प्रथा अमानवीय है तो क्या फ़र्क पड़ता है कि इस्लाम सम्मत है या नहीं!

पिछले कुछ सालों में न्यूज चैनल्स पर तीन तलाक के मुद्दे पर बहुत डिबेट कराई गयी. इन डिबेट्स में हिस्सा लेने वालों में तीन तलाक का विरोध करने वाली एक मुस्लिम महिला, समर्थन करने वाला एक मुस्लिम पुरुष, विरोध करने वाला एक भाजपा प्रवक्ता, टालमटोल करने वाले दो तीन अन्य पार्टियों के प्रवक्ता… इतने लोग कम से कम शामिल रहते हैं.

अभी तक जितनी डिबेट्स देखीं लगभग सबमें इतनी बातें कॉमन दिखती हैं. मैंने नहीं देखा कोई मुस्लिम पुरुष जो तीन तलाक का विरोध करे, कोई ऐसी मुस्लिम महिला जो इसका समर्थन करे. भाजपा तो हमेशा इसका विरोध करती आयी ही है, बाकी पार्टियों को वोटबैंक की लालच में मुस्लिम तुष्टिकरण करना है इसलिये वो लोग डिबेट में बस यूँ ही टाईमपास करते रहते हैं.

इस बहस में हिंदुओं को हटाकर सिर्फ मुस्लिम पुरुषो और मुस्लिम महिलाओं द्वारा अपने अपने पक्षों में दिये जाने वाले तर्कों पर गौर करें तो वो कुछ ऐसे होते हैं…

मुस्लिम पुरुष कहता है कि तीन तलाक इस्लाम सम्मत है…. अल्लाह का बनाया क़ानून है… मुस्लिम औरत कहती हैं ये सब बातें मजहबी ठेकेदारों द्वारा थोपी हुई हैं… क़ुरआन में इसका कहीं कोई जिक्र नहीं….

मेरा सवाल मुस्लिम महिलाओं से है…..ये बताइये तीन तलाक जैसी प्रथा अगर आपकी नजरों में अमानवीय है तो इससे क्या फर्क पड़ता है वो इस्लाम के हिसाब से जायज है या गैरजायज?

अगर कोई इस्लामिक विद्वान् सिद्ध कर दे कि ये पूर्णतः इस्लामसम्मत और शरीयत के अनुसार है, अल्लाह का आदेश है तो फिर क्या तीन तलाक प्रथा अमानवीय नहीं रहेगी?

अपने हक की बात करते हुये क्यों आपको उसे कुरआन के हिसाब से जस्टिफाई करने की जरूरत होती है? दुनिया में क्या सही है, क्या गलत क्या ये कुरआन तय करेगी?

एक मजहब जो अब तक अपनी जांच से बचता आया है, जो ऐसी कोशिश करने वालों का हिंसक दमन करता है, जो सवाल पूछने की इजाजत नहीं देता, जो आपको स्वविवेक से सही-गलत का फैसला करने का हक नहीं देता, जहाँ आपको अपने हर अधिकार की मांग के लिये उसे कुरआन सम्मत साबित करना मजबूरी है… उस मजहब और उसके ठेकेदारों से आपको किस आधार पर न्याय की उम्मीद है!

जिस दिन ये मुस्लिम महिलायें अपने मन से डर निकालकर मजहबी दायरे से बाहर निकलने की हिम्मत करना शुरू कर देंगी, उस दिन इस्लाम अपने असली रूप में नंगा होकर सड़कों पर तांडव शुरू करेगा…

तब दलाल पत्रकारों, साहित्यकारों को समझ आयेगा कि असहिष्णुता कहते किसे हैं….आज नहीं तो कल ऐसा होना ही है… असंतोष को हमेशा के लिये नहीं दबाया जा सकता… दमन की उम्र लंबी हो सकती है पर उसकी भी एक सीमा होती है.

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