निर्मोही कृष्ण के कुरुक्षेत्र में आपका स्वागत है

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अगर महाभारत में कुरुक्षेत्र का युद्ध वास्तव में धर्म युद्ध होता तो?

तो पांडव विजयी नहीं हो सकते थे. कौरवों के पास विशाल सेना के साथ साथ, भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे अजेय योद्धा और रणनीतिकार थे. नेतृत्व की असीम क्षमताएं थी. अनेक वर थे अमोघ शक्तियां थी.

अगर युद्ध नीति सम्मत होता तो पांडवो की हार निश्चित थी. फिर पांडवो में युधिष्ठिर थे जो धर्म के विरुद्ध जाने नहीं देते. कौरवों के पास शक्ति थी, तंत्र था, सत्ता थी और षड्यंत्र भी था. उधर पांडवों के पास सिर्फ धर्म और कृष्ण.

कृष्ण का एक मात्र लक्ष्य अधर्म की सत्ता में परिवर्तन था, अब अगर युधिष्ठिर जैसे धर्म से बंधे व्यक्ति को लेकर युद्ध में उतरना हो तो जरुरी था कि युद्ध की नीति और नियम पहले शत्रु पक्ष तोड़े, फिर सम्भव था कि अजेय योद्धाओं के लिए कोई रणनीति रची जा सकती.

तो रणनीति रची गई अभिमन्यु वध की. जब सात महारथियों ने मिल कर वध किया एक बालक का. और बो लिया बीज अपने विनाश का, अब युद्ध की सब धर्म वर्जनाएं टूट गई थीं.

अब भीष्म के लिए शिखंडी आगमन हुआ. द्रोण के लिए अश्वत्थामा की मृत्यु का छद्म रचा गया. रथ से उतरे नि:शस्त्र कर्ण के लिए अर्जुन के बाण धर्म सम्मत बन चुके थे.

कोई भी युद्ध, धर्म की नीति, अब दुर्योधन की जंघा टूटने से नहीं बचा सकती थी. दु:शासन की छाती के रुधिर से धुल कर पांचाली के केश पुनः गरिमा को प्राप्त होने को आतुर थे.

कभी-कभी धर्म की स्थापना के लिए अधर्म की समिधा डालनी पड़ती है.

अब कृष्ण ईव टीजर थे या नहीं मैं इस मुद्दे पर कृष्ण का पक्ष नहीं लूंगा.

मैं नहीं समझता जन्माष्टमी पर झूमने वाले इस देश के लोगों को, जिनकी श्वांस-श्वांस में कृष्ण की बंसी की धुन बहती हो और अंतिम श्वांस गीता को श्रवण कर छोड़ते हो, कृष्ण को लेकर कोई संशय होगा.

कृष्ण ने हमारे संशय गीता कह कर ही हर लिए थे. हमें कोई चरित्र प्रमाणपत्र या स्पष्टीकरण देने की जरूरत नहीं.

पर उन सभी विदेशी धर्मो और विदेशी विचारधाराओं में छिपे सेक्युलर्स से कहना चाहूंगा कि आप जो बोल रहे हैं, वह आप नहीं बोल रहे, आप का प्रारब्ध आप से बुलवा रहा है.

जब तक सर्वधर्म समान एवं सम्मान कहने के बाद भी ये कु-बुद्धिजीवी केवल हमारे धर्म की मनुस्मृति का चीर हरण नहीं करेंगे, गौ हत्या का पक्ष नहीं लेंगे, तुलसी की चौपाइयों पर हमें अपमानित नहीं करेंगे, अग्नि के रंग भगवा को आतंकवाद से नहीं जोड़ेंगे, राम के अस्तित्व पर प्रश्न नहीं उठाएंगे या कृष्ण को व्यभिचारी नहीं कहेंगे, तब तक युद्ध में अनीति कैसे आयेगी.

इसके बिना इनका अंत सुनिश्चित कैसे होगा. अहिंसा परमो धर्म के श्लोक की चादर ओढे सोया सनातन समुदाय कैसे उठेगा, कैसे एक ध्वज के नीचे आयेगा.

मैं धन्यवाद दूंगा इन सभी तत्वों को, कि आपने हमें एक किया, हमें चेताया. आप हमें एक करते रहे, चेताते रहे. आप अभिमन्यु वध करने की पहल करते रहे और हमारे भीतर के कृष्ण को मौका दे देते रहे.

हमने अब तक कृष्ण को प्रेममय बना रखा था. अब हम कृष्ण को अपनी नीति बनाने जा रहे है. जैसा कि कृष्ण ने कहा है –

सर्व धर्मान परित्याज्य माम् एकम शरणं व्रज : I
अहम त्वाम सर्व पापेभ्यो मोक्ष्य इस्यामि माँ शुच :II (भ.गी:अ १६,श्लो६६)

सभी धर्मो का परित्याग करो और मेरी शरण हो जाओ I मैं तुझे सभी पापों से मुक्त कर तेरा उद्धार कर दूंगा I

निर्मोही कृष्ण के कुरुक्षेत्र में आप का स्वागत है.

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