हमारी संवेदना आपकी संवेदनहीनता से नहीं, हमारे हितों से प्रेरित हैं

नहीं, मुझे अलवर में किसी पहलू खान की मृत्यु दिखाई नहीं देती. इसलिए नहीं कि आपको डॉ नारंग को घर से खींच कर मार दिया जाना नहीं दिखाई दिया.

इसलिए भी नहीं कि आपको कश्मीर से लाखों हिंदुओं का पलायन और हज़ारों की हत्या और बलात्कार दिखाई नहीं दिया.

इसलिए भी नहीं कि आपको केरल में हर रोज स्वयंसेवकों की हत्या दिखाई नहीं देती… आपको गोधरा में बच्चों और औरतों का जिंदा जला दिया जाना दिखाई नहीं देता.

बस यूँ ही… अब मुझे बेकार की बातें दिखाई नहीं देतीं. किसी अहलु पहलू खान के जीने मरने से मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता… और यह बात मैं किसी गुस्से या कटुता से नहीं कह रहा..

मेरी संवेदना आपकी संवेदनहीनता से प्रेरित नहीं है. मेरी संवेदना हमारे हितों से प्रेरित हैं. उसके मरने से हमारा कोई नुकसान हुआ हो तो उसका हिसाब लगाओ, वरना दुनिया मे कितने अजलु फजलू मरते हैं… सब मेरे सगे नहीं लगते…

शक्ति का प्रयोग एंटीबायोटिक के कोर्स जैसा

शक्ति का प्रयोग एंटीबायोटिक के कोर्स जैसा होता है… या तो पूरी डोज का फुल कोर्स लो, या नहीं लो..

शक्ति का प्रयोग करो तो पूरी शक्ति से करो, या इंतज़ार करो. पंगे लो, एक थप्पड़ मारो और चार घूंसे खाओ… ऐसे पंगे मत ही लो. एक घूंसा भी मारो तो वह नॉक आउट पंच हो.

अलवर में गौ तस्कर की पिटाई और मौत पर मेरी आपत्ति है. मेरी आपत्ति नैतिक नहीं है, टैक्टिकल है. यह हिसाब लगाइये, इसका फायदा हुआ या नुकसान… समाज ने गौ तस्करों को सजा देने का मन बना लिया है तो इसमें कंसिस्टेंसी होनी चाहिए.

एक संदेश जाना चाहिए कि गौ तस्कर जहां भी मिलेगा, जिंदा नहीं बचेगा. यह प्रतिकार का तंत्र होना चाहिए, ना कि छिटपुट हिंसा की घटनाएँ.

यह नहीं होना चाहिए कि एक व्यक्ति या ग्रुप अपनी जान जोखिम में डाल कर गौ तस्करों को सजा दे और बाकी पूरा हिन्दू समाज इसकी निंदा करे और सक्रिय युवाओं का मनोबल तोड़े.

घूंसा पड़े तो जोर का पड़े और जबड़े पर पड़े… और दर्शक दीर्घा से तालियाँ गूँजे… नहीं तो इंतज़ार करो…

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