राम नवमी : होइहें वही जो राम रचि राखा

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जब जब मनुष्य के अन्दर प्रेम का प्रस्फुरण होता है तब तब परमात्मा किसी न किसी रूप में उस प्रेम का साक्षी बनकर प्रकट अवश्य होता है.

मुरारी बापू कहते हैं परमात्मा को प्राप्त करने की सारी कवायद ही निष्प्रयोजन है. परमात्मा तो प्राप्त ही है.  तुम आँखें बंद किये परमात्मा को प्रार्थना में पुकारते रहते हो. ज़रा आँखें खोल कर तो देखो हर जगह वही उपस्थित है.

तो दुनिया कृष्ण के मनोहारी रूप और उसकी सोलह कलाओं की दीवानी है, लेकिन पता नहीं क्यों मैंने बचपन से ही अपने ह्रदय में राम को विराजमान पाया है. वही मुझे प्राप्त रहा इसलिए कभी खोजा नहीं, बस जीवन यात्रा में मिलते अलग अलग लोगों में राम के दर्शन पाती रही…

इसलिए नहीं कि मेरे अन्दर सीता तत्व है, इसलिए क्योंकि मेरे अंदर वो धरती तत्व है जहां से सीता ने जन्म लिया, अहिल्या ने जिस पर श्राप भोगा, जहां से शबरी ने बेर तोड़, झूठे बेर राम को खिलाकर अपना सच्चा प्रेम न्योछावर किया और जिसकी अयोध्या से राम ने वनवास पाया और जब वे लौटे तो उसी अयोध्या ने दीपावली मनाई.

इस बार की ये जो राम नवमी है ये माँ के नौ रूपों को साक्षी मान नौ जन्मों तक की गयी तपस्या के बाद मिला आशीर्वाद है. जिसके अंतिम जन्म के कुछ वर्षों को ब्रह्माण्ड के हवन कुण्ड में अंतिम आहुति की तरह अर्पित करने को व्याकुल हूँ…

तो मैं अपने अन्दर के राम को संबोधित कर उस अंतिम आहुति के साथ बोले गए कुछ मन्त्रों को यहाँ संवाद रूप में प्रस्तुत  कर रही हूँ…

राम,
जब मैंने अपने किशोरवय में तुम्हें अपने प्रिय के रूप में देखा था, तो मुझ तक पहुँच सकने की पात्रता अर्जित न कर पाने की तुम्हारी पीड़ा को छुपाने के लिए तुम्हें देख मुस्कुराते हुए लौट आई थी, कहते हुए कि मैं एक बार फिर लौटूंगी इसी जन्म में उम्र के किसी और पड़ाव पर.

राम, मैं अब भी मुस्कुरा रही हूँ, पता है क्यों, क्योंकि ये वही मुस्कराहट है अपने आख़िरी शब्दों में ये कहते हुए जड़कर दी थी कि दुनिया बहुत बड़ी है. और तुमने मेरे सामने एक लक्ष्मण रेखा खींचते हुए कहा था देखो मेरी दुनिया अब बस यही है.

मैं अब भी मुस्कुरा रही हूँ पता है क्यों क्योंकि जब तुम अपनी सीमित दुनिया में रहते हुए बलिष्ठ भुजाओं की ताकत के बल पर नाज़ुक से कन्धों पर आनंद और परमानंद जैसे भारी शब्दों को उठाते हो तो उस मासूम से बच्चे की तरह लगते हो जो चाँद और सूरज को छूने की ख्वाहिश में कल्पनाओं के पंख लगाता है.

तुम उन पंखों को थकने मत देना जब भी निराशा की कोई किरण नज़र आए तुम झट से पलकें झपका लेना. तुम्हारी आँखों की चमक के छुपते ही आसमान से एक तारा टूटेगा और मैं टूटते तारे से ऊंची आवाज़ में दुआ करूंगी कि तुम्हें तुम्हारी दुनिया में जो आनंद मिल रहा है वो सदा तुम्हारे साथ रहे. और धीमी सी आवाज़ में दुआ करते हुए उस तारे को अपने ह्रदय के अनछुए हिस्से में छुपा लूंगी ये कहकर कि वो तुम्हारे मासूम दिल को दुनियावी दिमागों से महफूज़ रखें.

मैं अब भी मुस्कुरा रही हूँ, पता है क्यों क्योंकि तुम्हारी आँखों के कोनों से वो तारा टूट रहा है… मैं नहीं हूँ इस वक़्त वहां लेकिन मेरी दुआएं सदा तुम्हारे साथ है .. कि तुम्हें दुनिया भर का सुख और आनंद जो स्थूल रूप में दिखाई दे रहा है सदा छत्र-छाया बनकर तुम्हारे सिर पर रहे.

लेकिन काश तुम्हें मैं सिखा पाती इस छाया के बाहर का कड़ी धूप-सा जीवन…. लेकिन नहीं तुम्हारी लक्ष्मण रेखा के अन्दर तुम्हारी सुरक्षित सी प्रतीत होती दुनिया अभी हरी भरी है… उसके हरेपन को जी लो… फिर जीवन में कभी मिट्टी सा धूसर रंग दिखलाई पड़े तो याद कर लेना उस सूक्ष्म पीड़ा को भी जो मैंने तुम्हें उपहार में दी है क्योंकि जीवन के मुश्किल समय में ये पीड़ा बहुत संबल देती है…

मैं अब भी मुस्कुरा रही हूँ पता है क्यों क्योंकि तुम्हारे पास वो सबकुछ है जो तुमने चाहा, लेकिन एक वस्तु और है तुम्हारे पास… वो है मेरी न दिखाई देने वाली दुआ, जो सदा तुम्हारे चेहरे पर परछाई की तरह पड़ती रहेगी और फिर कोई तुमसे पूछेगा क्या तुम बेटे हो मेरे… जानती हूँ इस बार तुम भी ना कह दोगे… और मैं कहूंगी उम्र के फासले को तह करके छोटा कर लेने से या रिश्तों को टेड़ा-मेढ़ा करके समाज के बने बनाए सांचे में ढालकर प्रेम को परिभाषित किया जा सकता है तो इसे कोई भी नाम दे दो… मुझे चाहे माँ कह लो, बहन कह लो, या प्रेयसी….

चाहे जिस नाम से पुकार लो मैं इस नाम को ही राम-सेतू बनाकर, रिश्तों के समंदर को पार कर जाऊंगी और लोग प्रेम को द्विअर्थी संवाद वाले सन्देश बनाकर कुंठित होते रह जाएँगे. लेकिन तुम हमेशा याद रखना कुण्ठा के कोष्ठक खोले बिना जीवन के समीकरण हल नहीं होते.

क्योंकि एक बात मैं हमेशा याद रखती हूँ कि होइहें वही जो राम रचि राखा.

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