मौका है, अयोध्या में ज़मीन का एक टुकड़ा देकर बना लीजिए पूरे हिंदुस्तान को अपना

हिदुस्तान के किसी तथाकथित इतिहासकार ने क्या कभी ये सवाल किया कि बाबर नाम से मस्जिद आखिरकार अयोध्या में ही क्यों बनवाई-बनाई गई?

ऐसे ही कई और उदाहरण हो सकते हैं, जिसके मूल में यही है कि हजारों वर्ग किलोमीटर में फैले भारत में इसी तरह के महत्वपूर्ण हिन्दू धार्मिक स्थान ही क्यों चुने गए थे?

कभी नहीं पूछे गए क्योंकि इनके जवाब में कई गुत्थियां खुल जाएंगी. जिन्हें बड़ी चतुराई से सेक्युलरों ने अपनी दूषित मानसिकता के कारण, व्यक्तिगत हित में बौद्धिकता का षड्यन्त्रपूर्वक इस्तेमाल करते हुए ऐतिहासिक तथ्यों को ना केवल दबाये रखा बल्कि भ्रमित भी किया. उलटे बेवजह के तर्क-कुतर्क से उलझाया भी.

अयोध्या श्री राम की जन्म भूमि थी या नहीं थी, इस पर बेवजह की बहस छेड़ने वालों से ये पूछो कि ये आस्था सदियों से थी कि नहीं?

बिलकुल थी, बल्कि बाबर के हिंदुस्तान पर आकर सत्ता हथियाने से भी सदियों पहले से थी. अगर यह कहा जाए कि बाबरी मस्जिद अयोध्या में बनाई इसलिए गयी थी कि सनातन संस्कृति के निशान धीरे-धीरे मिटाये जाएँ, तो गलत नही होगा.

मगर तलवार के जोर पर हुकूमत करने वाले ये नहीं जानते थे कि जमीन पर खड़ी ईंट मिट्टी की इमारत तो आसानी से नष्ट की जा सकती है मगर आस्था-विश्वास को खत्म करना आसान नही.

उस पर भी त्रेता युग से चली आ रही तथ्यात्मक कथा में कुछ विशेष तो होगा जो अनगिनत व्यवधान के बावजूद यहाँ के जन मानस में जीवित रही.

वेदों को श्रुति रूप में सदियों तक पीढी दर पीढी पहुँचाने की विशेषता वाली सभ्यता को समझने में ना केवल मुग़ल शासकों ने भूल की बल्कि तब से लेकर सत्ता द्वारा पाले गए तमाम इतिहासकार लेखक और अब पत्रकार भी नही समझ पाए.

और ना ही आज के विपक्षी नेता समझ पा रहे हैं कि जो षड्यन्त्र इतने वर्षों में सफल नहीं हो सका वो आज के इस संचार युग में कैसे सम्भव है.

उपरोक्त प्रश्न के उत्तर में ना जाएँ तब भी हमारे पुरखों की पीड़ा को तो यहाँ समझा ही जा सकता है. हमें अपने पूर्वजो पर गर्व होना चाहिए कि उन्होंने शारीरिक गुलामी को तो स्वीकार किया मगर अपनी आध्यात्मिक चेतना को संभाले रखा.

अब हम पर इसे बनाये रखने का दायित्व है, जो हम निभा रहे हैं. यह ना केवल सनातन धर्म बल्कि विश्व मानव के कल्याण के लिए भी अब आवश्यक हो गया है.

क्योंकि यही आस्था है जो रामराज की बात करती है. अगर वही समाप्त कर दी जाएगी तो फिर दुनिया में किस-किस तरह के राज बचते हैं हम सब जानते हैं.

बहरहाल सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्म भूमि पर एक अच्छी पहल की है. यही हमारी संस्कृति भी रही है कि सब कुछ होने के बाद भी शांति से बैठ कर हल निकालने का प्रयास करना.

यहाँ यह गौर करने वाली बात है कि बहुमत में और बहुसंख्यक होने पर भी हिन्दू ना तो आक्रामक है, ना ही किसी पर जबरन कब्जा करना उसका स्वभाव है.

वो इतने वर्षों से गंगा जमुना की कहानी में अपनी भूमिका अदा करता रहा है लेकिन अब चाहता है कि दूसरे भी इसका प्रमाण एक बार तो दें. हर बार गंगा-जमुना की जवाबदारी हमारी ही क्यों?

यह तय है कि जिनकी दुकान इस मुद्दे को लटकाये रखने से चल रही है, वो धर्म गुरु , वकील और नेता कभी नही चाहेंगे कि इसका हल निकले.

ऐसे में मुस्लिम समाज के आम जन को आगे आ कर इन पर दबाव बनाना होगा. उन्हें यह समझना होगा कि एक जमीन का छोटा सा टुकड़ा उनके लिए उतना कुछ भी नही मगर हमारे लिए सब कुछ है, तो क्यों ना दे दिया जाए. वैसे भी नमाज तो कहीं भी पढ़ी जा सकती है.

मुस्लिम समाज के सामने यह एक मौका है वो खुद राम मंदिर बनवा कर एक आदर्श उदाहरण विश्व को पेश कर सकते हैं. इसका सन्देश, उनके हित में दूर तक जाएगा.

इस सन्दर्भ में यहाँ पांडव-कौरव के पांच गाँव के कारण होने वाले महाभारत को भी याद किया जा सकता है.

इतिहास से सदा सीखना चाहिए. और फिर यहाँ तो अयोध्या में जमीन का एक टुकड़ा देकर पूरे हिंदुस्तान को अपना बनाया जा सकता है.

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