युद्ध में कोई भी मासूम नहीं है

फ्रांस के एक मशहूर दार्शनिक हुए है ज्यां पॉल सार्त्र, जिनको मैंने 80 के दशक में पढ़ना शुरू किया था लेकिन फिर वह इतने गूढ़ लगे कि उनको मैंने पढ़ना बन्द कर दिया और दर्शनशास्त्र से ही तौबा कर ली.

उनकी एक पुस्तक जिसने मुझे सबसे ज्यादा बेचैन किया, वह थी Existentialism and Humanism (अस्तित्ववाद और मानवता).

इसको जब शुरू में पढ़ना शुरू किया था तब समझ में नहीं आयी थी लेकिन जब आज उस पर पढ़ रहा हूँ तो पूरी तरह समझ में आ रहा है.

सार्त्र ने उसमे कहा है कि,

जीवन में कुछ भी दुर्घटना नहीं है. समाज में कोई भी घटना होती है और उससे हम आत्मग्रस्त हो जाते है तो वह बाहरी प्रभाव से नहीं होता है, बल्कि हमारे अंदर से आता है.

यदि हम युद्ध के वातावरण में प्रतिभागी हो रहे हैं तो यह हमारा युद्ध है, यह हमारी ही प्रतिकृति है और हम उसके ही पात्र है. इस युद्ध से पड़ने वाले प्रभावों के दायी भी हम ही हैं क्योंकि इस युद्ध से अपने को अलग रहने का निर्णय हमारे ही हाथ में होता है.

यदि आप युद्ध से अपने आप को अलग नहीं कर पाते है तो इस युद्ध का चुनाव भी आपका ही किया माना जायेगा. हो सकता है कि हम युद्ध में इस डर से शामिल है कि लोगों का दबाव है और यह डर होता है कि लोग क्या कहेंगे?

यह भी हो सकता है कि हम इस युद्ध के कारणों में विश्वास रखते है और उसको संरक्षित रखने में फ़ख्र महसूस करते है.

यह भी सम्भव है कि आप को लगता है कि आपने तो स्वयं युद्ध में भाग नहीं लिया है बल्कि आप सिर्फ उसमे निमित्त मात्र सहयोगी है, इस लिए आप क्षम्य है, लेकिन क्योंकि आप इस युद्ध के होने के कारकों में से एक है इसलिए आप इस युद्ध से होने वाली प्रतिक्रिया से अपने आप को अलग नहीं कर सकते है. यहां, जूल्स रोमैन्स की इस बात पर पूरी तरह सहमत हूँ कि “In war there are no innocent victims.” युद्ध में कोई भी मासूम नहीं है.

इतनी भारी भरकम बात मैंने इस लिए लिखी है, क्योंकि कश्मीर में 1947 से ही युद्ध हो रहा है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की इस युद्ध का कारण 1947 का बंटवारा है या 1948 के बाद से ही पाकिस्तान द्वारा आक्रमण और कश्मीर में आतंकवाद और अलगावाद बढ़ावा देना है.

इससे भी नहीं अब फर्क पड़ता कि नेहरू, शेख अब्दुल्ला, मुफ़्ती या हुर्रियत ने क्या सही किया या गलत किया है. यहां इसका भी कोई मतलब नहीं है कि कश्मीरी राजिनैतिज्ञों ने किस तरह से कश्मीर को लूटा और बर्बाद किया है.

अंतिम सत्य यही है कि भारत युद्ध में है और इस युद्ध में हर वह शख्स जो भारत की अस्मिता और अखंडता को हाथों में बंदूक या पत्थर उठा कर चुनौती दे रहा है या फिर वह लोग जो उनको मानवतावाद और लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर बौद्धिक और वैचारिक समर्थन दे रहे है, वह अपने को इस युद्ध में अपनी सहभागिता के अक्षम्य अपराध से मुक्त नहीं हो सकते है.

वह सिर्फ और सिर्फ भारत के शत्रु है और उनको उसी परिणाम की अपेक्षा रखनी चाहिए जो एक आतंकवादी की गिरी हुई लाश में परिलक्षित होती है.

मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि कोई भी संवैधानिक व्यवस्था, कोई भी लोकतंत्र का स्तम्भ, कोई भी बौद्धिकता और कोई भी शख्स, वह चाहे बुड्ढा हो, जवान हो, बच्चा हो, महिला हो, हिन्दू हो, सिख हो, ईसाई हो या मुसलमान हो, वह भारत की अस्मिता और अखंडता से ऊपर हो ही नहीं सकता है.

गोली मारनी है तो मार देना चाहिए, लाशें बिछती है तो बिछा देना चाहिए क्योंकि कश्मीर में शुरुआत, कश्मीरियत के इस्लामवाद के खात्मे से ही होगी.

यहां कोई भी मासूम नहीं है.

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