हमें भी अच्छे ही लगते हैं धूल चाटते विरोधी

एक विख्यात उद्योगपति का किस्सा सिक्स सिग्मा पढ़ाते वक्त सुनाया जाता है. किस्सा कुछ यूँ था की अपनी फैक्ट्री के फ्लोर का जब भी वो दौरा करते तो मजदूरों के शौचालयों के पास से बड़ी बदबू आती. उनके खुद के इस्तेमाल के लिए भी थोड़ी दूर अफसरों वाला शौचालय था.

उन्होंने पूछा कि सफाई क्यों नहीं होती यहाँ ? पता चला कि सफाई बराबर होती है, लेकिन मजदूर लाख सिखाने पर भी साफ़-सफाई का ख़याल नहीं रखते तो फिर से बदबू हो ही जाती है. हाइजिन की महंगी ट्रेनिंग का फायदा नहीं होता था.

अब स्टालिन-माओ टाइप सरकार तो थी नहीं इलाके में इसलिए मार मार कर, या 14-15 घंटे लगातार काम करवा कर तो मजदूरों को सुधारा नहीं जा सकता था. मगर तेज दिमाग वाला नहीं होता तो उद्योगपति महान क्यों होता?

उसने बड़ा आसान सा नुस्खा अपनाया. उसने अफसरों के शौचालय का बोर्ड लाकर मजदूरों वाले पर, और मजदूरों वाले का बोर्ड ले जा कर अफसरों वाले पर लगा दिया.

अचानक ही जब इस तरह अफसर-मजदूर के शौचालयों की अदला बदली होने लगी तो सफाई कर्मी भी दोनों पर मेहनत करने लगे और मजदूर भी सुधर गए.

कभी कभी महंगी ट्रेनिंग से आसान तरीके भी सुधार के लिए इस्तेमाल होते हैं. जिनकी याददाश्त अच्छी होगी उन्हें उतपत देस वाले आज़म खान की भैंसों की चोरी वाला दौर जरूर याद होगा.

जो चार दिन उनकी भैंस ढूँढने में पुलिस ने लगाए थे उसमें उत्तर प्रदेश की पशु चोरी की कलई खुल गई थी. कैसे जानवर चोरी कर लिए जाते हैं और उनकी रिपोर्ट पुलिस वैसे ही नहीं लिखती जैसे मोबाइल फ़ोन के चोरी की नहीं लिखती.

अख़लाक़ वाला काण्ड उसके थोड़े ही दिन बाद हुआ था. उसी दौर में पशु चोरों ने एक पशु चुराने में पुजारी की हत्या भी कर दी थी.

अब सीधा सा हिसाब ये है कि चोरी के माल को गायब करना पड़ता है. चोरी के माल के साथ जो पकड़ा गया उसे नौ साल की सजा होती है, माल के साथ ना हो तो चोरी साबित होने पर भी सजा बहुत कम होगी.

पशु को गायब करने का सबसे आसान तरीका था उसे बूचड़खाने में बेच देना. रान-चांप और कीमे में क्या साबित होगा कौन सी भैंस, कौन से बैल, कौन सी बकरी, कौन से कुत्ते और कौन सी गाय का है?

चोरी, लूट, ठगी, कोई भी अवैध धंधा अकेले से नहीं चलता. अवैध माल को उठाने, एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने, बेचने के लिए दर्ज़नो लोग चाहिए.

साठ प्रतिशत से ऊपर की आबादी जो ग्रामीण है, उसके पास ही पशु होते हैं. पशु शहरों-नगरों में नहीं पाले जाते. अचानक अवैध बूचड़खानों के बंद होने से कई पशुपालक ग्रामीणों ने राहत की सांस ली होगी.

अब उसे पता है कि उसका प्यारा बैल रातों रात किसी कसाबी छुरे के नीचे नहीं जाएगा. लपलपाती, रक्तपिपासु जिह्वा, और नुकीले दांतों को मांस ना मिलते देख जो बुद्धिपिशाच कलम का मुजरा दिखा-दिखा कर छाती कूट कुहर्रम कर रहे हैं, उन्हें देख के गाँव का पशुपालक, गरीब किसान मुस्कुरा रहा होगा.

बाकी जैसे नोटबंदी पर पिछला लड़ा था, वैसे ही बूचड़खाना बंदी पर अगला लड़ लीजिये. धूल चाटते विरोधी हमें भी अच्छे ही लगते हैं.

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