रामायण से कुछ मोती : आतंकवाद के खिलाफ लड़ने वाले पहले योद्धा जटायु

पिछले वर्ष लखनऊ के रामलीला में पहुँच कर श्री नरेंद्र मोदी ने रामायण के एक पात्र जटायु का उल्लेख करते हुए कहा था कि जटायु पहले थे जिन्होंने आतंकवाद के खिलाफ युद्ध किया था.

मोदी जी द्वारा जटायु के उल्लेख के बाद लोगों में इस बात की दिलचस्पी बढ़ी कि जटायु ने ऐसा किया क्या था कि मोदी जी ने उन्हें आतंकवाद के खिलाफ पहला युद्ध करने वाला बताया.

अक्सर लोग इस प्रसंग को जानतें हैं कि रावण माता सीता का हरण कर पुष्पक विमान में लंका ले जा रहा था, तब माता सीता की कातर पुकार सुनकर जटायु ने पहले तो रावण को उसका धर्म याद दिलाते हुए कहा था कि “अरे रावण, तू एक पर-स्त्री का अपहरण कर के ले जा रहा है. एक राजा होकर तू ऐसा निन्दनीय कर्म कैसे कर रहा है? राजा का धर्म तो पर-स्त्री की रक्षा करना है और तू काम के वशीभूत हो कर अपना विवेक खो बैठा है, मेरे समक्ष तू इस नारी का हरण नहीं कर सकता, प्राण रहने तक मैं सीता की रक्षा करूँगा”.

पर जब रावण नहीं माना तो उन्होंने उस पर हमला कर दिया, पहले उसके दोनों धनुष तोड़ डाले, फिर रावण के सारथी का वध कर डाला और रावण को घायल कर दिया पर वृद्ध जटायु महाबलशाली रावण का मुकाबला लंबे समय तक नहीं कर सके.

इस युद्ध में रावण ने जटायु के दोनों पंख काट डाले, जिससे वह मरणासन्न स्थिति में पहुँचकर पृथ्वी पर गिर पड़े फिर जब राम और लक्ष्मण सीता माता की खोज करते हुए आये, तब घायल पड़े जटायु ने उन्हें बताया कि आपकी पत्नी को दुष्ट रावण हर कर ले गया और मेरी ये दशा कर दी.

उपरोक्त प्रसंग के अलावा भी जटायु कथा से जुड़े कई ऐसे प्रसंग हैं जो हमारे लिये अनुकरणीय है और जिसे जानना आवश्यक है –

1. महिला सम्मान की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले पक्षीराज को पिता-तुल्य स्थान देते हुए प्रभु ने अपने हाथों से उनका अग्नि-संस्कार किया था फिर इसके पश्चात् दोनों भाइयों ने गोदावरी के तट पर जाकर दिवंगत जटायु को जलांजलि दी थी. हर जीव के साथ प्रेम और उसका यथोचित सम्मान की पुनीत परंपरा जिसे भगवान राम ने स्थापित की थी, उसे याद रखने की आवश्यकता आज हम सबको है.

2. रामायण के अनुसार जटायु कश्यप ऋषि के पुत्र थे और उनके भाई का नाम सम्पाति था जिन्होंने हनुमान जी को सीता का पता बताया था, वृत्तासुर नाम के राक्षस के वध के पश्चात् सम्पाति और जटायु ने तय किया था कि विंध्याचल में सूर्य के छिपने तक उसका पीछा किया जाए.

अधिक ऊपर पहुँचने के कारण जब छोटे भाई जटायु के पंख जलने लगे थे तब सम्पाति ने उन्हें अपने पंखों में छिपा लिया था, जिसके बाद जटायु तो बच गये थे लेकिन सम्पाति के पंख जल गए थे और उन्होंने उड़ने की शक्ति खो दी थी. ये घटना भाईयों के बीच प्रेम और बड़े भाई का छोटे भाई के प्रति स्नेह का एक बड़ा उदहारण है जिसकी ओर अक्सर लोगों की नज़र नहीं जाती.

3. प्रभु राम से भेंट होने के दौरान पक्षीराज जटायु मरण-शैय्या पर थे पर तब भी उन्होंने पत्नी के विरह में शोक-संतप्त श्रीराम को न सिर्फ माता के हरण करने वाले का नाम बताया बल्कि ये कहते हुए उन्हें दिलासा भी दिया कि हे राम ! जिस मुहूर्त में रावण ने सीता का हरण किया है उसका नाम ‘विंद’ है, मुहूर्त शास्त्र के अनुसार उस मुहूर्त में जो भी वस्तु अपहृत या चोरी होती है वो उसके स्वामी को अवश्य मिलती है अतः आप उदास न हों, जानकी आपको अवश्य मिलेंगी.

4. जटायु राम के पिता दशरथ के मित्र थे, अपने पिता के मित्र को भी पिता तुल्य सम्मान देने की सीख भी हमें इस प्रसंग से मिलती है.

जटायु प्रसंग की सबसे बड़ी सीख जो आज के लिये सबसे अधिक प्रासंगिक है वो है महिला सम्मान और हर जीव-जंतु के प्रति अनुराग, जो किसी एक की नहीं हरेक की जिम्मेदारी है, महिला के साथ होने वाले हर अत्याचार के खिलाफ जहाँ आज जटायु बनने की आवश्यकता है वहीं घायल पक्षी को अपने गोद में बिठाकर अपने हाथों से उसके शरीर का रक्त और धूल साफ़ करते श्रीराम का कृत्य जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम, दया और पर्यावरण रक्षण की दृष्टि से पाथेय है.

आने वाले रामनवमी की अग्रिम शुभकामनायें

!! जय जय श्रीराम !! !! जय जय श्रीराम !! !! जय जय श्रीराम !! !! जय जय श्रीराम !!

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