जीवन से संवाद : आगे भी जाने न तू, पीछे भी जाने न तू, जो भी है, बस यही एक पल है

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माँ जीवन शैफाली - स्वामी ध्यान विनय (Photo - Ashish Nigam)

दुनिया का सबसे महान चमत्कार पुस्तक लिखने वाले  ऑग मैंडीनो लिखते हैं “कई संगीत रचनाएं, कई पुस्तकें और कई नाटक ऐसे होते हैं जिनकी किसी संगीतकार, कलाकार, लेखक  या नाटककार ने नहीं बल्कि ईश्वर ने रचना की है… इसकी रचना करने वाले लोग तो निमित्त मात्र होते हैं, जो ईश्वर के आदेशानुसार रचना कर रहे थे, ताकि वह अपनी बात हम तक पहुंचा सके”.

मैं कहती हूँ यहाँ पर हर रचना ईश्वर द्वारा ही रची गयी है… फिर चाहे वो कोई सस्ती शायरी हो या चलताऊ सा कोई गीत… कौन से गीत की ध्वनि तरंग आपकी तरंगों से एक सार होकर कोई  मधुर संगीत उत्पन्न कर दे कोई नहीं जानता.. ये बिलकुल वैसा ही है जैसे दो बहुत ही छोटी संख्या का गुणित फल उन दोनों संख्या से बड़ा होता है.

जैसे पिछली बार एक गीत की पृष्ठभूमि पर मैंने प्रेम, प्रतीक्षा और परमात्मा के प्रति अपने कुछ विशेष भाव प्रस्तुत करते हुए लेख लिखा था… गीत के बोल थे.. खाली दिल नहीं जान वी ए मंगदा इश्क दी गली विच कोइ कोई लंगदा…

ऐसे ही पिछले कई दिनों से एक गीत अनजाने में ही याद आया और मन की पृष्ठभूमि पर लगातार बज रहा है…

आगे भी जाने ना तू… पीछे भी जाने ना तू… जो भी है बस यही एक पल है…

अन्जाने सायों का राहों में डेरा है
अन्देखी बाहों ने हम सबको घेरा है
ये पल उजाला है बाक़ी अंधेरा है
ये पल गँवाना न ये पल ही तेरा है
जीनेवाले सोच ले यही वक़्त है, कर ले पूरी आरज़ू
आगे भी जाने न तू, पीछे भी जाने न तू
जो भी है, बस यही एक पल है

तो ब्रह्माण्ड में व्याप्त कौन सी ध्वनि तरंग आपके बचपन से सुने हुए किसी गीत पर सवार होकर पहुँचने वाली है आप खुद भी नहीं जान सकते… क्या ये सब हम खुद करते हैं… नहीं… ये उस ब्रह्माण्ड की योजना के तहत होता है जिसे मैं कायनाती साज़िश कहती हूँ और जिसके ‘साज़िश’ शब्द पर स्वामी ध्यान विनय हमेशा आपत्ति जताते हैं…

योजना तक तो ठीक है… ये साज़िश क्यों?

उनके लिए योजना है क्योंकि उनकी आध्यात्मिक यात्रा उनको उस मुकाम तक ले आई है जहां वो योजना के आगे और उसके पीछे देख पाने की पात्रता रखते हैं…

मेरे लिए तो ये सबकुछ साज़िश के जैसा ही है कि पांच मिनट पहले जो दृश्य या बात सुनकर आप कुंठा की आग में कूद कर खुद को भस्म कर देने पर आतुर हो जाते हैं… पांच मिनट बाद वही दृश्य या बात अपने वास्तविक रूप में प्रकट होती है और आप अपनी ही आग से ककनूस बनकर फिर एक बार ज़िंदा हो जाते हैं…

ये बार बार मरने और जीने की प्रक्रिया सिर्फ इसलिए कि संस्कारों के नाम पर जो आपकी कंडिशनिंग की गयी है, या व्यवस्था के नाम पर जो अनावश्यक बातें मन और आत्मा पर घर कर गयी है उस पूरी व्यवस्था को तहस नहस कर दिया जाए…

बकौल ध्यान बाबा  “विध्वंस और विनाश नए सृजन के लिए”

ये एक तरह का ध्यान है जहां आप अपनी कुंठा, ईर्ष्या, पीड़ा, या आपके स्वभाव का कोई भी ऐसा नकारात्मक भाव जो आपकी आध्यात्मिक यात्रा में अड़चन बन रहा हो, को चरम पर ले जाकर जब उसे विसर्जित करते हैं और उसके बाद कोरी आत्मा पर लिखी नई इबारत और उसके नए अर्थों के साथ आपका व्यक्तित्व एक बार फिर नया हो जाता है…

पूर्व जन्म की झलकियाँ और आने वाले समय की योजनाओं के बीच झूलते मेरे वर्तमान पर पूर्ण साक्षी भाव के वरदान को प्राप्त करने के लिए कायनात की साज़िश में फंसने और उसे भोगने का श्राप मिला तो बस यही गीत मन की पृष्ठभूमि पर बजता रहा…

आगे भी जाने जा नू पीछे भी जाने ना तून जो भी है बस यही एक पल है…

और नवरात्रि के पहले की ध्यान की इस पूरी प्रक्रिया से गुजरने के बाद नवरात्रि के दौरान हो रहे जादू को साक्षी भाव से देखते हुए ध्यान बाबा का हमेशा की तरह मिला एक नया आशीर्वाद –

ये नवरात्रि गुज़र जाने के बाद तो इन दिनों की याद भर रह जाएगी
कुछ निरालापन है, वो अभी है, वर्तमान में.
बाद में तो विश्लेषण करने की बात रह जाएगी.
हाँ, ये सच है कि इन दिनों के निरालेपन को जीकर, उसमें नहा कर, उसमें सराबोर होकर, हम कितने निराले हुए, यह ज़रूर देखेंगे..

कौन है वो साहब… कबीर… रहीम… दादू या कोई और… जो कह रहा था उस दिन….
पता नहीं कहाँ की गली इतनी संकरी है, जिसमें दो समाते ही नहीं…
मिलना तो संगम है… जब तक नहीं होता मिलना तब तक ही दिखती है गंगा, यमुना
संगम के बाद?

फिर जिस नाम से चाहें पुकार लें…

उनकी बात को मोहर लगाते हुए याद आई दिनेश कुशवाह की कविता –
इसी काया में मोक्ष

बहुत दिनों से मैं
किसी ऐसे आदमी से मिलना चाहता हूँ
जिसे देखते ही लगे
इसी से तो मिलना था
पिछले कई जन्मों से…

यह देह रोज ही जन्मे, रोज ही मरे
झरे हरसिंगार की तरह
जिसे पाकर मन
फूलकर कुप्पा हो जाए….

बहुत दिनों से मैं
किसी ऐसे आदमी से मिलना चाहता हूँ
जिसे देखते ही लगे
अगर पूरी दुनिया अपनी आँखों नहीं देखी
तो भी यह जन्म व्यर्थ नहीं गया
कि पा गया मैं उसे
जिसे मेरे पुरखे गंगा नहाकर पाते थे..

किसी को मैं अपना कलेजा
निकालकर देना चाहता हूँ
मुद्दतों से मेरे सीने में
भर गया है अपार मर्म

मैं चाहता हूँ कोई
मेरे पास भूखे शिशु की तरह आए ….

कोई मथ डाले मेरे भीतर का समुद्र
और निकाल ले सारे रतन
कि मुझे भी देखकर किसी की छातियों में
दूध उतर आए..

मैं जानना चाहता हूँ
कैसा होता है मन की सुन्दरता का मानसरोवर…

और ये मन का मानसरोवर देखने के लिए भूत की सारी नदियों और भविष्य के सारे समन्दरों को कूद जाना पड़ता है वर्तमान के उस पल में जिसके आगे भी जाने न तू, पीछे भी जाने न तू
जो भी है, बस यही एक पल है…

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