सामान्य और वैकल्पिक दवाओं का सच और अर्थक्रांति से समाधान

पिछले काफी समय से दवाओं के लिए सस्ती Generic दवाओं के विकल्प पर बात कही जा रही है. एक ही दवाई के कई अलग अलग कंपनियों के विभिन्न दाम और वहीं पर सस्ती Generic दवाओं पर लोग काम कर रहे हैं.

कई सरकारी और गैर सरकारी वेब साइट भी अब यह जानकारी दे रही हैं. परन्तु फिर भी इसका असर आम जनता के लिए अधिक नहीं हो पा रहा है. आइये ज़रा इसके कानूनी प्रावधान और सरकारी कोशिशों को विस्तार से समझें.

आज दवा का कारोबार जिस तेज़ी से बढ़ रहा है उतनी तेज़ी से कोई भी कारोबार नहीं बढ़ रहा है. Forbes की जारी सूची के अनुसार भारत के शीर्ष के 100 अमीर व्यक्तियों की कुल संपत्ति 129.2 बिलियन डॉलर है यानि लगभग 77.5 लाख करोड़ है.

इसमें से मात्र दवा कारोबार से जुड़े लोगों की संपत्ति 26 लाख करोड़ है. शीर्षस्थ 100 अमीरों मे 14 व्यक्ति मात्र इसी उद्योग से जुड़े हैं. आप यह भी जान लें कि 2005 में इस उद्योग का परिमाण था 6 बिलीयन डॉलर यानि 36000 करोड़ रुपये और 2016 के आंकड़े बताते हैं कि यह 37 बिलीयन डॉलर यानि 2,22,000 करोड़ रुपये. मतलब 10 वर्षों मे उद्योग 600 प्रतिशत यानि प्रति वर्ष 60% की दर से बढ़ रहा है.

इसके अतिरिक्त एक और बात समझने के लिए हैं कि WTO के प्रावधानों के अनुसार अब अस्पताल समाज सेवा न हो कर एक व्यवसाय बन चुका है जो बाजारी शक्तियों के अधीन है. इसी प्रकार शिक्षा संस्थान भी बाजारी शक्तियों के अधीन हो गया है. अब सरकार के प्रावधानों को समझें.

सरकार ने सबसे पहले 2003 में एक निर्देश दिया जिसके बाद डॉक्टर यानि चिकित्सक दवा का सामान्य नाम या उसमें प्रयुक्त रसायन को लिखना है –

The Indian Medical Council (Professional Conduct, Etiquette and Ethics) Regulations, 2002 states, “Every physician should, as far as possible, prescribe drugs with generic names and he/she shall ensure that there is a rational prescription and use of drugs.”

और फिर अक्तूबर 2016 में इसे अनिवार्य कर दिया गया है. परन्तु यह अभी तक क्रियान्वित नहीं हुआ है क्योंकि न लिखने पर किसी भी प्रकार के दंड का प्रावधान नहीं है. और इसे दवा कंपनियों की लॉबी रोक रही है.

अब ज़रा चिकित्सक का रुख भी समझ लीजिये. आम देश में यह माना जा रहा है और प्रचार किया जा रहा है कि चिकित्सक को सिर्फ पैसा कमाना है उसे आपकी चिंता नहीं है. यह हर एक के लिए सत्य नहीं है.

एक चिकित्सक का, अगर मान भी लिया जाये कि मात्र व्यावसायिक नज़रिया है तब भी वह चाहता है कि मेरा मरीज या रोगी अभी जल्द से जल्द ठीक ही जाये. तो जिस दवा पर उसका भरोसा है वह उसी को बताएगा. आज यह भी समझना आवश्यक है कि इतनी सारी generic दावा होने पर भी उन पर कोई गुणवत्ता का दावा नहीं किया जा सकता है. सरकार को सबसे पहले इनकी गुणवत्ता सुनिश्चित करनी पड़ेगी. गुणवत्ता न होने के कारण चिकित्सक को generic पर अभी  तक आत्मविश्वास नहीं है.

हाँ कुछ चिकित्सक ऐसे भी होंगे जो आज करोड़ों रुपये खर्च करके डॉक्टर बने है निजी संस्थानों से उन्होंने जब करोड़ों लगाए हैं तो व्यवसाय के कारण उनसे समाज सेवा की उम्मीद करना हमारी अपनी नादानी ही समझी जाएगी.

इसके मूल कारण को समझ कर आइये समाधान की बात करते हैं. कहीं पर भी यदि निजीकरण पूरे देश के लिए सफल हुआ है तो उसके लिए सरकारी सेवाएँ जिम्मेदार है. यदि देश में सरकारी शिक्षण संस्थाओं का स्तर बेहतर हो जाये और जितनी आवश्यकता है उतनी हो जाये अपने आप आम आदमी का काम हो जाएगा जिसे लाखों की फीस दे कर ऊंचे कॉलेज में पढ़ना है वह पढ़े.

इसी प्रकार पहले सरकार उचित मात्रा में चिकित्सक सरकारी संस्थानो से उचित फीस में तैयार  कर दे और इसी प्रकार उचित गुणवत्ता की दवाई प्रचुर मात्र में उपलब्ध करा दे उसके बाद बाजारी शक्तियाँ अपने आप रास्ते पर चलेंगे. विकल्प के अभाव में ही शोषण हो रहा है.

अब सोचिए यदि अर्थक्रांति जैसे प्रावधानों से सरकार के पास प्रचुर मात्र में धन उपलब्ध हो जाएगा तो सरकार सस्ते चिकित्सक, सस्ते अस्पताल और सस्ती दवाइयाँ बिना गुणवत्ता पर समझौता बना दे. उसके बाद अपने आप यह सब प्रावधान ठीक हो जाएंगे.

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