ये तस्वीरें छपने पर जैसा बिहार दिखता है, वो तो बिलकुल भी मेरा चेहरा नहीं

कई बार जो बातें हम आपस में करते हैं वो अनजान लोगों के बीच नहीं करते. सोशल मीडिया पर पोस्ट करने से परहेज भी रखते हैं. बिहारियों की हालत ऐसी होती है कि हम अक्सर चुटकुले किसी संता-बंता, पप्पू-टीपू, या फजलु-अफ़जल पर भी नहीं सुनाते.

हमारे चुटकुले भी हम पर ही होते हैं. जैसे अगर पूछा जाए कि कश्मीर के आतंकवाद की समस्या का आसान इलाज क्या है ? तो जवाब होता है वहां के लिए बिहार से कुछ डायरेक्ट ट्रेन चलवा दो !

गौर कीजिये तो ये दिख भी जाएगा. सत्तर के दशक में कभी बंगाल राजनैतिक हत्याओं से पीड़ित हुआ करता था. बिहारी जाकर उसी दौर में वहां नौकरी करने लगे और धीरे धीरे मार काट ख़त्म.

पूर्वोत्तर कई उल्फा जैसी उग्रवादी-आतंकी विचारधाराओं से ग्रस्त था. बिहारी वहां बसने लगे, वो भी ठीक हो चला. पंजाब आतंकवाद से ग्रस्त हुआ, बिहारी मजदूर वहां के खेतों में जाने लगे तो वो भी ठीक. दक्षिण में एल.टी.टी.ई. थी, बिहारी आज वहां होते हैं तो एल.टी.टी.ई. नहीं रही.

कश्मीर के लिए पांच ट्रेन चला दीजिये बिहार से, तो वो भी सुधर जायेगा.

ये मेरा ही चुटकुला है या बेबसी पर मुस्कान… वो तय करना जरा मुश्किल है. अकेले मुंबई में करीब 50 लाख बिहारी होते हैं. सभी मेट्रो और बड़ी जगहों को मिलायेंगे तो बिहार के तीन करोड़ से ऊपर लोग वहीँ प्रवासी के तौर पर मिल जायेंगे.

जैसी कि आम धारणा है वैसे बिहार कृषि प्रधान भी नहीं होता. बिहार की आबादी का 55-60% हिस्सा नौकरीपेशा है, काम करने वालों की लगभग 30-35 प्रतिशत की आबादी ही कृषि पर निर्भर है. ये तब है जब करीब 12% आबादी ही शहरी है, बाकी सब बिहार में ग्रामीण ही होते हैं.

हिमांचल के पहाड़ी इलाकों के बाद ये सबसे कम शहरी आबादी वाला इलाका है. 80 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और 35% कृषक, बाकी कहाँ नौकरी करते होंगे अंदाजा करना मुश्किल नहीं.

यानि जिस सर्विस इंडस्ट्री और नॉलेज प्रोसेस आउटसोर्सिंग की यदा कदा, बड़ी बैठकों में चर्चा होती है उसके लिए बिहार में श्रम शक्ति उपलब्ध थी. हाँ, उसकी इंडस्ट्री कभी यहाँ नहीं आई, ये और बात है.

अब कई स्वनामधन्य बुद्धिजीवी बताएँगे कि देखो इस से बाहर से पैसा बिहार आ रहा है और उस से बहार आएगी. लेकिन समस्या ये है कि इन कामगारों के बच्चों की शिक्षा के लिए बिहार में कोई व्यवस्था नहीं.

परीक्षाएं समय पर नहीं होती इसलिए आप तीन साल में ग्रेजुएशन नहीं कर सकते तो बाहर पढ़ना मजबूरी है. इस तरह आया हुआ पैसा वापिस दिल्ली, कोटा, बंगलौर, भोपाल चला जाता है.

ये चीज़ें आसानी से कल के कार्यक्रम में मंच पर भी दिख गई होंगी. सिर्फ पटना शहर का ही इतिहास 2000 साल से ज्यादा का निकल आएगा.

किस्मत से जब मंच पर से इसी शहर में “बिहार दिवस” के सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहे थे तो बिहार के कितने कलाकार दिखे? हजारों साल का सांस्कृतिक इतिहास कहाँ गया?

मंच से नितीश बाबू को ये क्यों कहना पड़ता है कि बिहारियों के काम ना करने से दिल्ली बंद हो जायेगी, ये क्यों नहीं पूछते कि बिहारियों को दिल्ली जाकर नौकरी क्यों करनी पड़ती है?

आपके भाषण में मेरी रूचि नहीं सुशासन बाबू. मुझे उस कॉइन कलेक्टर को देखना था जो इतिहास सचमुच संजो के रख रहा था और आपकी अकर्मण्यता के वजह से हाल में ही डूब गया.

मुझे उन किसानों को देखना था जिनके प्रति हेक्टेयर धान और आलू की उपज को तो अपनी पीठ थपथपाने के लिए आप अपने प्रकाशनों में छापते है, लेकिन मंच पर बुला कर उन्हें सम्मानित करने में शायद आपके जातीय-सियासी आंकड़े गड़बड़ाने लगते हैं.

मुझे उस लड़के को भी देखना था जो बिना लोभ लालच लोगों को किताब खरीदने के लिए प्रेरित करता, अनजान लोगों को पोस्टकार्ड लिख रहा होता है.

मुझे उसे भी देखना था जो बच्चों को नशा मुक्त कर के शिक्षित करने का प्रयास आपके गांधी मैदान वाले मंच से थोड़ी ही दूर पर हर रोज़ करता है.

बाकी ये अनपढ़ जाहिलों को भी मंच पर से उतारिये जनाब. इनकी तस्वीर छपने पर जैसा बिहार दिखता है, वो तो बिलकुल भी मेरा चेहरा नहीं.

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