कोई बात नहीं, पीएम, सीएम और करोड़पतियों की पूजा चढ़ावे के लिए सैकड़ों मंदिर हैं…

रामलला जन्मोत्सव के बजट में तीन हजार की भारी वृद्धि की गयी है. 1992 में हाईकोर्ट ने रामलला का मासिक बजट 66 हजार व जन्मोत्सव के लिए 33 हजार रूपए के बजट की व्यवस्था की थी.

अंततः ये जज कितना बेईमान था जिसने रामलला के लिए इतनी राशि का प्रावधान किया था… बताओ यार… 25 साल बाद सारे काम चलते रहे हैं 66 हजार या 33 हजार में….

25 सालों में आटा, ईंधन, मिश्री, मक्खन, दूध, शहद, घृत, शक्कर, हवन-धूप…. धूप बत्ती, झाड़ू, पोशाक की रेशम-जरी, टेलर की मजदूरी…. पूजा की घंटरिया, दीपक, रोली, अक्षत, नैवैद्ध, बत्ती की रुई….

अंततः इन तमाम सामग्रियों की 25 साल में कितने गुना कीमत बढ़ गयी…. और अब भी आराम से काम चल रहा था…. अब 33 हजार में मात्र 3 हजार बढ़ा कर काम चल जाएगा….

आखिर ये स्थिति स्पष्ट रूप से रामलला की पूजा व्यवस्था में 25 सालों में निश्चित ही भारी गबन की आशंका तो बन ही रही है….

भाई ये उस देश के करोड़ों निवासियों के आराध्य श्री राम के जन्मभूमि मंदिर की व्यवस्था की राशि है, जिसके प्रधानमंत्री अजमेर की दरगाह पर ढाई लाख की लागत की चादर लाखों के खर्चे के साथ भेजते हैं.

जहां करोड़ों-अरबों का सोना चांदी नकदी गुप्त दान के नाम पर नदियों में विसर्जित होता है….

एक-एक व्यक्ति लाखों का प्रसाद चढ़ाता है…. 66 हजार का सूट तो मामूली बोला जाता है….. यूपी की जीत पर पार्टी की संसदीय दल की बैठक में वितरित बालाजी के प्रसाद के लड्डू भी तो नहीं आ पाये होंगे इतनी रकम में….

ठीक है रामलला, हम तो लज्जित हैं… लाचार हैं, नकारा हैं…. यहाँ तो पीएम-सीएम सभी भव्य मंदिर में ही दर्शन की कसम खा के कुर्सी पर विराजमान हैं….

सो कोई बात नहीं…. पीएम साब सीएम साब और करोड़पतियों खरबपतियों की पूजा चढ़ावे के लिए भारत और दुनिया भर में सैकड़ों, हजारों, लाखों मंदिर हैं….

रामलला तो हम गरीब वानर भालू आदिवासियों और दरिद्र दुखी जनों के लिए धरा पर आये थे…. और कंद-मूल खाके ही तो संतोष साहस शक्ति पाते थे.

सो कोई बात नहीं… हम इसी में प्रसन्न है कि तम्बू में पाखण्डियों का एक कांटा तो विराजमान है….

किसी कम्युनिस्ट और इस्लामिक देश के निवासियों को तो इतना भी नहीं मिलता…. यहाँ कम से कम रामलला के दर्शन तो हैं….

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