हार से उपजी असुरक्षा की भावना के साथ ‘छेड़छाड़’ करते हुए EVM पर ठीकरा फोड़ते नेता

चुनाव संपन्न होने के बाद पैंतालिस दिनों तक ईवीएम का डेटा सुरक्षित रखा जाता है क्योंकि विवाद की स्थितियों में यह डेटा दोबारा देखा जा सकता है.

लेकिन न्यूज चैनल घड़ल्ले से बता रहे हैं कि मध्य प्रदेश के भिंड में ईवीएम मशीनें उत्तर प्रदेश के कानपुर और गोविंदनगर से भेजी गयी थीं जबकि उत्तर प्रदेश में मतगणना के बीते अभी महीने भर भी पूरे नहीं हुये हैं.

चुनाव आयोग भी इस बात को स्पष्ट कर चुका है कि भिंड में उत्तर प्रदेश से मशीनें नहीं मंगाई गयी थीं, बल्कि वह सभी वहीं के स्ट्रांग रूम में रखी गयीं थीं.

ऐसे में क्या कोई न्यूज चैनल या वेबसाइट यह बतायेगी कि यह जानकारी उसे कहां से मिली कि मशीनें उत्तर प्रदेश से मंगाई गयी थी? आखिर इस न्यूज का सोर्स आफ इन्फार्मेशन क्या है?

मशीनें कभी भी किसी सरकार के कन्ट्रोल में नहीं रहती.उनके रखरखाव से लेकर सुरक्षा  तक के लिये चुनाव आयोग जिम्मेदार होता है. कौन सी मशीन कहां भेजी जानी है इस बात का निर्णय भी चुनाव आयोग ही करता है.

बूथों पर भेजे जाने से पहले किसी को यह नहीं पता होता है कि कौन सी मशीन किस बूथ पर भेजी जानी है. बूथ पर भेजे जाने से ठीक पहले मशीनों का रैंडमाईजेशन किया जाता है, जोकि पूरी तरह से कम्प्यूटराईज्ड तरीके से संपन्न होता है. लिहाजा कोई यह नहीं जान सकता कि किस नंबर की मशीन किस बूथ पर भेजी जानी है.

मतगणना के बाद डेटा सुरक्षित रखे जाने का प्रावधान भी पहले से ही तय दिनों तक का है. ऐसे में कोई न्यूज एजेंसी किस आधार पर यह दावा कर सकती है कि मशीनें उत्तर प्रदेश से गयी थीं?

वास्तव में समाचारों में स्क्रिप्टेड स्टोरी दिखाई जा रही है. चुनाव आयोग के दावे और स्पष्टीकरण के विपरीत बार-बार यह बताया जा रहा है कि दो बार अलग-अलग बटन दबाने पर भी सिर्फ कमल निशान की ही पर्ची निकली और मशीनें उत्तर प्रदेश से लायी गयीं थीं. जिससे चुनाव में करारी हार पाये विरोधियों के ईवीएम के साथ छेड़छाड़ किये जाने की शिकायत की कहानी के साथ जोड़ा जा सके.

क्योंकि इधर युगपुरुष ताल ठोंक ही रहे हैं कि आयोग अगर उन्हें बहत्तर घंटे के लिये मशीन मुहैया करा दे तो वे उसमें छेड़छाड़ करके दिखा देंगे. आखिर जब युगपुरुष जी को अपनी काबलियत पर इतना ही भरोसा है तो वह यह छेड़छाड़ आयोग के समक्ष ही क्यों नहीं करना चाहते? क्योंकि आयोग भी दावा कर ही रहा है कि कोई आये और जरा इन मशीनों में छेड़छाड़ करके दिखा दे.

वास्तव में यह पूरी कवायद सिर्फ इसलिये की जा रही है जिससे चित भी मेरी और पट भी मेरी बरकरार रहे. मतलब अगर चुनाव जीत गये तो अपनी इमानदारी का ढोल और हारने पर ईवीएम में छेड़छाड की पिपनि बजाई जा सके.

चूंकि पंजाब और गोवा के बाद दिल्ली एमसीडी में भी अपनी चुनावी हार को युगपुरुष अच्छी तरह से भांप रहे हैं. लिहाजा पहले से ही इस बात के लिये मैदान तैयार किया जा रहा है कि अपनी नाकामियों को छुपाते हुये ईवीएम पर ही ठीकरा फोड़ा जा सके.

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