चाय-कॉफ़ी का रिवाज और करिश्मा ए दास्तान की हकीकत बनाम फजीहत!

मुझे अच्छी तरह याद है पिछली शताब्दी के पचासवे दशक की बात है , जब मैं गुना के आर्यसमाज स्कूल में पढ़ता था. हमारे क़स्बे की बीच बाजार में ठेलागाड़ी पर स्टोव जलाकर, पानी दूध शक्कर मिलाकर उसमें लाल ब्रुक बॉण्ड चाय की पत्तियों को उबालकर चाय बनती थी, और लोगों को बुला बुला कर पीने को चाय फ्री में दी जाती थी.

गाँव के लोग उस चाय को अपनी गड़ई (लोटा) में भरवाकर फूंक फूंक कर सुर्राटे मार कर पीते थे. देखते देखते इस विज्ञापन प्रणाली का इतना ज़ोरदार असर हुआ कि गाँव गाँव में अलावों के ऊपर लुटिया में चाय बनने लगी और मीठे शर्बत जैसी गरमागरम चाय तस्तरियों में फूंक मार कर सुर्राटे मार कर पी जाने लगी. भारत के गाँवों में अभी तक चाय की तरह कॉफी पीने का प्रचलन शुरू नहीं हुआ है.

एक अनुमान के मुताबिक़ आज पूरी दुनिया में लगभग एक अरब 60 करोड़ प्याले कॉफ़ी के हर रोज तथा इससे दुगनी मात्रा में चाय के प्यालों की प्रति दिन खपत होती है. काफी के बारे में कहा जाता है कि कॉफ़ी का चलन 18  १८ वी सदी से अरब देशों से शुरू हुआ. इसकी उत्पत्ति “कहवा” शव्द से होकर यूरोप में पहुंचकर काफी होगया. एक किवदन्ती है कि स्वीड़न के राजा गस्तव तृतीय के जमाने में कुछ लोग इसे जहर मानते थे. तब राजा गस्तव ने मौत की सजा पा रहे दो जुड़वा भाई कैदियों पर चाय और काफी तीन तीन कप रोज पिलाकर एक प्रयोग किया कि देखे चाय या काफी पीने वाला कौनसा कैदी पहिले मरता है. पर इस बीच राजा की तो किसी ने हत्या करदी और भले चंगे कैदी चाय पीने वाला ८३ साल की उम्र में मरा और काफी पीने वाला इससे भी ज्यादा दिनों तक जिन्दा रहा.

चाय की उत्पत्ति दसवीं शताब्दी के आसपास चीन देश से हुई, चीन से यह पूरी तरह पूर्वी एशिया में फैल गई. और अब तो ग्रीन टी, सफेद टी, ब्लेक टी, तुलसी टी, हर्बल टी आदि नाम से तरह तरह किस्म की चाय चल गई.

भारत में अंग्रेजों ने चाय की पैदावार पूर्वांचल में 18वीं सदी में शुरू करके चीन के एकाधिकार को समाप्त कर दिया. अंग्रेजों ने ही दक्षिण के राज्य तमिलनाडु, केरला और कर्नाटक में काफी का उत्पादन बड़े पैमाने पर आरम्भ करके 10वीं शताब्दी में इथोपिया के जंगलों में पैदा होने वाली काफी का पूरी दुनिया में प्रसार कर दिया.

आज स्थिति यह है कि विश्व में जितनी उपज कॉफ़ी की होती है उसका 4.5% हिस्सा अकेले भारत में पैदावार होती है. कॉफी के 80% उत्पादन का हिस्सा विदेशों को निर्यात होता है. चिकमंगलूर में पैदा होने वाली कॉफी विशेष रूप से समस्त कॉफी जगत में प्रख्यात़ है. अकेले चिकमंगलूर में ढ़ाई लाख से अधिक कॉफी की पैदावार करने वाले कृषक मौजूद हैं.

1928 से लेकर आज तक अनेक शोधपत्र प्रकाशित करके वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया है कि अधिक से अधिक तीन कप से ज्यादा कॉफी किसी भी व्यक्ति को एक दिन में नहीं पीना चाहिये.

न्यू साईन्टिस्ट पत्रिका के ताजा अंक में अनेक वैज्ञानिक रिसर्च का सन्दर्भ देते हुए निष्कर्ष निकाला है कि, कॉफी पीने के बाद व्यक्ति में एकाग्रता और सजगता में वृद्धि होती है. पर इसकी लत लग जाने से कॉफी में मौजूद “केफीन” नामक पदार्थ से घातक बीमारियों का सामना करना पड सकता है.

इससे सिरदर्द, अनिन्द्रा ब्लड प्रेशर और कैन्सर जैसे रोग भी हो रहे हैं. चाय कॉफी की तुलना में सुरक्षित पेय माना गया है. पर कॉफी को पीने की लत लगना एक शराबी जैसी मानसिक हालातों को पैदा कर देती है जिससे उदर तथा तन्त्रिका तन्त्र जनित बीमारियां खासकर पार्किन्सन्स बीमारी को भी बढ़ावा मिलता है.

अगर आप एक दिन में तीन कप या उससे अधिक कॉफी प्रतिदिन पी रहे हैं तो निकट भविष्य में आप इस हकीकत में मानकर चलिये कि आप जल्दी ही अपने शरीर की फजीहत करने जा रहे हैं.

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