शराबबंदी और भारतीय मीडिया का चरित्र

alcohol ban biased main stream media

भारतीय मीडिया के चरित्र को समझना हो तो सर्वोच्च न्यायालय के सड़क के पाँच सौ मीटर के भीतर शराब की बिक्री पर रोक के फ़ैसले पर NDTV पर हुई बहस देखनी चाहिए.

पहले मैं कुछ डिस्क्लेमर्स दे दूँ :

– पहली बात यह कि मैं इस बात से सहमत हूँ कि इस तरह के काम अदालत के नहीं हैं. अदालत क़ानून नहीं बना सकती, क़ानून की व्याख्या कर सकती है. पर हमारे यहाँ अपना काम न कर दूसरे के काम में हाथ डालने की पुरानी परम्परा है.

– दूसरी बात यह कि मैं इस बात से भी सहमत हूँ कि सिर्फ़ ऐसे किसी एक क़ानून के बनने से सड़क पर शराब पी कर गाड़ी चलाने और लोगों को मारने की समस्या समाप्त नहीं होगी. पर मेरे इस तर्क की बेहूदगी इतनी स्पष्ट है कि इस पर आगे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है. यह कुछ उसी तरह का तर्क है कि पुलिस के रहने से अपराध थोड़े ही ख़त्म होगे, फिर पुलिस की क्या आवश्यकता? यह कोई all or none phenomenon वाला मामला नहीं है. either or नहीं है इसमें. कई मोर्चों पर हमला करना होगा. पर हम किसी मोर्चे पर तब तक हमला नहीं करेंगे जब तक सारे मोर्चों पर हमला नहीं होगा, यह सिर्फ़ बेहूदा कुतर्क नहीं है, यथास्थिति बनाए रखने का षड्यंत्र है.

पर जो तर्क इस फैसले के विरुद्ध दिए जा रहे हैं, उनको सुन कर तो आदमी के होश उड़ जाएं. एक बानगी :

– यह हमारे शराब पीने के मौलिक अधिकार पर हमला है.

– यह moral policing है.

– इतने लोगों की नौकरियों का क्या होगा?

– अर्थव्यवस्था के डूबने का ख़तरा है.

– सड़क दुर्घटना में हुई मौतों के सिर्फ 3 प्रतिशत शराब पी कर गाड़ी चलाने के कारण होते हैं (मतलब 3 प्रतिशत लोगों की जान क्या चीज़ है? और पूरी तरह बोगस गणित.).

– शराब पीना दिल के लिए अच्छा है (घनघोर हृदय रोग विशेषज्ञ निधि राज़दान का गहन शोध के बाद निकाला निष्कर्ष).

– गुजरात में, जहाँ शराबबंदी है, सड़क दुर्घटनाएँ क्यों होती हैं?

– क्यों न हम जनता में शराब पी कर गाड़ी चलाने के ख़तरों से आगाह करने के लिए जागरूकता अभियान चलाएँ ( ऐसे अभियान यूरोप में दशकों से चल रहे हैं और शराब का consumption उसी अनुपात में बढ़ता चला गया है. हम वैज्ञानिक सोच वाले लोग हैं, जो हम सोचते हैं, वही तो विज्ञान है, हमें data से क्या दरकार ?)

अंधे को भी साफ़ दिखेगा कि मीडिया वालों की शराब बनाने और बेचने वालों से मिली भगत है. ये elite हैं देश के. पंचतारा होटलों में देर रात तक शराब के नशे में थिरकना, तीन बजे भोर में शराब के नशे में सड़क के किनारे सोए मज़दूरों को गाड़ी के नीचे कुचल देना, हर भारतीय बात का मजाक उड़ाना, दिल्ली की सड़कों को न्यूयॉर्क मानना, सड़क पर नंगे घूमने को मानवाधिकार मानना – आदि इनके जीवन के केंद्र में हैं. इनकी “स्वतंत्रता” सर्वोपरि है. हमारी आपकी स्वतंत्रता दो कौड़ी की है.

दिलचस्प बात यह भी है कि यही NDTV दो तीन वर्षों से सड़क सुरक्षा का अभियान चला रहा है – जो दुनिया की शराब बनाने की सबसे बड़ी कम्पनी Diageo ने स्पॉन्सर किया है !

इस मसले पर अंग्रेजी में विस्तार लिखे लेख को पढ़ें, उपरोक्त बात समझाने में सहायक होगी.

The gist of Barkha Dutt’s programme on NDTV on alcohol policy in Kerala:

1. Drinking is a matter of human rights. Any infringement amounts to moral
policing.

2. Drinking is a key ingredient of women empowerment.

3. Drinking is an essential part of modernity and free thought.

3. Those who want to drink will always drink.

4. Restricting alcohol access will lead to bootlegging which apparently is most common in Gujarat (no need for statistics as it has come straight from the source of all knowledge).

5. Any adverse effects of alcoholism can be tackled by public awareness programmes.

This is the level of “intellectual” discourse in India. The fountainhead of all knowledge should perhaps stop and ponder over the following:

1. Since she is so keen on copying everything from the ‘developed’ and ‘liberated’ societies, she should note the following statistics from UK:

-alcohol related hospital admissions have doubled in UK in the last decade
– the total cost of alcoholism to the public exchequer is 21 billion GBP per anum
– 1200 children under the age of 14 are on the books of alcohol liaison services in England and Wales alone. This does not include Scotland and Ireland and clearly represents just the tip of the iceberg.

2. She should also consider some statistics from India. 130,000 people die in road traffic accidents in India per year. Apparently 99% of fatalities are related to drunken driving. India is already the diabetes capital of the world. Soon, it will be the alcohol capital of the world also.

3. The objective of a public health policy is not based on stupid arguments like “those who want to kill themselves will kill themselves”. Bowel cancer screening programme was not launched to eliminate bowel cancer from the planet. It was aimed at REDUCING the number of deaths from bowel cancer. The same goes for breast cancer screening and many other measures. The same applies to alcoholism. No public policy can eliminate alcoholism. The idea is to reduce the burden of alcoholism on society.

4. Public awareness campaigns do not work or if they do their effect is marginal. Smoking is a case in point. The prevalence of smoking has declined dramatically in the west. The public awareness campaigns have been running for many decades but the decline has only taken place within the last decade and that is a direct consequence of banning smoking from public places. Those who want to smoke will still smoke but that is besides the point, the prevalence of smoking related diseases will inevitably and inexorably decline over ensuing decades.

5. There is abundant data (supported by professional organisations like the British Medical Association) that just like smoking, the only thing that is likely to have an impact on drinking behaviour is limiting access to alcohol. This could mean raising the price of alcohol, making it more difficult to access etc. Those who wish to drink will still drink, those who wish to drink illicit alcohol and die will still do so, but that is not the point. The OVERALL burden of alcoholism on society will decline considerably.

These know all worthies like Barkha Dutt should learn to think before they speak. For them everything is just a rhetorical screaming match.

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