सरकार ने कार्रवाई नहीं की तो हम नहीं जीत सकेंगे ये लड़ाई

कभी आपके मन में भी टीवी देखते हुए यह ख़याल आता है?

मान लीजिए, आप कहीं ट्रेन से यात्रा कर रहे हों. और सामने वाली सीट पर आकर खबीस कुमार बैठ जाए… आदत के मुताबिक वह सामने वाले का नाम-पता और जात पूछने लगे, और अपना सेक्युलरिज्म फैलाने लगे… संघ को बुरा-भला कहने लगे और हिंदुत्व की बुराइयाँ गिनाने लगे… आप उसे क्या कहेंगे?

मेरे दिमाग में एक काल्पनिक वार्तालाप आता है कि उसे सबके सामने ऐसा घसीटूं कि वह ट्रेन छोड़ कर उतर जाए…

मैं निश्चित हूँ, हम साधारण फेसबुकियों के सामने भी वह पानी भरता नज़र आएगा… पर ऐसा होता नहीं है. कभी किसी को आमने-सामने यह खबीस या खाजदीप नहीं मिलते…

इसे कुछ ऐसे समझें… एक लड़ाई कैसे लड़ी जाती है?

एक आर्मी के फाइटिंग आर्म्स होते हैं… इन्फेंट्री, आर्मर्ड और आर्टिलरी. आर्टिलरी सबसे पहले, सबसे दूर से गोले बरसाती है. फिर आर्मर्ड यानि टैंक आमने-सामने से हमला करते हैं, और दुश्मन के डिफेन्स को ध्वस्त करने के बाद सबसे आखिर में इन्फेंट्री यानि पैदल सैनिक दुश्मन पर गोलियाँ चलाते हुए उनके खंदकों में घुस जाते हैं, पोस्ट पर कब्ज़ा कर लेते हैं.

सोचें, आर्टिलरी इतने किलोमीटर दूर से सटीक बमबारी कैसे करता है. निशाना कैसे लगाता है? तो उसके पास एक तरीका होता है O P, यानि ऑब्जरवेशन पोस्ट. यह आर्टिलरी की एक चौकी होती है जो दुश्मन के इलाके में घुसकर एक ऊँची जगह पर बैठे होते हैं…

वे गिरने वाले गोलों को देखते हैं, और उन्हें दाएं, बाएं… आगे-पीछे कहाँ निशाना लगाना है, यह करेक्शन देते हैं, सही ग्रिड रिफरेन्स बताते हैं…

तभी ना अमेरिका और इंग्लैंड से CNN और BBC भी ठीक निशाना लगा कर ऊना और सोनपेड पर, दादरी और वेमुला पर बमबारी शुरू कर देता है… दलित और मुस्लिम के, भीम-मीम के गठजोड़ बिठाने लगता है…

अब जरा अपने हथियारों पर ध्यान दीजिए… कितना भी बहादुर और कुशल सैनिक हो, वह आर्टिलरी का क्या बिगाड़ पायेगा? आमने सामने की लड़ाई में वह दुश्मन को धूल चटा देगा… चटाई भी है.

2014 से लेकर अभी तक राष्ट्रवाद की पैदल सेना ने हर कदम पर देशद्रोहियों की फौजों को तबाह कर दिया है, उनको उनके खंदकों से निकाल कर खदेड़ खदेड़ कर मारा है, उनकी चौकियों पर कब्ज़ा किया है.

अभी तक हमने कई बड़ी लड़ाइयाँ जीती हैं. दुश्मन जमीन पर कहीं दिखाई नहीं दे रहा. लेकिन वह ख़त्म नहीं हुआ है.

क्योंकि हमारी यह पैदल सेना दुश्मन के टैंकों, तोपों, आर्टिलरी तक नहीं पहुंच सकती. खाजदीप या खबीस कुमार हमारे सामने कहीं नहीं टिकेगा, पर वह हमारे सामने कभी आएगा भी नहीं.

हम अपने तर्कों की संगीनों को कितना भी तेज़ कर लें, निशाना कितना भी दुरुस्त रखें… वो लोग हमारे निशाने पर कभी नहीं आते. उनका चैनल आता है, और हमारे देश के जनमानस पर घंटे भर की घृणा और द्वेष की बमबारी कर के चला जाता है.

फेसबुक और ट्विटर के नाम पर हमारे पास अधिक से अधिक ग्रेनेड लॉन्चर आ गया है जो एकाध किलोमीटर तक एक ग्रेनेड भर का धमाका कर सकता है, हज़ार, दो हज़ार लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकता है… पर दिल्ली में बैठे किसी प्रेस्टीट्यूट को कोई फर्क नहीं पड़ता.

उनकी जमीनी इन्फैंट्री पस्त पड़ गयी है, पर गोले बरसाने की क्षमता उन्हीं के पास है, जिसका प्रयोग वे देश को तोड़ने के लिए करते रहेंगे… अपनी जहरीली गैसें हमारे स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में छोड़ते रहेंगे…

आर्टिलरी से कौन निबट सकता है? या तो आर्टिलरी निबट सकती है, या एयरफोर्स. या तो दूसरा न्यूज़ चैनल बना कर उनके झूठ का उतनी ही मजबूती से पर्दाफाश करें, उन्हें नंगा करें…

या सरकार उन पर हवाई हमले करे… उनके चैनलों को नियम कानून के जाल में फंसाये, कानूनी कार्रवाई के बम गिराए…

हम अधिक से अधिक उनके किसी ऑब्जरवेशन पोस्ट को खोज कर उसे तबाह कर सकते हैं… पर यह लड़ाई हम तब तक नहीं जीत सकते, जब तक इन पर सरकारी कार्रवाई का शिकंजा नहीं कसेगा… खतरा टला भर है… कहीं गया नहीं है…

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