हिन्दुत्व को बढ़ता देख खुद के सेक्युलर होने की खीझ निकालते बुद्धिजीवी

बौद्धिकता कभी अव्यवहारिक नहीं हो सकती, ना ही यह भावना पर आधारित होनी चाहिए. मगर हिंदुस्तान में मौसम के साथ बुद्धिजीवियों के तर्क भी बदल जाते हैं और तथ्य भी.

कल तक गाय का नाम लेने पर ही जिनकी सेक्युलरता खतरे में पड़ जाती थी आज वो ताल ठोक कर कह रहे हैं कि बूचड़खाना तो बूचड़खाना हैं, इसमें वैध और अवैध नहीं होना चाहिए और इसलिए सब बंद किये जाने चाहिए. अचानक इन सब का पशु प्रेम जाग उठा.

कल ये कह सकते हैं कि शराबबंदी वाले राज्यों में उन सब दवाइयों पर भी रोक लगाई जानी चाहिए जिसमे अतिसूक्ष्म ही सही मगर अल्कोहल होता है.

यह ये भी कह सकते हैं कि शेर को हिरन और बिल्ली को चूहा खाने से रोकना चाहिए. और वाहवाही लूटने के लिए अपनी बात के समर्थन में ये भी कह सकते हैं कि बिल्ली को दूध पिलाया जा सकता है.

अरे अति बुद्धिजीवियों, अगर बिल्ली सब दूध चट कर जाएगी तो घर के बच्चे क्या पियेंगे.

ज्ञान इमपल्सिव नहीं हो सकता, अर्थात झटके में नहीं परोसा जाता, ना ही ज्ञान कोई कटपीस कपड़ा है जो टुकड़ों में बांटा जाए.

यह थान का वो कपड़ा है जिसका कोई अंतिम छोर नहीं होता, उसे खींचते चले जाओ… वो द्रौपदी के चीरहरण की तरह अंतहीन है और जो एक नारी अर्थात मनुष्यता की लाज रखता है.

सभी बूचड़खानो को बंद करने का कहने वाले, या तो भाजपा की जीत में हिन्दुत्व को बढ़ता देख अपनी सेक्युलर होने की खीझ को निकाल रहे हैं या फिर शाकाहारी बनाम मांसाहारी के प्राकृतिक संतुलन से अनजान हैं.

सभी बूचड़खानो के बंद की पैरवी करके वो ना केवल अपनी बेवकूफी का प्रदर्शन कर रहे हैं बल्कि उनका ज्ञान कितना सीमित है, ये बतला रहे हैं.

वे जीवन की वास्तिवकता से कितने अनजान हैं या फिर अपने कमरे-घर से बाहर के समाज की असलियत से कितने कटे हुए हैं, इस सच्चाई के दर्शन भी करा रहे हैं.

अगर यहां बात सिर्फ गौ हत्या तक ही सीमित रखी जाए तो यह उत्तरप्रदेश में कानूनी रूप से प्रतिबंधित है, इसलिए इसका किसी भी तरह से कहीं भी कटना-काटना गैरकानूनी है और इस संदर्भ में वैध-अवैध बूचड़खाने वाली कोई बात ही नहीं है. इसलिए वो अपने दिखावे के आंसू पोंछ लें.

यहां बात हो रही है उनके द्वारा कहे गए सभी बूचड़खानों को बंद करने की उनकी अति बौद्धिकता की.

तो क्या वो इस प्रश्न से अनजान हैं कि क्या सम्पूर्ण विश्व शाकाहारी हो सकता है? और अगर यह असम्भव किसी तरह सम्भव कर भी दिया गया तो उसके क्या-क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं.

और सबसे महत्वपूर्ण है क्या हम प्रकृति के विरुद्ध जा कर एक नई दुनिया बनाना चाहते हैं? इन्हें पढ़ कर तो ऐसा ही कुछ लगता है.

बहरहाल सँक्षिप्त में कहें तो जो अवैध है अर्थात गैर कानूनी है, उसे रोकना यह किसी भी राज्य और शासन की पहली जवाबदारी है क्योंकि जो कानून सम्मत नहीं वो समाज, प्रकृति, पर्यवारण को नुकसान कर रहा होगा.

इसलिए हर गैर कानूनी काम को बंद करने का आह्वान करें, ना कि लोगों की खाने की थाली से अंडे और चिकन को बंद करने का प्रयास करें.

वैसे इन महानुभावों की जानकारी के लिए हिंदुस्तान में अनेक क्षेत्र के खांटी ब्राह्मण भी सदियों से माँसाहारी हैं और अपने जीवन समाज के हर महत्वपूर्ण कर्मकाण्ड में शौक से मछली का भोजन ग्रहण करते हैं.

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