इतिहास उसी को याद रखता है जिसने इतिहास बनाया… भला या बुरा!

आज जनता में इतनी जागृति तो आ ही चुकी है कि लोग सही-गलत इतिहास को पढ़ाये जाने का महत्व समझ रहे हैं. तो आज बात करते हैं इतिहास पढ़ने के नजरिए की.

आज भारतीय राष्ट्रवादी इस बात को लेकर उद्वेलित हैं कि इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में वामपंथी इतिहासकारों ने हमारे नायकों को स्थान नहीं दिया है या फिर पर्याप्त जगह नहीं दी है.

यह बात अर्धसत्य है.

इस बात में सत्य यह जरूर है कि “हमारे नायकों को स्थान नहीं दिया है या फिर पर्याप्त जगह नहीं दी है.” तो फिर अर्धसत्य काहे का? इसके लिए इतिहास को पढ़ने का सही नजरिया आवश्यक है. क्या होता है इतिहास?

अति सरल शब्दों में कहें तो इतिहास समय की धारा का अध्ययन होता है. कैसे मोड़ आए, किस कारण आए, अगर किन्हीं व्यक्तियों के कारण आए तो उस व्यक्ति के चरित्र का भी विश्लेषण आवश्यक हो जाता है.

अगर किसी व्यक्ति के कारण मोड़ न आया हो तो उस व्यक्ति का कर्तृत्व कितना भी वीरतापूर्ण हो या बलिदानी क्यों न हो, इतिहास के अध्ययन में उसके लिए जगह कम ही हो सकती है.

सवाल यही पूछा जाएगा – क्या उनके कारण इतिहास में बदलाव आया? और आया तो कहाँ तक आया?

समूह की बात हो तो हूण, शक, कुशान, कितने आक्रांता आप को याद हैं? कोई कालक्रम (chronology) याद है कि कब हूण आए, कब कुशान आए, कब शक? कौन पहले आए और कौन बाद में? उनके नेता तथा उनसे लड़ने वाले हमारे राजा या वीर कौन थे? सच कहता हूँ, मुझे भी यह संदर्भ ढूँढने पड़ेंगे.

लेकिन आप को भी ग्रीक सिकंदर याद है. बहुत सारे मुस्लिम आक्रांता याद हैं. कुछ चुनिन्दा अंग्रेज़ नाम भी याद होंगे.

इसका कारण सीधा है जिसको लेकर हम सोचते नहीं है. सिकंदर, मुसलमान और अंग्रेज़. इनके कारण इस देश का इतिहास बदला है. अच्छे के लिए बदला या बुरे के लिए बदला इस बात को अलग रखकर देखें तो भी यह मानना ही पड़ेगा कि इनके कारण हमारे देश का इतिहास बदला जरूर है.

बाबर आप को पता है, अकबर पता है, और औरंगजेब तो आप भूल नहीं सकेंगे. लेकिन हुमायूँ, जहांगीर और शाहजहाँ के कितने कारनामे याद हैं?

याद रहे, किंवदंतियाँ नहीं, तथ्य चाहिए! और यहाँ मैं इतिहास के विद्यार्थियों की बात नहीं करता, केवल आम आदमी की बात करता हूँ. क्योंकि “वही इतिहास एक शस्त्र होता है जो आम नागरिक को पढ़ाया जाता है.”

इस वाक्य को अवतरण चिह्नों में इसलिए रखा है क्यूंकी यह अति महत्व का है, इसे याद रखें.

बुद्ध और महावीर हमें याद है क्योंकि वे बदलाव लाये. सिखों ने अत्याचार से जो अनवरत टक्कर ली है उस संघर्ष को और सिख गुरुओं को अनदेखा नहीं किया जा सकता. लेकिन कितनों को (गैर सिख की बात कर रहा हूँ, सिख भाई बहनों की नहीं) सभी याने दस के दस सिख गुरु पता है?

इतिहास उसी को याद रखता है जिसने इतिहास बनाया है. इतिहास के पैमाने होते हैं, उन पर जो खरा न उतरे उसका उल्लेख नहीं होता.

स्वतन्त्रता संग्राम की बात आती है तो गांधी, नेहरू को इतनी बड़ी जगह क्यूँ मिलती है यह भी आप को अभी तक समझ में आ ही गया होगा. उनके कारण बदलाव हुआ. अच्छा या बुरा इस बात को एक मिनट के लिए दरकिनार करें, तो बदलाव हुआ इस बात को को आप नकार नहीं सकते.

बाकी आप अपने पसंद के व्यक्तित्वों का इस आधार पर मूल्यांकन करें कि उनके कारण कितना बदलाव हुआ. मैं कोई नाम नहीं लेना चाहता, अनावश्यक विवाद का कारण होगा।

हाँ, लेकिन इसे हमारे इतिहासकारों को क्लीन चिट न समझा जाये. वे निष्पक्ष नहीं थे, और निष्पक्षता से मूल्यांकन बिलकुल नहीं किया, सादरीकरण में चुन-चुन कर महिमा मंडन किया, गलत कामों को छुपाया तथा कुछ अच्छे कामों को ही हाइलाइट किया या फिर वास्तविक नायकों को भी कम जगह दी है, यह सभी आरोप झूठ नहीं हैं.

आज तो इससे भी बड़ी बेईमानी जो ये स्वघोषित इतिहासकार कर रहे हैं वो ये हैं कि, यही लोग चुन-चुन कर उपेक्षित नायकों को ढूंढकर उनका महिमा मंडन कर रहे हैं – समाज विखंडन के लिए.

कई जगह तो झूठ भी गढ़ रहे हैं. महिषासुर को लीजिये. ब्राह्मण रावण को आज किसका पूर्वज साबित किया जा रहा है? मुसलमान शासकों ने हमारे वीर भाइयों को अपने कामों के लिए और मान मर्दन के लिए “अछूत” बना दिया और आज वही मुसलमान हिन्दू एकता तोड़ने के लिए दलितों को अपनी ढाल और तलवार दोनों बना रहे हैं.

अंग्रेजों ने विद्रोही वीरों के समाजों को गुनहगार जनजातियाँ (Criminal Tribe) करार दे कर आज तक अभिशप्त जिंदगियाँ जीने को मजबूर किया लेकिन “दलित” शब्द की उत्पत्ति का निष्पक्ष अभ्यास रोचक साबित होगा।

हिन्दू विखंडन में जिनका अनमोल योगदान है वे मनुवाद और ब्राह्मणवाद ये दो कथित वाद शास्त्रों में कहीं उल्लेखित नहीं हैं, ये सीधे “ism” का दुष्ट भाषांतर है.

याने हम वास्तविकता से दूर न हों. मौका है कि सच्चाई सामने आए, और सच्चाई ही आए, एक अतिरंजित झूठ की जगह दूसरा अतिरंजित झूठ स्थापित न किया जाये. सत्यमेव जयते!

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