर स्कूल फ्रीगंज में जब पढ़ता था, इन्दौर के हाईकोर्ट को जलाने के बाद छात्र आन्दोलन उज्जैन में भी पहुंचा था. तब किसी ने जबरन स्कूल की घन्टी बजाकर, सब लोग को चिल्लाते हुए फ्रीगंज के घण्टाघर पर पहुंचने का आह्वान किया था.

पुलिस वाले ड़ंडा फटकार कर हमारी ओर आते थे, तो हम लोग गलियों में इधर उधर छुप कर पत्थर फेंककर छुपा-छांई का खेल खेलने लगते थे. पुलिस के जवानों को अपनी जीभ निकाल कर चिढ़ाकर भाग जाते थे. हमें यह मालूम नहीं होता था हम क्यों पत्थर फेंककर मार रहे हैं. हमको किसने कहा था ,पत्थर मारने का. बस एक धुन थी सब लोग पत्थर मार रहे हैं चलो अपन भी निशाना तक लो.

आज लगभग 65 साल बाद जब मैं सोचता हूं कि मैंने उस पत्थरबाजी में क्यों भाग लिया? तो मेरे पास कोई तर्क पूर्ण उत्तर नहीं है. सिर्फ एक ही समाधान होता है “बालक बानर एक सुभाऊ “. और बन्दर की तरह उछल कूद करने की उम्र में कुछ साहसी, सामान्य से अलग हटकर कुछ नया करने की जिज्ञासा होती है , तो चलो ; पत्थर फेंककर ही मजा ले लें.

वैसे भी गाँव में जाकर अमियां और इमली तोड़ने के लिए बहुत पत्थर फेंकने का अभ्यास कर रखा था. गाँव की निशानेबाजी का प्रदर्शन करने का शहर में अच्छा मौका मिला तो आजमा लिया जाए.

हालांकि इस पत्थरवाजी की सजा उस समय मिली जब दो पुलिस वाले चांटे मारते हुए मुझे रोते हुए पकड़ कर हमारे हेड़मास्टर ‘सौभाग्यमल जी जैन ‘ के पास लाए. और फिर जो सौभाग्य मल जी जैन ने मेरे पुठ्टों पर स्केल से तड़ातड़ जो पिटाई की, वह आज भी याद आती है. पूरी 50 कान पकड़कर बैठकें लगवाई. सोचकर आज मुझे बहुत हंसी आती है, बचपन कैसा प्यारा होता है.

इससे यह बात तो बिल्कुल साफ है, बच्चे चाहे काश्मीर के हों या कहीं के भी हों. उनका स्वभाव और आचरण, उनकी इस उम्र में मेरे बचपन जैसा ही रहा होगा. अगर वह पत्थर फेंककर हमारे जवानों को निशाना बना रहे हैं, तो बच्चे तो निर्दोष हैं पर उन्हें उकसाने वाले देशद्रोही और अमन के दुश्मन हैं.

हमारी सेना पाकिस्तानी हत्यारे आतताईयों को पकड़ न सके इसके लिए भोले भाले बच्चों का इस्तेमाल किया जा रहा है. यह सरासर गलत है. यही कारण है कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी सलाह दी है कि पेलट गन के बजाय कोई अन्य विकल्प भी खोजा जाए.

मेरे विचार में काश्मीर में हुडदंगियों को तितर वितर करने के लिए निम्न तीन विकल्पों को आजमाकर देखना चाहिेए.

1) “क्रेंच ” की फली के निकाले गए पाऊडर से बम की तरह गोले बनाकर उपद्रवी भीड़ पर दागना चाहिए. क्रैंच की फली जंगलो में बहुतायत में मिलती है. यह जब त्वचा के सम्पर्क में आती है तो पूरे शरीर में खुजली होने लगती है.

यह खुजली नहाने या साबुन लगाने से भी नहीं मिटती. यह तीन चार घंटे तक तब तक चलती रहती है जब तक कि गोबर से रगड़ रगड़कर त्वचा को साफ न कर लिया जाए. क्रेंच की फली से उत्पन्न खुजली किसी भी ऐलोपैथिक दवाई से नहीं मिटती है. पीड़ित को इतनी भंयकर खुजली चलती है कि नाखूनों से खुजा खुजाकर पीड़ित की त्वचा से खून झलकने लगता है. इससे कोई मरता नहीं है और न कोई स्थाई शारीरिक विकृति होती है.

2) दंगाई भीड़ पर काबू पाने के लिए अक्सर वाटर केनन का उपयोग किया जाता है. यूगाण्ड़ा में पिन्क रंग डाल कर वाटर केनन का उपयोग किया गया. गुलाबी रंग गहरा गुलाबी था, इसे होली के अवसर पर “चमरिया” रंग भी कहते हैं. यह रंग अगर किसी पर पड़ जाए तो आसानी से नहीं छूटता. भीड़ तितर वितर करने के बाद उपद्रवियों की धड़ पकड करने में इससे बहुत मदद मिलती है.

3) अगर वाटर केनन के साथ अलग से पोरेटेबल अल्ट्रा हाईप्रेशर जेट पम्प का इस्तेमाल किया जाय, जिसकी की मार 100 मीटर तक की हो सकती है, इस पम्प के पानी के पोर्टेवल छोटे से टैंक में 500 वोल्ट 75 मिली एम्पीयर दस हजार हर्ट्ज़ की आवृति की बिजली की करेन्ट का इस्तेमाल किया जाए, जो दस जूल की सुरक्षित सीमा के भीतर होती है.

जब दंगाई भीड़ पर इस विद्युत आवेशित पानी की फुहार पड़ेगी तो व्यक्ति की मांस पेशियों में झटके लगने के साथ ऐसी ऐंठन अकड़न होने लगेगी कि भीड़ को उस स्थान से तितर बितर होकर सुरक्षित स्थान पर जाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचेगा. अश्रु गैस का उपयोग तो अब पुराना हो गया उससे बचकर और अश्रुगैस के उसी गोले को पुलिस पर फेंक देने का अभ्यास अब दंगाईयों ने सीख लिया है.

सुरक्षा कर्मियों को इस नए तरीके से दंगाईयों को भगाने का प्रयास करना चाहिए , हो सकता है सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY