किसने किए 1947 से धर्मनिरपेक्षता के नाम पर दुष्कर्म

हाशिमपुरा या मेरठ दंगे, जिस नाम से आप बुलाना चाहते है बुला लें, वो अब एक प्रतीक बन कर रह गया है. मेरे जहन में आज भी 80 के दशक का वो काल एक दहशत के तर्ज़ पर जिन्दा है.

कौन है जिस को, इन सब के लिए जिम्मेदार हम कह सकते है? आज के माहौल को देखते हुए वो सब नाम गिनाए जा सकते हैं जो उस काल के बाद हुए हर बिखराव और टकराव के जिम्मेदार थे.

हुआ यह कि 80 के दशक के मध्य काल ने जब करवट ली, तो उसने 1947 से हो रहे धर्मनिरपेक्षता के नाम पर, धर्मनिरपेक्ष नेताओं और बुद्धिजीवी वर्ग ने, जितने दुष्कर्म किये थे, वो सामने आ गये.

आप टीवी पर हिन्दू और अन्य धर्मो के बीच के तनाव के लेकर किसी भी बौद्धिक वार्ता को सुन लें या फिर इसी विषय पर कोई गरमा गरम पैनल वार्ता सुन लें, आपको यही बताया जायेगा कि बाबरी मस्जिद कांड ने सब कुछ बदल दिया.

‘वी पी सिंह ने देवीलाल और चंद्रशेखर से अपनी कुर्सी बचाने के लिए आरक्षण पर मंडल कमीशन की सिफारिशों को आनन फानन में लागू किया, तो अडवाणी ने उसके तोड़ के लिए राम लला के जन्म स्थान के मुद्दे को उठा लिया और देश में धार्मिक सौहार्द्रता का आदर्श माहौल, जो कांग्रेस 1947 से बनाये हुए थी, वो ध्वस्त हो गया.’

यह एक सफेद झूठ है, यह एक वैचारिक बेईमानी है, जिसको कांग्रेस बराबर हवा देती रही है और एक एजेंडे के रूप में, वामपंथी बुद्धिजीवी वर्ग, सर्वहारा मीडिया की मदद से, इसको बराबर दो दशको से प्रतिपादित करते रहे हैं.

जरा कल्पना कीजिये 1984 में चुनाव के बाद भारत की संसद में दलगत स्थिति क्या रही होगी? 404 सीट लेकर राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस अपने पूरे जलाल पर थी. जो ताकत उनके नाना, जवाहर लाल नेहरू को और फिर उनकी माँ इंदिरा गांधी को देश की जनता से नही मिली थी, वो राजीव गांधी को मिली.

संसद में तीन चौथाई से ज्यादा थे कांग्रेसी सांसद, कोई भी कानून को बनाना या बदलना उनके लिए बाएँ हाथ का काम था. उनको किसी के सामने गिडग़ड़ाना नहीं था और न ही विपक्ष के लोगो को मनाने की मजबूरी थी. वो देश हित में किसी भी तरीके के कानून को ला सकते थे और संविधान में आवश्यक बदलाव भी ला सकते थे.

लेकिन, सर्वशक्तिमान हो कर भी, तुष्टिकरण को धर्मनिरपेक्षिता की पहली शर्त मानते हुए कांग्रेस ने देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंक दिया.

1985 में सर्वोच्च न्यायालय का एक निर्णय आया, जिसमे एक तलाकशुदा 62 वर्षीय महिला शाहबानो की अपने पति से ‘मासिक गुजारे भत्ते’ की मांग को न केवल जायज ठहराया बल्कि सर्वसम्मति से उच्च न्यायालय के रु. 179.20 रूपये के मासिक भत्ते की रकम को भी जायज ठहराया.

यह एक सीधा सा, मानवीय मूल्यों को बनाये रखते हुए, भारत के संविधान के तहत एक निर्णय था, जिस पर सर्वोच्च न्यायालय की मोहर लगी थी. इसमें किसी को राजनीति नहीं करनी थी, लेकिन मुस्लिम समुदाय के रूढ़िवादी मुस्लिमों ने, इस निर्णय को मुस्लिम समुदाय के मामलो में न्यायालय का अतिक्रमण बना दिया.

शेष पूरा भारत, इस विरोध के स्वर को सुन कर सन्न था. एक पुरातन पंथी विकार को मुस्लिम समुदाय के बहुत थोड़े लोग, लेकिन पढ़े लिखे जिम्मेदार लोग, एक अनर्गल प्रलाप कर, उसे अपने धर्म के ऊपर देश के सर्वोच्च न्यायालय की दखलंदाजी और अपने हक के हनन का सबब बना दिया.

केंद्र सरकार में मंत्री और नए भारत के मुस्लिम वर्ग की आवाज, आरिफ मुहम्मद खान ने, इन रूढ़िवादी कट्टरपंथियों का पुरजोर विरोध किया और मुस्लिम समुदाय को इन कट्टरपंथी, पुरातन पंथियों को नकार कर, नए ज़माने के साथ कदम मिलाने का आह्वान किया.

स्वर्णिम क्षण था, भारत के लोकतंत्र के इतिहास का. सर्वोच्च न्यायालय के एक निर्णय ने कट्टरपंथी जमात को हाशिये पर लाकर खड़ा कर दिया था. 1951 के बाद से हिन्दू पर्सनल लॉ कोड और मुस्लिम पर्सनल लॉ कोड के बीच उपजी वैमनस्यता इस एक निर्णय से समाप्त हो गयी थी.

हिन्दू समाज भी केंद्र शासन और आरिफ मोहम्मद खान सरीखे मुस्लिम नेताओं की तरफ आशा की निगाह से देख रहा था. मुस्लिम समुदाय का कट्टरपंथियों को नकार देना एक ऐसा शुभ संकेत था, जिसको मध्यमार्गी हिन्दू 1947 से देखने को आतुर था.

आरिफ मोहम्मद खान को प्रधानमंत्री राजीव गांधी का विश्वास हासिल था और उस विश्वास पर, आरिफ खान देश को संदेश दे रहे थे कि कांग्रेस सर्वोच्च न्यायालय की अस्मिता को बरकरार रखते हुए कट्टरपंथियों के किसी भी विरोध के सामने नहीं झुकेगी.

वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार में राज्य मंत्री मौलाना जियाउर रहमान अंसारी, शाहबानो के फैसले और आरिफ मोहम्मद खान के विरुद्ध सामने आ गये. वे कांग्रेस के कट्टर मुस्लिम समुदाय का चेहरा थे.

पूरा भारत एक विचित्र विरोधाभास देख रहा था. कांग्रेस ने राजनीति शुरू कर दी थी, एक तरफ वो आरिफ खान के पीछे खड़े दिखाई दे रहे थे, जो नए जमाने के साथ मुस्लिम समाज को जुड़ने का आह्वान कर रहे थे और दूसरी ओर मौलाना अंसारी को कट्टरपंथियों के साथ गलबहियां करने से रोक भी नही रहे थे.

कांग्रेस दोधारी तलवार पर चल रही थी. एक तरफ आरिफ जैसे मुस्लिम नेता को सामने कर के अपने को तटस्थ दिखा रही थी और दूसरी तरफ कट्टरपंथियों को एक सिरे से न नकार कर अपने मतदाता मुस्लिम वोट बैंक से होने वाले नफा और नुकसान का आँकलन कर रही थी.

इसी उत्तेजना के माहौल में, भारतीय संसद में कट्टरपंथियों की जमात का नेतृत्व, किशनगंज के उप चुनाव में, 70,000 वोट से जीते जनता पार्टी के नए सांसद सैयद शाहबुद्दीन ने अपने हाथ में ले लिया.

सैयद शाहबुद्दीन, भारतीय विदेशी सेवा के भूतपूर्व अधिकारी थे और वो किशनगंज से मुलिम वोट पर ही जीत कर संसद आये थे. जो मुस्लिम वोट 1984 तक कांग्रेस को एक तरफा मिल रहा था उसमे सेंध लग चुकी थी और किशनगंज, जहां कांग्रेस 1984 में लोकसभा की सीट जीती थी, वही साल भर बाद मुस्लिम मतों द्वारा नकारे जाने से परेशान हो उठी थी.

रूढ़िवादी और उदारवादी मुस्लिमों के बीच चल रही बहस से कांग्रेस और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को यह समझ में आया कि यदि कानून बना कर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को नहीं पलटा गया तो कांग्रेस को मुस्लिमों का एक बड़ा वोट बैंक, आगामी चुनाव में नहीं मिलेगा और जनता पार्टी और समकक्ष दल उस मुस्लिम वोट बैंक का फायदा ले जाएंगे.

कांग्रेस ने, जिस ने 1947 से ही मुस्लिमों को एक वोट बैंक के तौर पर इस्तेमाल किया था, एक बार फिर, आगामी चुनावों में फायदे के लिए, मुस्लिम समाज में उठ रही उदारवादी आवाज को बलि चढ़ा कर, रूढ़िवादियों और कट्टरपंथियों के हाथों देश और उसके समाज को बेच दिया.

1986 में, कांग्रेस पार्टी ने, जिसे संसद में पूर्ण बहुमत प्राप्त था, एक कानून पास किया जिसने शाह बानो मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को उलट दिया. क्योंकि सरकार को पूर्ण बहुमत प्राप्त था, सर्वोच्च न्यायालय के धर्म-निरपेक्ष निर्णय को उलटने वाला मुस्लिम महिला (तलाक अधिकार सरंक्षण) कानून 1986 आसानी से पास हो गया.

1986 में सर्वोच्च न्यायालय का अनादर, कांग्रेस की सरकार ने धर्मनिरपेक्षिता की नई परिभाषा गढ़ते हुए किया, जिसे मध्यमार्गी हिन्दुओ ने, “मुस्लिम तुष्टिकरण’ के एक वीभत्स रूप में लिया था.

उस दिन हिन्दुओं के एक तटस्थ वर्ग को यह समझ में आ गया था कि भारत में राजनैतिक पार्टियों द्वारा वोट की राजनीति में, मुस्लिम एक वोट बैंक के नाम पर ही बिकेगा और उसके अराजक तत्व हमेशा भारत की संवैधानिक आत्मा को अपने अनुसार तोड़ते और मोड़ते रहेंगे.

1. यही नींव थी बिखराव की, यही नींव थी मंडल की और कमंडल की.
2. यही नींव थी हिंदुओं द्वारा प्रहार के विरुद्ध आक्रामक होने की.
3. यही नींव थी हिंदुओं द्वारा अल्पसंख्यक सिंड्रोम के ब्लैकमेल को नकारने की.
4. यही नींव थी हिंदुओं द्वारा कांग्रेस और वामपंथियों द्वारा हिंदुओं को बहुसंख्यक होने की हीन भावना भरने और उनके तिरस्कार करने की.
5. यही नींव है 1986 के बाद हर उस एक भारतीय की हत्या की, जो कट्टरपंथियों, अल्पसंख्यक तुष्टिकरण और बहुसंख्यक हीन भावना के तराजू में तौल दिया गया.

हाय! मेरे भारत के दो टुकड़े करने के बाद भी समय-समय जो जख्म जानबूझ कर वामपंथियों और कट्टर मुस्लिम विचारधारा को पोषित करने वालों ने दिए हैं, भारत में जन्म लेने वाला भारतीय युवा अब इन देशद्रोहियों से हिसाब मांग रहा है… है कोई जवाब?

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