आइना भी आपके पास ही होगा, पूछिए, देखिये, क्या कहता है?

अभी हाल में ही ‘जॉली एल.एल.बी. 2’ नाम की फिल्म आई थी. ये सीरीज़ कानूनी प्रक्रिया पर व्यंग है, तो कई कॉमेडी सीन भी फिल्म में होते ही हैं. इसके आखिरी दृश्य में पुलिस एक आतंकी को पकड़ लाती है, जो साधु होने का ढोंग कर रहा था.

वैसे तो वकील के पास आसान तरीका था कि उसकी मेडिकल जांच करवा देता, उसके मुस्लिम होने की पोल खुल जाती. लेकिन वो वहीँ के वहीँ बिना लुंगी उतरवाए, ये साबित करने पर तुला था कि ये हिन्दू नहीं है.

वो परिचय हिन्दुओं वाले तरीके से पूछना शुरू करता है, गायत्री मन्त्र वगैरह पूछ लेता है और आतंकी ऐसे टेस्ट में धोखा देने में कामयाब भी हो जाता है. लेकिन नाम के बाद जब परिवार सम्बन्धी परिचय, गोत्र-मूल वगैरह पूछा जाने लगता है तो आखिर आतंकी बीच अदालत में ही सर धुन लेता है.

वो चीखता है, ‘या खुदा इसके आगे भी होता है!’ शायद ये दृश्य देखकर आपने हंस कर टाल भी दिया होगा. हीरो के जीतने पर खुश होने की बात होती है, ध्यान देने की क्या बात होगी भला ?

यहाँ गोत्र ध्यान देने की बात है. जैसा कि आम तौर पर हिन्दुओं की परम्पराओं के साथ किया जाता है वैसे ही इसे भी आडम्बर, बेवकूफी कहकर पहले तो इसका मजाक उड़ाया जाता रहा. लेकिन हिन्दुओं और उनके मक्कार बामनों ने फिर नए तरीके की मैक्ले मॉडल वाली पढ़ाई भी कर डाली और बताना शुरू कर दिया कि ये तो वैज्ञानिक रूप से भी सही है!

एक ही परिवार में होने वाली शादियों से आनुवांशिक रोगों की संभावना कई गुना बढ़ जाती है. ऐसा नहीं करना चाहिए, आधुनिक विज्ञान भी यही मानता है.

दूसरी समस्या ये हुई कि इस से जिस जाति व्यवस्था का इल्जाम हिन्दुओं पर थोपा जाता था उसकी पोल खुलने लगी. अगर हिन्दुओं में ज़ात ऊँची-नीची मानी जाती और एक-दूसरे में ज़ात के आधार पर शादी विवाह का परहेज होता तो शादियों में ज़ात पूछते, गोत्र क्यों पूछते हैं ज़ात के बदले?

ऊपर से ज़ात में ज़ के नीचे नुक्ता लगता था, तो ये देवनागरी लिपि का होता ही नहीं, मतलब भारत में मुश्किल से दो सौ साल से ही होगा. ऐसे मुश्किल सवाल जब आये तो हमलावरों ने फिर से हमले के तरीके को थोड़ा बदला.

ज़ात-पात की तलवार से हमले के फ़ौरन बाद नारीवाद की ढाल इस्तेमाल होती है. तो अब जब ज़ात वाली तलवार कम कामयाब होने लगी तो नारीवाद की ढाल से बचाव-हमले शुरू हुए.

कहा जाने लगा कि वंश लड़कियों के नाम से चले, इसलिए गोत्र भी लड़कियों का क्यों ना आगे चले? पुरुषों में जहाँ XY क्रोमोजोम होते हैं, वहीँ स्त्रियों में केवल XX होते हैं. इसी वजह से कलर ब्लाइंडनेस जैसी कई बीमारियाँ भी पुरुषों को ही होती हैं, जैसे गोत्र लड़कियों का नहीं होता, वैसे ही ये बीमारी लड़कियों को नहीं हो सकती.

ये Y क्रोमोजोम ही तय करने का तरीका होता था गोत्र. थोड़े सालों बाद जब व्यवस्था विकृत हो चुकी होगी, लड़कियों के गोत्र से आगे का गोत्र होगा, तब ये नहीं कहा जा सकेगा कि ये वैज्ञानिक व्यवस्था है. उस वक्त इसे छोड़ देने की जिद मचाना भी आसान होगा.

एक अक्षर भी नहीं बदला जा सकता की ज़िद के कारण अब्राह्मिक मज़हब-पंथ, इस तरह के प्रदूषण से मुक्त होते हैं. हिन्दुओं में उनकी सतत सुधार की प्रक्रिया एक गुण है, लेकिन उसे कमज़ोरी की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

थोड़े साल में इसका नतीजा ये होगा कि जब पूछा जाएगा कि गोत्र का वैज्ञानिक कारण क्या है? तो हिन्दुओं के पास कोई जवाब नहीं होगा. उस स्थिति में इसे तोड़ना भी आसान होगा.

जैसे संजय लीला भंसाली अपने नाम में माँ का नाम इस्तेमाल करते हैं, वैसे भी नाम को वंश में आगे ले जाया जा सकता है. इसके लिए गोत्र की सामाजिक व्यवस्था को बिना उचित वैज्ञानिक कारण दिए बदलना गलत लगता है.

अपने नाम को जिन्दा रखने के निजी स्वार्थ के लिए ऐसा करना, कुछ-कुछ मायावती का, सरकारी खर्चे पे, अपनी ही मूर्तियाँ लगवाने जैसा है.

बाकी नारसीसिअस नाम भी है, कहानी भी, अपने में ही उलझे होने का उदाहरण भी. आइना भी आपके पास ही होगा, पूछिए, देखिये, क्या कहता है?

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