हिन्दू जीवन शैली : याद रखो, ब्रह्मास्त्र हमारे पास है!

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एक व्यक्ति जब अकेला होता है तो उसका अपना सकारात्मक और नकारात्मक आभामंडल होता है. जिसके अनुसार वह अपने कर्म करता है और उन कर्मों का फल भी प्राप्त करता है. व्यक्ति में अपने कर्मों के परिणामों को देखकर, उससे सबक लेते हुए नकारात्मकता को हटाने की क्षमता होती है जिसके फलस्वरूप वो उन्नति करता है…

ऐसे ही व्यक्ति का समूह जब आपस में किसी सद्कार्य के लिए मिलता है तो उस समूह की अपनी ऊर्जा होती है जो उस कार्य को सफल बनाने में मददगार होती है.

किसी अन्य “रिलिजन” की बात न करते हुए सिर्फ इतना कहूंगी जब हिन्दुओं का ऐसा समूह किसी सद्कार्य के लिए इकठ्ठा होता है, तो उनमें उपस्थित दो चार नकारात्मक लोगों की भावना भी बदल कर सकारात्मक हो जाती है. ये केवल उन लोगों के साथ होता है जो व्यक्ति की चेतना, सामूहिक ऊर्जा और सर्वोच्च सत्ता पर विश्वास और आस्था रखता हो. तब उनकी आस्था उन्हें हमेशा सकारात्मक रास्ते की ओर ही अग्रसर करेगी..

अब आइये एक ऐसे व्यक्ति का उदाहरण लेते हैं जो किसी सर्वोच्च सत्ता, सामूहिक ऊर्जा या अपनी खुद के आभामंडल पर भी विश्वास नहीं रखता (हालांकि ऊर्जा क्षेत्र वहां भी है), ऐसे व्यक्तियों का समूह जब इकठ्ठा होता है तो उनका समूह एक ऐसे नकारात्मक उद्देश्यों को जन्म देता है जिसे भले कुछ पाने की लालसा न हो लेकिन उनमें से किसी एक को किसी बच्चे की गेंद भी छू जाए, खासकर बच्चा हिन्दू परिवार से हो तो उनकी सामूहिक नकारात्मक ऊर्जा उनके व्यक्तिगत स्वभाव पर हावी हो जाती है… और फिर शुरू होता है विनाश का खेल.

अब इसका दूसरा पहलू ये भी हो सकता है कि जब सकारात्मक और नकारात्मक शक्तियों का युद्ध होता है तो कई जीवन बलिदान होते हैं… कभी किसी घोड़े को अपनी टांग गंवाना पड़ती है, किसी डॉ नारंग को अपनी जान. लेकिन युद्ध में जब किसी सिपाही की जान चली जाती है तो योद्धाओं का क्रोध और अपने समूह की रक्षा का उद्घोष और ज्वलंत हो जाता है…

चाहे भौतिक रूप से कहीं कोई हलचल दिखाई न दे रही हो लेकिन हमारी आपकी सामूहिक ऊर्जा ने ब्रह्माण्ड की तरंगों को विचलित कर दिया है. और ब्रह्माण्ड की ऊर्जा उसी का साथ देती है जो धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करता है, सकारात्मक परिणामों के लिए युद्ध करता है, प्रेम की रक्षा के लिए युद्ध करता है…

अपनी ऊर्जा को और बढ़ाओ, क्योंकि चेतना की इस रहस्यमयी शक्तियों को केवल हम जानते हैं और मानते हैं…. यह आख़िरी ब्रह्मास्त्र केवल हमारे पास है जिससे आपको हिंसा को फ़तेह करना है ताकि हमारी आने वाली पीढ़ी अहिंसक वातावरण में सांस ले सके और और धर्म की वास्तविक परिभाषा को समझ सके.

और हाँ युद्ध हमेशा तलवारों से नहीं लड़ा जाता, शब्दों की ताकत और अपनी ऊर्जा को पहचानिए…. ये अलग बात है कि आत्मरक्षा के लिए तलवार रखने में भी कोई हर्ज़ नहीं.

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