सोशल पर वायरल : कन्हैया कुमार पर बना यात्रा का विज्ञापन

मज़ाक उड़ाने की…. आजादी!!!

यह वीडियो तो आप देख चुके होंगे, नहीं तो एंजॉय कीजिये.

यहाँ समझते है इसके पीछे की सायकोलॉजी. कोई भी विज्ञापन हमेशा ग्राहक के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर ही बनती है और ज़ाहिर है कि यह एड भी अपवाद नहीं.

[ये मजेदार वीडियो देखने के लिए क्लिक करें]

देखते हैं कन्हैया ही क्यूँ?

सब से पहली बात है कि चैनल वालों ने ही उसको इतना सभी जगह चेप मारा है कि यह किसकी नकल मारी जा रही है यह कहने की जरूरत नहीं रहती. उसकी loud body language, नारेबाजी की स्टाइल इत्यादि का पूरा फायदा उठाया है.

और एक बात यह है कि उसकी मांग जायज हो न हो, उसे मानी न जाने पर तमाशा करने पर आमादा हो जाना.

बच्चे जिद में दुकान में ही हाथ पाँव पटकने शुरू करते हैं. वे बच्चे होते है, इसका अंदाज बचकाना है.

अपना स्वार्थ मनवाने के लिए अपना इशू सब का इशू बनाता है. उससे क्या होगा उसकी उसे फिकर नहीं या उतनी अकल भी नहीं.

क्या इसका विडियो बनाना रिस्क था? नहीं. अभी देश भर में उसे हीरो बनाने का यत्न तो किया जा रहा है लेकिन जनता उसे भी और उसको प्रमोट करवानेवालों को भी जीरो ही मानती है.

इसीलिए उसका जो मज़ाक उड़ाया गया है. दो नेगेटिव एक-दूसरे को छेद दे कर पॉज़िटिव रिज़ल्ट देते है. नारेबाजी का मज़ाक भी उड़ाया गया है सही तरीके से, समझदारी की नसीहत दे कर.

आप हंस के लोट पोट हो जाते हैं, ad भी याद रह जाती ही है और यात्रा का नाम भी. कुल मिलाकर एक नेगेटिव कैरक्टर का इस्तेमाल कर के भी एड सभी मानकों पर खरी उतरती है.

Entertaining है. कम्प्युटर या व्हाट्सएप्प पर तो एक से अधिक बार देखी ही जाएगी याने repeat views फ्री में.

विंडो सीट का मेसेज बराबर दिया जा रहा है. लोग धड़ल्ले से शेयर कर रहे हैं याने जागरूकता बढ़ रही है. यात्रा का नाम भी याद रह जाता है.

एक capitalist मने पूंजीवादी कंपनी का धंधा बढ़ाने के लिए एक कम्युनिस्ट का इस से बेहतर उपयोग शायद ही किसी ने किया होगा.

फुल पैसा वसूल एड है, लेकिन चूंकि इस इंडस्ट्री में ढेर सारे वामी लोग होते हैं, इसको कोई अवार्ड मिलना मुश्किल ही है.

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