जीते तो सब हैं, जो जीत नहीं पा रहे हैं वो शक्ति की आराधना कर लें

navratri motivational thoughts

चाणक्य ने कहा था कि संकल्प अकेले में लेना चाइए. पूरा हुआ तो ढिंढोरा पीटो, नहीं हुआ तो चुप बैठ जाओ.

अपने को उल्टा करने की आदत है, संकल्प लेना हो तो सबके सामने लो, कम से कम इज्जत के डर से या पच्चीस लोगों के टोकने से आप मजबूत बने रहेंगे.

अच्छा, अपन ने संकल्प लेना भी छोड़ रखा है, काहे को माथे पे बल देना….. लेकिन लाइफ की गाड़ी को ढील दी तो उसने कमर भी ढीली कर दी…..32 से 35 पर आगए…….कल देखा कि अब ऊपर से झांको तो पैर के पंजे आधे ही दीखते हैं…..बेल्ट का बक्कल कहाँ लगा है इसका तो पता ही नहीं रहता…… जैसे महिलाएं पल्लू-सल्लू ठीक करती रहती हैं वैसे ही बकक्ल छू कर देखना पड़ता है कि symmetry बनी हुई है या नहीं…..

हाँ तो जिंदगी की गाड़ी के लिए ध्यान आया कि गाड़ी में ब्रेक नहीं है, गाड़ी चलती जा रही है ढलान पर….. स्पीड बढ़ती जा रही है….. मजा आता जा रहा है….. लेकिन कोई ऐसा मोड़ आएगा जिसमें आप खाई में उतर जाओगे.

अब ब्रेक लगाने के लिए क्या करें?

कुछ नहीं करना है…… अपने पास A क्लास की जीवन पद्धति है…… मस्त उसको जियो…..
नवरात्री आ गयी है……

खाना तो हर कोई खाता ही है, जिसको लगता है कि खाना उसको खा रहा है, वो इंसान भोजन का व्रत रख ले. दिमाग तो सब चलाते हैं, जिसको लगता है कि दिमाग उनको चलाने लग गया है, वो लोग ध्यान-मनन करें. जीते तो सब हैं, लेकिन जो जीत नहीं पा रहे हैं वो शक्ति की आराधना कर लें.

(आराधना करना मतलब कम से कम शक्ति और उसके आयाम क्या होते हैं वो समझ लें, माला फेरने से चमत्कार न होना भैया)

जिंदा तो सब हैं…… लेकिन जिनको जिंदगी के माने जानना हैं वो इस नए साल के पहले नौ दिन विभिन्न दर्शनों से ज्ञान अर्जित करें……

बाकि पूजा पाठ बहुत ही निजी विषय हैं, किसी पर थोपे न….. न ही चमत्कार के लालच दें….. न ही कर्मकांड में उलझे रहें ….. कुछ सामग्री कम पड़ जाएगी तो भगवान के भाव न बदल जायेंगे…… इन आडम्बरों से निकलिए.

… आपकी वजह से हमारी जीवन पद्धति केवल कुंडली मिलान और नज़र उतारने टाइप चीजों पर अटक कर रह गयी है…..

तो बोलो
जय हो भगवान की…. और जय हो इंसान की

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