इतिहास के काले पन्ने का नाम है “तैमूर” : फिर भी कुछ लोग इसे पसन्द करते हैं!

एक “तैमूर” था, जो 17 दिसम्बर 1398 को दिल्ली आया था. उसने दिल्ली के एक लाख लोगों का कत्लेआम किया था. उसके फौजियों ने महिलाओं की खुले आम इज्जतें लूटी थी. पूरी दिल्ली को घेर कर खून खच्चर किया था. खून से गलियां भर गई थीं.

गैरमुस्लिम लोगों के सिर को धड़ से अलग करके नरमुंडों के जगह जगह ढेर लगा दिये थे. छोटे बच्चों को पकड़ कर उनके माँ बाप के सामने बच्चों के एक पैर को पैरों से दबाकर दूसरे पैर को हाथों से ऊपर खींचकर उनके शरीर को चीरकर टुकडे टुकडे करके जान से मार दिया गया था.

तैमूर ने जो तबाही मचाई थी उसकी कीमत दिल्ली ने अगले सौ सालों तक चुकाना पड़ी. इसी तैमूर का वंशज बाबर था, जिसने भारत में जगह जगह कत्लेआम करके देश की संस्कृति धरोहरों को नेस्ताबूद कर दिया. बाबर के जहरीले बीज बाबरी मस्जिद का नासूर आज भी भारत माता के सीने में जहरीला फोड़ा बना हुआ है.

वैसे, एक बहुत ही सोचनीय तर्कपूर्ण विचारणीय मुद्दा है. जब किसी के घर कोई लड़का या लड़की पैदा होती है, तो वह उसका नामकरण बहुत सोच समझ कर करता है. अच्छे से अच्छा नाम रखा जाता है. कभी कोई ऐसा नाम नहीं रखा जाता जिसमें अन्याय, अत्याचार, नृशंसता या राक्षसी प्रवृति की बू आती है.

माँ बाप चाहे किसी भी धर्म या सम्प्रदाय के अनुयायी हों कभी अपनी संतान का नाम राक्षस, डायन, भूतनी, शैतान, चोर, लुच्चा, लफंगा, खूनी, हत्यारा, या बलात्कारी के पर्यायवाची उद्बोधनों वाले नामों को कभी नहीं चुनेंगे.

“तैमूर” नाम के साथ एक ऐसे राक्षस का नाम जुड़ा है जो ‘रावण’ नाम से भी हजारों गुना अधिक कलंककारी है. इस नाम के साथ तैमूर की उस दैत्य की दुष्ट आत्मा की याद ताजा हो जाती है जो उस लुटेरे ने सन् 1398 में दिल्ली में एक लाख निर्दोष लोगों की तीन दिनों में हत्या की थी.

कहा तो यहाँ तक जाता है कि दिल्ली वासियों को तैमूर की सेना ने इतना तड़पा तड़पा कर प्रताड़ित किया था , कि लोगों को मरे हुए प्रिय जनों के अंगों को काटकर, जबरदस्ती पीडितों को कोडे मार मार कर खिलाया गया था. ऐसी हैवानियत का प्रतीक “तैमूर” नाम है. क्या मानवता के कलंक इस दैत्य के खूंखार कारनामों को इतिहास के काले पन्ने कभी भुला सकते हैं ? ………कदापि नहीं.

पर यह हमारे देश का दुर्भाग्य ही कहिये कि इतने “घिनौने” नाम से आज के कुछ लोगों को अभी भी प्रेम है. आश्चर्य है आज यह लोग अपने नौनिहाल का नाम “तैमूर” रख रहे हैं.  इसे किसी अनैतिक प्रेम का दुखद, प्रतिरूप फलक समझा जाए या तैमूर जंग की पुरानी राक्षसी आत्मा का आह्वान माना जाए, अथवा इन तैमूर के चहेते लोगों के अपने खुद के जींस में छुपी उसी दुष्ट आत्मा की स्मृति को जागृत करना माना जाए?

कैसी अजीब बिडम्बना की बात है , एक तरफ तो लोग हजारों मील दूर जाकर शैतान को पत्थर मारने की रस्म अदा करते हैं और दूसरी तरफ वही लोग अपने आँखों के तारे का नाम “शैतान का पर्यायवाची अर्थात तैमूर” रखते हैं.

(सन्दर्भ:-The battle took place on 17 December 1398. Sultan Nasir-ud-Din Mahmud Shah Tughluq and the army of Mallu Iqbal had war elephants armored with chain mail and poison on their tusks. As his Tatar forces were afraid of the elephants, Timur ordered his men to dig a trench in front of their positions. Timur then loaded his camels with as much wood and hay as they could carry. When the war elephants charged, Timur set the hay on fire and prodded the camels with iron sticks, causing them to charge at the elephants howling in pain: Timur had understood that elephants were easily panicked. Faced with the strange spectacle of camels flying straight at them with flames leaping from their backs, the elephants turned around and stampeded back toward their own lines. Timur capitalized on the subsequent disruption in the forces of Nasir-ud-Din Mahmud Shah Tughluq, securing an easy victory. Nasir-ud-Din Mahmud Shah Tughluq fled with remnants of his forces. Delhi was sacked and left in ruins. Before the battle for Delhi, Timur executed 100,000 captives.

The capture of the Delhi Sultanate was one of Timur’s horrible victories, arguably surpassing the likes of Alexander the Great and Genghis Khan because of the harsh conditions of the journey and the achievement of taking down one of the richest cities at the time. After Delhi fell to Timur’s army, uprisings by its citizens against the Turkic-Mongols began to occur, causing a bloody massacre within the city walls. After three days of citizens uprising within Delhi, it was said that the city reeked of the decomposing bodies of its citizens with their heads being erected like structures and the bodies left as food for the birds. Timur’s invasion and destruction of Delhi continued the chaos that was still consuming India, and the city would not be able to recover from the great loss it suffered for almost a century.)

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