फ़िल्म समीक्षा: Anaarkali Of Aarah

अविनाश दास कहते हैं कि यूपी न होता तो अनारकली नहीं होती. ये तो सही है लेकिन ये मात्र ऐतिहासिक है जिसे जीवंत आरा ने किया है अनारकली को आरा ने ही इतिहास बनाया है.

अनारकली की वेदना तो हमारे इतिहास में निहित है किंतु ये आरा ने प्रचंड वेदना में बदल दिया जिसे ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ में बड़े ही मार्मिक ढंग से उसकी वेदना को उजागर किया है.

अनारकली मदिरा है, बड़प्पन की मौज है, राजाओं से लेकर अमीर शहजादों की नुमाइश मात्र बन कर रह गई है. उसकी वेदना को न तो यह समाज न तो अमीरजादें इसकी नुमाइश की हद समझ पाए.

ये फिल्म बिहार के आरा जिले की एक गायिका नर्तकी के जीवन संघर्ष पर आधारित है जो नाचना चाहती है गाना चाहती है मगर अपने जिस्म को सरेआम नहीं करना चाहती है. जो आज के जिस्म की नुमाइश करने वालों को रास नहीं आया और उसे समाज में नीचा दिखाने का हर संभव प्रयास करने लगे अंत में उसे देह व्यापार का घिनौना अपराध उसके मथ्थे मढ ही देते हैं. मगर वह हारना नहीं जानती थी, उसका लड़ने का आत्मविश्वास उसे खूंखार शेरनी में तब्दील कर देता है.

अनारकली कहती है पर्दे की वस्तु पर्दे में ही रहे तो बेहतर है. उसे सरेआम नोचने का अंजाम क्या होगा ये हम तुम्हें दिखा देंगे और अंत में वैसा ही कर के साबित कर दिया कि नारी शक्ति के हनन का दुष्परिणाम क्या हो सकता है.

अनारकली के स्वतंत्र रूप से अपनी मर्यादाओं में जीने के अरमान ने उसे काँटों पर चलना सिखा दिया और नारी सशक्तिकरण की राह उज्ज्वल कर दी.

अनारकली दिखा देती है उस तमाशबीन समाज को कि बदनाम करके उसके जीवन की हत्या की जा सके ऐसा तुम कर नहीं सकते हमारी भी कुछ औकात है, हदे हैं.

यह फिल्म मसाला फिल्मों से हट कर एक स्टेज शो पर आधारित यथार्थवाद को समाये हुए है. यह फिल्म कोई रोमांटिक या थ्रिलर टाइप नहीं, यह एक अलग टाइप की अपनी अमिट छाप के लिए जानी पहचानी जायेगी.

इंटरवल से पहले अनारकली के नाच में कामुकता तो है. किन्तु उसके चेहरे का तीखापन, कड़वाहट उसे अलग करके सजग भी बनाता है. किंतु इंटरवल के बाद के अनारकली के नाच में कामुकता नहीं अपितु एक तांडव है जो अंतरात्मा को हिला देती है और जैसे वह बिना हथियार से मानो वध ही कर देती है.
– हरेन्द्र बंधु

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