आकाश यात्रा : जिसे जो बनना होता है वो बनके ही रहता है

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आकाश यात्रा : जीवन के रंगमंच से

“जिसे जो बनना होता है वो बनके ही रहता है…………..”
सुबह के सपने की सारी गुत्थियाँ सुलझ जाने के बाद जो आख़िरी वाक्य लेकर मैंने आँखें खोली वो यही था… लगा आज सुबह से पहले जितनी भी सुबहें याद रखे हुए सपनों को लेकर मेरे जीवनकाल में आई वो इसी सुबह का संदेशा लाने की पृष्ठभूमि में थी.. जैसे एक-एक ईंट जुड़कर आज की सुबह का निर्माण किया गया …

मेहनत, किस्मत, हरक़त केवल शब्द बनकर रह गए जो बार-बार मेरे चेहरे पर तमाचे की तरह पड़ते रहे…. और हर तमाचे की गूँज के रूप में यही बात निकलती रही…….. “जिसे जो बनना होता है वो बनके ही रहता है…………..”

किताबों से वो सारे शब्द भरभराकर नीचे गिर पड़े… जो पहली बार अपना नाम लिखने से लेकर किसी किताब में अपना नाम पढ़ने तक के सफ़र में ज़हन के कोनों में बालू के ढेर की तरह इकट्ठे हो गए थे, जिस पर बार-बार चढ़कर फिसलना मेरा पसंदीदा शगल हुआ करता था…

पिछले कई दिनों से अपने इस पसंदीदा शगल से अवकाश ले रखा था…. किताबों में मुंह छुपाए हुए बार-बार झांकती, खुद की ही बातों को परे धकेलना, नए शगल और नए खेल सीखने के लिए खुद के अधूरेपन को थोड़ा और विस्तृत करना, खुद को पूरा समझने की अपनी नादानियों पर हँसना और फिर किताबों के हाशियों पर लेखक की कही गई बात को अंडरलाइन करते हुए, अपनी ही कही किसी बात की सिद्धता के हस्ताक्षर करना कि “मैंने इससे परे और क्या कहा था”….. कहाँ रोक पाते हैं हम खुद को किताबे पढ़ते हुए किताब में झांकने से ……………

जिसे जो बनना होता है वो बनके ही रहता है……… जो कुछ भी आज की तारीख में बना हुआ सा दिखता है उसे कुछ पल के लिए अनबना कर दिया जाए… तब भी ज़िंदगी के चेहरे पर वही अवसाद नज़र आएगा जो आज की सुबह में था … इतने वर्षों तक “तुमने” किया ही क्या, जो कुछ भी फलित हुआ वो तुम्हारे बावजूद हुआ, और तुम “उससे” सिर्फ गुज़र कर रह गए…. तुम्हारी भूमिका जब-जब आई तुमने परिस्थितियों के पीछे छुपकर सिर्फ तमाशा देखा और फिर उसी तमाशे को दर्शकों को दिखाकर वाहवाही बटोरी…. ज़िंदगी को जमूरा बताने वाले खुद जिंदगीभर गुलाटियां मारते रहे…………

अवसाद, घोर अवसाद …………………. यह स्थिति तभी बनती है, जब हम अवकाश लेते हैं अपनी ही कही बातों से, अपनी हंसी से, अपनी रुलाई से, अपने गुरूर, अपने आप से……. और ये हर बात को “अपनी” कहने की आदत से……

इन अवसाद के क्षणों से लेकिन कभी अवकाश नहीं लेना चाहिए, क्योंकि इन अवसाद के घोर अंधेरों से ही प्रस्फुटित होती है वो सुबह, जो एक सपने को एक तमाचे में तब्दील करती हुई बार-बार आपके चेहरे पर पड़ती है कि तुम हट क्यों नहीं जाते अपने होने की इस प्रक्रिया से…. तुम्हें गर लगता है रोज़ ये सूरज तुम्हारे कहने से उगता है तो नोंच कर फेंक क्यों नहीं देते ऐसे सूरज को जिसकी नकली रोशनी में दमकती तुम्हारी आँखों में अभिमान को साफ़ देखा जा सकता है… उखाड़ क्यों नहीं फेंकते तुम अपने अर्थ को, जो इन किताबों में टंके शब्दों के साथ तुम्हें नज़र आते हैं….

ज़िंदगी तुम्हारे गढ़े अर्थों से कई गुना बड़ी है… ये “कई” तुम्हारे तईं कोई छोटा मोटा लट्टू नहीं जो तुमने जब चाहा घुमा दिया, ये अंतरिक्ष की कई आकाशगंगाओं का गोल घेरा है जिसमें कई-कई बार जन्म लेने के बाद भी कभी तुम उसे बांहों में समेट नहीं पाओगे…. केवल चंद चाँद और सूरज को अपने हाथ में पाकर प्रकृति की विशालता को तुमने बहुत कम आंका है….

अवसाद के उन घोर पीड़ादायी क्षणों में तुम डूब मरो… घुल जाओ उसकी अंधेरी निस्तब्धता में, ये जो कंठ तक कुछ फंसा-फंसा सा लगता है उस घुटन को अनुभव करो, अब फूटा कि तब फूटा ज्वालामुखी-सा धैर्य की स्थिति जब तक न आ जाए तब तक अपनी साँसों को थामे रखो… उसे 72 प्रति मिनट की रफ़्तार पर बनाए रखने की भी कोई बाध्यता नहीं….. उसे दौड़ने दो धमनियों में दौड़ते लहू से अधिक तेज़ या कम कर लो अपनी नींद की तरह… कोई आत्मा शात्मा नहीं होती किसी शरीर में ये मानकर बस पूरे के पूरे देह हो जाओ……. और गिर पड़ो छपाक की आवाज़ के साथ अवसाद के समंदर में… यकीन मानो जब निकलोगे वहां से तो चुल्लू भर पानी से अधिक नहीं होगा वह तब भी….

लेकिन उसमें से निकले होंगे तुम… सच्ची के तुम………

वैसे एक बात फिर भी कह दूं ……… “जिसे जो बनना होता है वो बनके ही रहता है………” अवसाद से अवकाश लेकर या लिए बिना भी……….

आकाश यात्रा : ये भविष्य की वो झलकियाँ हैं जिसके FLASH BACK में तुम जी रहे हो!

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