मैं भी देखता हूँ, कहाँ-कहाँ लगाओगे एसी

“कितनी गर्मी हो गई है, और कितनी जल्दी आ गई.”

अब घर में चार-चार एसी लगा रखे हो, गर्मी नहीं बढ़ेगी तो क्या होगा!

“तुम भी यार, हमारे एक घर में लगाने या ना-लगाने से क्या होता है.”

इस पर मैं चुप ही रहा था. कुछ भी कहना व्यर्थ है. मॉर्निंग वॉक पर पड़ोसी से मुलाक़ात हो गई थी.

सोचा सुबह-सुबह अपनी ऊर्जा इन पर खर्च क्यों करना. ये हाल है पढ़े लिखे लोगों का. हर एक यही सोच कर आँख बंद किये हुए है.

मजेदार बात तो ये है कि घर में कुल तीन सदस्य हैं. और कार भी तीन! बेटा इंजीनियरिंग कॉलेज भी कार से जाता है.

वो अकेला ऐसा नही करता. मोहल्ले में तीन छात्र हैं सभी एक ही कॉलेज में, मगर अलग-अलग कार से जाते हैं. कॉलेज मुश्किल से दो चार किलोमीटर दूर होगा.

याद कीजिये कुछ समय पहले तक बच्चों को मोटरसाइकिल भी नहीं मिल पाती थी, अब तो सभी इसके बिना घर से कदम नहीं निकालते.

सिर्फ बच्चों का दोष नहीं, बड़े भी… पचीस-पचास का ब्रेड दूध लेने भी जाना है तो लाखों की गाड़ी बिना बाहर नहीं जाते. घर-घर, शहर-शहर यही कहानी है.

हम तो पंखा भी कम ही चलाते हैं. अच्छा है पसीना आएगा तो कुछ तो शरीर से गंदगी बाहर निकलेगी. वर्ना अंदर रह गई तो बीमार ही करेगी.

ये बात सब को पता है मगर कोई मानने को तैयार नहीं. हाँ वातानुकूलित अस्पताल का कोई डॉक्टर ऊंची फीस लेकर बताएगा तो पार्क में जाकर नकली हंसी के लिए जोर-जोर से अट्टहास लगाएंगे.

बहरहाल, असली मज़े तो ऊपर वाला ले रहा है, यह कह कर कि कहाँ-कहाँ एसी लगाओगे, मैं भी देखता हूँ!

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