अपनी खोज में

rajeshwar vashishth poem making india in search

आसान नहीं था इतनी भीड़ में
अपने आप को खोजना
पर मैं निकल ही पड़ा

पहचान के लिए
कितनी कम चीज़ें थी मेरे पास
बचपन की कुछ स्मृतियाँ थीं

तुलसी के बड़े से झाड़ के नीचे से
नानी के गोपाल जी को चुराकर
जेब में ठूँसता एक बच्चा

चिड़िया के घौंसले से
उसके बच्चों को निकाल कर
आटे का घोल पिलाता एक शैतान
जिस पर माँ चिल्लाती थी –
अब चिड़िया नहीं सहेजेगी इन बच्चों को
मर गए तो पाप चढ़ेगा तेरे सिर पर

मैथमैटिक्स की क्लास में
अक्सर मिले सिफर को
हैरानी से देखता एक विद्यार्थी
जिसे बहुत बाद में पता चला कि वह तो
आर्यभट्ट का वंशज है

एक पगला नौजवान
जिसे देखते ही
हर लड़की से प्यार हो जाता था
जिसकी डायरी में लिखी थीं वे सब कविताएं
जो वह उन्हें कभी सुना ही नहीं पाया

एक ज़िद्दी अधैर्यवान पुरुष
जिसके लिए पत्नी और बच्चे
किसी फिल्म के किरदार थे
जिन्हें करनी थी एक्टिंग
उसे डायरेक्टर मान कर

एक बेहद कमज़ोर पिता
जो हार कर रोने बैठ जाता था
स्मृतियों का पिटारा खोले
किसी अँधेरे कोने में
जिस में सिर्फ और सिर्फ
होती थीं उसकी बेटियाँ

साँझ तक भटकने के बाद
इस महानगर में
मुझे मिला एक आदमी
कुछ वैसा ही संदिग्ध
चमड़े का थैला और कैमरा लटकाए
खुद से बतियाता हुआ आत्म-मुग्ध

गंगा में पाँव लटकाए हुए
वह देख रहा था आसमान में उड़ते
चिड़ियों के झुंड को
हावड़ा ब्रिज पर उतरती साँझ को
और डूबते हुए सूरज को

उसे पहचानते हुए मुझे लगा
आज ज़िंदगी का एक साल और कम हो गया
आसान नहीं था
यूँ अपने आप को खोजना।

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