रामायण से कुछ मोती : राम, तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है…

कुछ दिन पहले एक मुस्लिम बहन ने मुझसे पूछा था कि किसी पैगंबर, वली या अवतार की जीवनी पढ़नी है तो किसकी पढूँ?

मैंने उसे प्रभु राम का जीवन-वृत पढ़ने को कहा. इसलिये कहा क्योंकि मानव जाति जिनको पूजता है, जिनका अनुगमन करता है, जिनके प्रति श्रद्धा रखता है उसमें केवल राम ऐसे हैं जिन्होंने मानव जाति को जो भी सिखाना चाहा उसे पहले खुद अपने जीवन में उतारा.

राम केवल उपदेशक नहीं थे बल्कि अपने उन उपदेशों को अपने व्यवहार में भी लाते थे. राम की एक विशेषता ये भी है कि मानव जिन रिश्तों को भी जीता है, चाहे उसका वो रिश्ता अपने परिवारजनों के प्रति हो, गुरुजनों के प्रति हो, मित्रों के प्रति हो, सहायकों और अधीनस्थों के प्रति हो, बड़े या छोटे के प्रति हो, समाज और राष्ट्र के प्रति हो राम ने उन सब रिश्तों के प्रति जो मर्यादा स्थापित की, वो किसी और के जीवन में नहीं मिलती.

राम सुबह उठने के साथ सबसे पहले अपने माताओं, पिता और गुरुओं की चरणवंदना करते थे, अपने जीवन में न तो कभी उन्होंने अपने पिता के आज्ञा को टाला और न ही कभी उनकी आज्ञा के बिना कुछ किया.

इसके पश्चात् वो स्नान कर प्रातःकालीन संध्या और यज्ञ के साथ गायत्री का जप करते थे. कैकेयी के कारण राम का राज्याभिषेक नहीं हो पाया था उल्टा उन्हें 14 वर्ष का वनवास मिला जहाँ उन्हें अपनी पत्नी का विरह भी सहना पड़ा पर कभी भी कैकेयी के प्रति राम का आदर कम नहीं हुआ.

जब वनवास से लौटे तो अपनी माता कौशल्या से पहले कैकेयी के कक्ष में जाकर उनका आशीर्वाद लिया. राम हर रात्रि अपने गुरु के चरण दबाते थे और कभी भी उन्होंने गुरु की आज्ञा की अवहेलना नहीं की.

भाइयों के प्रति उनका प्रेम तो जग-जाहिर है, लक्ष्मण के प्रति उनका अनुराग ऐसा था कि जब वो मूर्छित थे तब राम उनका सर अपनी गोद में लेकर बिलख रहे थे, ऐसा ही प्रेम उनका अपने बाकी भाइयों के लिये भी था.

वन में जब भरत उनसे मिलने आते हैं और राम को इसकी सूचना मिलती है तो वो बेसुध हो उठते हैं, इस बेसुधी की हालत में कहीं उनका धनुष गिर जाता है, कहीं बाण और कहीं वस्त्र, फिर राम पुत्रवत स्नेह से भरत के उलझे हुए जटाओं को सुलझाते हैं और स्नान कराते हैं.

दुनिया को एक पत्नीव्रत का वैदिक आदर्श समझाना था तो राम ने स्वयं उसे निभाया, पत्नी के प्रति समर्पण और प्रेम की जो मिसाल राम ने कायम की थी वैसा अन्यत्र किसी और के जीवन में नहीं मिलता.

शत्रु-धर्म निभाने की कथा तो सबको मालूम ही है. बालि और रावण का वध किया पर राम ने उनका राज्य स्वयं नहीं लिया बल्कि अपने मित्र सुग्रीव और बिभीषण को सौंप दिया जो उनके मित्र-धर्म का उदाहरण है.

अपने सहयोगी वानर-भालुओं के प्रति भी उनका भाव स्नेहवत ही था. गिद्धराज जटायु का अपने हाथों से अग्नि-संस्कार, शबरी के लिये उनका प्रेम, केवट के प्रति अनुराग, ये सब राम के उज्जवल चरित का दर्शन ही तो कराते हैं.

सोने की लंका को तजकर अपनी जन्मभूमि के प्रति राम का अपार प्रेम जहाँ उनके राष्ट्र-प्रेम का सूचक है वहीं सिंहासनारूढ़ होने के पश्चात राम-राज्य की स्थापना समाज जीवन के प्रति दायित्व-निर्वहन का प्रतिदर्शक है.

दुनिया में ईश्वर की तरफ से आने वाले बहुत होंगे, उनमें से कुछ के तो पिता थे पर उन्हें माँ का सुख नहीं था, कुछ को माँ का सुख मिला पर उनके पिता नहीं थे, कुछ के दोनों नहीं थे, कुछ ने कई विवाह किये, कुछ ने विवाह किया ही नहीं, कुछ ने सिर्फ वनवासी जीवन जिया तो कुछ महलों में ही रहे पर राम इन सबमें अनूठे हैं.

अनूठे इसलिये क्योंकि लगभग हर रिश्ते का सुख उन्हें मिला था और राम ने इस सुख को अवसर में बदल दिया. हर रिश्ते के प्रति क्या आदर्श होना चाहिये इसकी मिसाल स्थापित कर दी.

राम वनवासी भी थे, महलवासी भी, राम ने रंक का जीवन भी जिया, राम राजा भी थे, राम के पास जब सेना नहीं थी तब अपने कौशल से उन्होनें अपनी सेना खड़ी कर ली.

आज लाखों साल बाद भी दुनिया का हर बाप अपने बेटे से, हर पत्नी अपने पति से, हर भाई अपने भाई से, हर मित्र अपने मित्र से राम होने की ही अपेक्षा करता है. श्रीराम नाम की अमरता का इससे बड़ा सबूत और क्या हो सकता है.

मैथिलीशरण गुप्त ने यूं ही नहीं कहा था –

राम, तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है।
कोई कवि बन जाय, सहज संभाव्य है।

वाल्मीकि या तुलसी थे इसलिये राम नहीं हैं, राम और उनका आदर्श चरित था जिसने वाल्मीकि और तुलसी को कवि बना दिया.

हर रिश्ते के प्रति जो राम की भावना थी, उनके उसी चरित का अनुगमन करने की खुद से और आप सबसे अपेक्षा करते हुए आने वाले पावन पर्व रामनवमी की बहुत-बहुत शुभकामनायें.

!! जय श्रीराम !! !! जय श्रीराम !! !! जय जय श्रीराम !!

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