असली खतरा क्या है? निजी आज़ादी का या भ्रष्टाचार के रास्ते बंद हो जाने का!

आज जब आधार कार्ड के जरूरी किये जाने पर तमाम बुद्धिजीवी प्रलाप कर रहे हैं इसे निजी हितों पर खतरा बता रहे हैं. मेरी पिछले साल की पोस्ट जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है. एक साल पहले भी रविश कुमार ऐसे ही हल्ला काट रहे थे और आज भी.

[आधार से कैसा डर? जासूसी तो बिना आधार के भी बखूबी हो सकती है]

हैदराबाद यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला ने आत्महत्या कर ली. उसकी आत्महत्या के पीछे एक वजह ये भी बताई जाती है कि करीब सात महीनो से उसकी फेलोशिप रुकी हुई थी.

एक गरीब छात्र वो भी दलित, के लिए 25,000 रूपये महीने की रकम काफी बड़ी है. इस आधार पर केंद्र सरकार को गरीब, दलित का दुश्मन ठहराया जाता है. मुस्लिम विरोधी तो वो है ही.

खैर आज कुछ और सरकारों के बारे में भी जाना जाए.

बिहार में बहार है, नितीश कुमार है, सुशासन बाबू का राज है. नीतीश कुमार ने दलित और अनुसूचित जनजाति के बच्चो के लिए बहुत कुछ किया है. उनमें से एक है कि जो दलित बच्चे प्रोफेशनल डिग्री के कोर्स करते हैं उनकी फीस सरकार देती है.

और ये फीस प्राइवेट कालेजों में पढने वाले बच्चों को भी मिलती है. अब बिहार में तो इतने कालेज है नहीं. तो दूसरे प्रदेशों में पढने वाले बिहार के दलित बच्चो को भी ये छात्रवृत्ति मिलती है.

ये छात्रवृत्ति बच्चों को न देकर सीधे कालेज के अकाउंट में सरकार जमा करती है. इस बार विजिलेंस विभाग को कुछ शिकायत मिली.

ओड़िसा के राजधानी कालेज पर छापा पड़ा. उस कालेज के करीब 70 बिहार के बच्चों को ये छात्रवृत्ति मिल रही थी. लेकिन जब जांच हुई तो वो सभी छात्र फर्जी पाए गए.

राज्य सरकार कालेज को पैसा दे रही थी, लेकिन सभी दलित छात्र जिनके नाम पर ये पैसा आता था, वो एक्जिस्ट ही नहीं करते थे.

फिर कायदे से जांच हुई. पता चला कि उत्तर प्रदेश के देहरादून और अलीगढ़ में दो ऐसे और कालेज हैं और एक नैनीताल में है, जहाँ करोड़ों रूपये छात्रवृत्ति के दिए जा रहे हैं लेकिन वो बच्चे हैं ही नहीं. करीब 200 करोड़ की छात्रवृत्ति डकार ली गयी.

एक बार सोचिये अगर सही छात्रों को ये फेलोशिप मिल रही होती तो कितने बच्चो का उद्धार हो सकता था. कितने छात्र समर्थ हो सकते थे.

यहाँ लोग हल्ला मचाते हैं कि IIT की फीस तीन गुना बढ़ गयी, ये सरकार गरीब और दलितों की दुश्मन है. लेकिन इन बच्चों को तो स्कॉलरशिप है. लेकिन अगर सही हाथों में नहीं पहुँचती तो किसे दोष देना चाहिए.

ऐसे ही उत्तर प्रदेश है. यहाँ 2012 में प्रदेश सरकार ने एक अच्छा फैसला लिया. उन्होंने अपने समाज कल्याण विभाग से कहा कि जो दलित SC/ST बच्चे प्रोफेशनल कोर्स पढ़ रहे हैं उनकी फीस सरकार देगी. लेकिन ये पैसा कालेज को सीधे नहीं मिलेगा, बल्कि हर बच्चे का बैंक अकाउंट खुलेगा और उसमे ये पैसा जायेगा.

लेकिन घोटाला फिर भी हुआ. फर्जी नामों पर अकाउंट खुले, दलित बच्चों का पैसा हड़प लिया गया. शोर मचा. विधानसभा में हंगामा हुआ. सरकार ने कार्यवाही की. जांच पूरी होने तक सभी छात्रों के बैंक अकाउंट फ्रीज कर दिए गए.

ये दो साल पहले की बात है. जांच पूरी होने में समय तो लगता ही है. जो बच्चे प्राइवेट कालेजो में थे, वहां के मैनेजमेंट ने बच्चों से फीस मांगनी शुरू की.

गरीब दलित बच्चे इतनी बड़ी रकम कहाँ से लाते. मानसिक परेशानी, एक्जाम से रोके जाने की परेशानी. न जाने कैसे बच्चों ने ये समय काटा होगा.

लेकिन कहीं कोई न्यूज़ नहीं आई. हो सकता है छोटी-मोटी बात रही हो. न भी हो तो बना दी जाती है. भ्रष्टाचार अब जीवन का अंग जो है.

इसे न्यूज़ बनाने की जिम्मेदारी पत्रकारों की है. लेकिन उन्हें तो UP में सरकार से प्लाट मिल रहे थे, गिफ्ट मिल रहे थे, लैपटॉप मिल रहे थे. लेखको को यश भारती सम्मान मिल रहा था. जिसमें लाखों रूपये के साथ आजीवन 50,000 रूपये महीने की पेंशन भी मिलनी थी. फिर कौन बोलता इस पर?

लेकिन जब ऐसी धांधली को रोकने के लिए मोदी सरकार आधार बिल लेकर आई, जिसमें ये खास इंतजाम हैं कि सब्सिडी या ऐसी स्कॉलरशिप सिर्फ और सिर्फ सही हाथों तक पहुंचे तो उसे रोकने के कितने प्रयास हुए.

आज ही रविश कुमार का ब्लॉग पढ़ा. आधार से लोगों की निजी स्वतंत्रता को खतरा है. धर्म और जाति के नाम पर दंगे हो जाने का खतरा है.

अब पता नहीं असली खतरा क्या है? निजी आज़ादी का या भ्रष्टाचार के रास्ते बंद हो जाने का.

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