रामकृष्ण से रामकृष्ण परमहँस बनने का अवसर देती नवरात्रि

चैत्र से ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है और शीत की विदाई. जब ऋतु परिवर्तन होता है तब भौतिक जगत में भी हलचल प्रारम्भ हो जाता है. वृक्ष, लता, वनस्पति, जल, आकाश और वायु-मण्डल सभी में परिवर्तन होने लगता है.

जब इतने सारे परिवर्तन होंगे तो उसका प्रभाव मानव शरीर पर भी निश्चित रूप से पड़ेगा ही. ऋतुओं के संधि-काल का हमारे स्वास्थ्य पर विशेष प्रभाव होता है. शरद ऋतु का जमा हुआ कफ चैत्र की गर्मी से पिघलना प्रारम्भ कर देता है. वात-और पित्त भी अपना स्वरूप बदलने लगते हैं.

वेदों में “जीवेम शरदः शतम ” की प्रार्थना की गयी है. हम भी बस सुन कर प्रियजनों के लिए “जीवेम शरदः शतम “की प्रार्थना करते हैं. परंतु इसका वास्तविक अर्थ क्या है इस पर विचार नहीं करते हैं.

सौ शरद अर्थात शरत काल के बाद तक ही क्यों जीना?? सौ वर्षा काल या सौ ग्रीष्म, वसन्त, हेमन्त या शिशिर काल क्यों नहीं? शरद ऋतु का प्रकोप भयावह होता है यदि शरद कुशलता से बीत जाए तो पूरे वर्ष जीने की आशा बढ़ जाती है इसलिए शरद को ही मानक रखा गया है.

हमारे पूर्वजों ने सर्दी और गर्मी के संधिकाल के महीनों में शरीर को स्वस्थ रखने के लिए नौ दिनों तक व्रत का नियम बनाया. इन नौ दिनों में पूजा के लिए फूल आदि लेने सुबह जल्दी उठ कर बाहर जाना ही पड़ता है.

पहले तो लोग वन में जाते थे फल-फूल आदि लाने क्योंकि फ्रिज नहीं था. इसी बहाने सुबह की स्वच्छ वायु का सेवन हो जाता था जो स्वास्थ्य के लिए गुणकारी है. आयुर्वेद में कहा गया है “वसंते भ्रमणम पथ्यम ”

नौ दिनों तक घर में अखण्ड दीप जलाने का भी विधान है, सुबह-शाम पूजा में धूप-अगरबत्ती, कर्पूर आदि जलाया जाता है जिसके धुँए से इस सन्धिकाल में उत्पन्न होने वाले कीटाणु नष्ट हो जाते हैं.

जिस स्थान का वायु मण्डल शुद्ध रहेगा उस स्थान में रहने वाले भी स्वस्थ रहेंगे. इस तरह नवरात्र का विधिवत अनुष्ठान जहाँ शारीरिक शक्ति वर्धक है वहीं मानसिक शक्ति-संचय के लिए भी उपयोगी है.

नौ दिनों तक दुर्गा सप्तशती, देवी भागवत, रामचरित मानस आदि सुप्त आत्माओं में प्राण फुँकने वाले उदात्त -चरित्रों का पारायण करने से मानसिक शक्ति के विकसित होता ही है.

एक और विशेषता है वसन्त के मादक दिनों में मन में विषय-वासना की तरंगें भी चरम पर होती हैं. दस दिनों तक तामसिक भोजन से दूर सात्विक कर्म के साथ फलाहार करते हुए भूमि शयन के साथ ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है.

और माँ जगदम्बिका के वीर-वीरांगना चरित्र का पाठ वह मानसिक बल देता है जो “स्त्रियः सम्सतः सकला जगत्सु ” अर्थात विश्व की संपूर्ण स्त्रियाँ जगदम्बा का ही रूप हैं का भाव देता है.

इससे आध्यात्मिक शक्ति भी बढ़ती है क्योंकि श्रद्धा के साथ किसी मन्त्र या ग्रन्थ के अर्थ को हृदयंगम करके उसके गुणों को आत्मसात करके रामकृष्ण से रामकृष्ण परमहँस बन सकते हैं. ऐसा अवसर नवरात्र देता है.

हमने अपनी सुविधानुसार इस विधान के कुछ कामों की खानापूर्ति करनी शुरू कर दी. वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि दादी आदि बुजुर्गों का आग्रह रहता है. फलस्वरूप शारीरिक मानसिक और आध्यात्मिक पतन में दिन-प्रतिदिन बढ़ोतरी हो रही है.

जो इस नियम का पालन कर रहे हैं उनसे अपनी तुलना करके एक बार विचार कर लें कि आप उनके सामने कहाँ टिकते हैं.

सर्वविदित उदहारण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी का है. हम सबसे ज्यादा शारीरिक और मानसिक शक्ति उनके पास है. आध्यात्मिक शक्ति का पता नहीं लगाया जा सकता है पर निश्चित ही हमसे ज्यादा ही होगी.

अभी भी समय है….. लौट चलें पूर्वजों के पथ पर….. हम बदलेंगे तो जग बदलेगा.

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