शताब्दियों से हमारे विरोधियों को हमसे बेहतर आता है गाय को हथियार बनाना

क्या कारण है कि प्रशांत भूषण, श्री कृष्ण भगवान पर ओछी बात कह कर, निकल जाता है, केरल में हर हफ्ते वामपंथी, इस्लामी और चर्च का गिरोह, आरएसएस के हिन्दुओं को मार कर और मजबूत सेक्युलर होने निकल जाता है, फारुख अब्दुल्ला, भारतीय सेना पर पत्थरबाजी करने वाले कश्मीरी लौंडो की हौसला अफजाई करके निकल जाता है.

कश्मीर की एक क्रिकेट टीम पाकिस्तानी जर्सी पहन और उसका राष्ट्रगान गाकर निकल जाती है और पश्चिम बंगाल में हाईकोर्ट के आदेश पर रामनवमी होती है वहां ममता बनर्जी, बिना किसी शिकन के राइटर बिल्डिंग में बैठ कर बंगाल का इस्लामीकरण करने निकल जाती है?

यह सब इतने बड़े अक्षम्य अपराध करके इसलिए निकल जाते है क्योंकि इन्हें हिंदुओं में बिखराव की, उनकी अदूरदर्शिता और सेलेक्टिव मर्दानगी पर पूरा भरोसा होता है.

मुझे इस बात का बेहद कोफ़्त है कि यह सब, अब तक बिना किसी सज़ा को पाये निकलते आये हैं और आगे भी निकलते जाएंगे क्योंकि उन्हें हिंदुत्व के नाम पर ज्यादातर उबलने वाले नवरक्त की अदूरदर्शीता पर पूरा भरोसा होता है.

यह सब सेक्युलर तो अपने जुर्मों को दफना कर बच कर निकल जाएंगे, लेकिन अलवर के वह लड़के, जिन्होंने एक गाय के तस्कर को मारा है, वह अपराधियों के कठघरे में खड़े रह जाएंगे क्योंकि वह गाय का तस्कर, जिसका वैसे तो कोई धर्म नहीं होता है, वह एक मुसलमान बन गया है.

अब वह सब तमाम सेक्युलर, जो दशकों से राष्ट्रवादिता और हिंदुत्व के विरोध को अपना आधार बनाकर, लगातार हिंदुओं की भावनाओं, विशेष कर गायों के प्रति उनकी भावनाओं का खून करते आये है, वह आज, हमारी भावनाओं के खून के जुर्म की सज़ा पाने से रह जायेंगे.

यह इसलिए बच जायेंगे क्योंकि मुस्लिम शासकों और समुदाय द्वारा हिंदुओं की धार्मिक अस्मिता को कुचलने के लिए, शताब्दियों से की जा रही गायों की हत्या से उपजी हीन भावना ने, कुछ हिंदुओं से सड़क पर कानून हाथ में लेने की वैधानिक भूल करा दी है.

मुझे इन लड़कों की मूल भावना से तो हमदर्दी है लेकिन फिर भी उनसे कोई हमदर्दी नहीं है क्योंकि उनमें पनपी अदूरदर्शिता और विवेक शून्यता, राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की सम्पूर्णता की राह में बाधक है.

यह कैसा आक्रोश है जो उनमें सरफ़रोशी की तमन्ना तो जगाता है लेकिन उसकी हिंसक प्रतिक्रिया सिर्फ गाय तक सीमित होती है? यदि यह सरफ़रोशी की तमन्ना है तो फिर यह सिर्फ गाय के तस्कर पर ही क्यों गिरती है?

क्या यह इसलिए की वह एक आसान निशाना है? यदि इतनी ही भावनाएं आहत होती है तो फिर प्रशांत भूषण अभी तक ज़िंदा कैसे है? यदि इतना ही आक्रोश है तो फिर यह फारुख अब्दुल्ला अभी तक सांस क्यों ले रहा है? यदि सरफ़रोशी की तमन्ना इतने हिलोरे मार रही है तो फिर यह ममता के बंगाल में क्यों नहीं घुसता है? क्यों नही यह आक्रोश केरल में कटते हुए हिंदुओं के बदले प्रतिघात में कब्रों को भरता है?

यदि लोगो ने यहां सब जगह, अपने आक्रोश का हिसाब किताब रखने की जिम्मेदारी भारत की सरकार को दे रखी है तो गाय काटने और उसकी तस्करी करने वालो का भी हिसाब किताब रखने की जिम्मेदारी भी भारत की सरकार पर ही छोड़ना होगा.

मैं समझता हूँ कि यदि अस्त्र उठाने है और प्रतिघात करना है तो गाय को हथियार बनाना सबसे बड़ी भूल होगी क्योंकि गाय को हथियार बनाना, शताब्दियों से हमारे विरोधियों को हमसे अच्छी तरह आता है.

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