मुखिया का काम खुद रिसर्च पेपर लिखना नहीं, रिसर्च का अनुकूल वातावरण बनाना होता है

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के नाम की अटकलों के बीच मीडिया तो एक बार फिर मोदी राज में गलत साबित हुआ, लेकिन इस बार तो कई फेसबुकिया राष्ट्रभक्त मित्र भी 20-20 मैच में नो-बॉल फेंकते नजर आये.

मुझे राजनैतिक भविष्यवाणी में कोई दिलचस्पी नहीं लेकिन तथ्यों पर तर्कपूर्ण बात करना अच्छा लगता है. ऐसे में जिन नामों को लेकर कयास लगाए जा रहे थे, उनसे मेरा कोई लेना-देना नही, लेकिन नामों के समर्थन में जो तर्क दिया जा रहे थे वो बड़े अजीब लगते थे.

इस बारे में खासकर विकास को आधार बनाकर जो बातें की जा रही थीं उसे देख-पढ़ कर मुझे हंसी आती. एक अति चर्चित मित्र तो यह तक कह गए थे कि फलां-फलां नेता जी बहुत मजबूत और शानदार इंजन वाली गाड़ी हैं लेकिन वह BMW कार नहीं हैं इसलिए उनकी संभावना नहीं है.

इस पर मैंने प्रतिक्रिया दी थी, क्योंकि तर्क और तथ्य दोनों ही अर्थहीन थे. ऐसे अनेक ऊलजलूल उदाहरण गढ़े गए और लाइक भी खूब बटोरीं गयीं.

मुझे हंसी इसलिए आती कि मानो विकास कोई ऐसे अजूबे का नाम है जिसका आविष्कार यूरोप में पिछली शताब्दी में हुआ है और जो सिर्फ अमेरिका के विश्वविद्यालय के गोरे प्रोफ़ेसर से ही पढ़ा और समझा जा सकता है और अगर कोई भूरा-काला-पीला हिंदुस्तानी इस अनोखे ज्ञान को पाना चाहता है तो उसे सिर्फ और सिर्फ अंगरेजी में ही पढ़ कर समझना होगा. मानो यह एक ऐसी कठिन विद्या है जो आईआईटी या आईआईएम के विद्यार्थी ही समझ सकते हैं.

यह सब बेहद हास्यस्पद था. क्योंकि अमेरिका ब्रिटेन के अधिकांश विश्वविद्यालय में कैसे एडमिशन लिया जाता है शायद इन मित्रों को पता नही. हैरानी तो इस बात की है कि ये भी जानते हैं कि अमीरों और बड़े नेताओं के कई नालायक बच्चे भी कहाँ-कहाँ से डिग्री खरीद लाते हैं.

जहां तक रही हमारे देश के भीतर स्थित प्रतिष्ठित संस्थानों की तो वहाँ से “नॉन प्रोडक्टिव एसेट” की कितनी बड़ी फ़ौज बाजार में है, शायद ये नहीं जानते. हां बड़े रेस्टॉरेंट की बासी दाल-रोटी भी ऊँचे दाम पर ही बिकती है.

दुनिया की अनगिनत अर्थव्यवस्था का कबाड़ा इन कागज़ी कीड़ों ने कितना किया है इसके अनेक उदाहरण हैं. जबकि सदियों से गल्ले की दूकान पर बैठे अनेक अनपढ़ मगर बेहद सफल व्यापारी की अनेक कहानियां हैं.

दूसरी तरफ अनेक देश और राज्यों के विकसित होने के पीछे जो भी नेतृत्व रहा है वो अपनी डिग्री के कारण कभी नहीं सफल हुआ. उनकी सफलता के राज उनके व्यक्तित्व में कहीं और मिलते हैं.

विकास क्या होता है? यहां कोई मंगल ग्रह पर उतरने वाले रॉकेट का विकास करना नहीं है, ना ही माइक्रो से आगे नैनो चिप से भी सूक्ष्म चिप के लिए किसी नए मैटरियल पर कोई अनुसंधान करना है.

हिंदुस्तान, उसमें भी उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में विकास अर्थात अब भी मूलभूत सेवा को उपलब्ध कराना है. विकसित देशों और राज्यों में भी विकास का संदर्भ इसे और बेहतर बनाने को लेकर ही होता है.

हाँ नयी-नयी सुविधाओं को भी जल्द से जल्द सरलता समानता से आम जन तक पहुंचना सरकारों का काम होता है. और अगर किसी सरकार का उद्देश्य तकनीकी और विज्ञान में विकास कार्य करवाना भी है तो उसमें भी सरकारों को सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर और अनुकूल वातावरण बना कर वैज्ञानिकों और अनुसंधानकर्ताओं को देना होता है. वहाँ भी कोई सरकार का मुखिया बैठ कर खुद रिसर्च पेपर नहीं लिखता.

सच कहें तो, विकास सुशासन से आता है. जिसके लिए नेता के पास अपना विज़न होना चाहिए और उसके क्रियान्वयन पर उसकी पैनी नजर की जरूरत है दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ. वो प्राकृतिक रूप से बुद्धिमान व सजग और व्यक्तिगत रूप से सूचित और संदर्भित होना चाहिए. हाँ, व्यवहारिक ज्ञान महत्वपूर्ण है. उसमे कार्य लेने की क्षमता होनी चाहिए. आदि.

वैसे तो योगी जी पढ़े-लिखे हैं वर्ना अगर किसी नेतृत्व में उपरोक्त सब गुण हैं तो फिर वो चाहे अनपढ़ भी क्यों ना हो सफल हो सकता है. योगी जी को चुन कर मोदी जी ने एक बार फिर सरप्राइज़ किया है.

आज मेरे उन मित्रों ने अपना स्टैंड चुपचाप बदल लिया है. अब वे विकास को कोई सोने की चिड़िया नहीं मान रहे, ना ही BMW कार.

इन सब के बीच योगी जी को लेकर मुझे कोई शंका नहीं है. और इसका प्रमुख कारण है कि योगी जी परिवार से और भ्रष्टाचार से भी दूर हैं, जो कि उनकी सफलता की आधी गारन्टी है.

ऊपर से उनके व्यक्तित्व को देख समझ कर दावे से कह सकता हूँ कि वो कई देशी-विदेशी भारी-भरकम डिग्रीधारियों से अधिक सफल मुख्यमंत्री साबित होंगे. उत्तर प्रदेश सही मायने में विकसित होगा. और भविष्य में कई मेधावी छात्रों के अध्ययन के लिए केस स्टडी होगा.

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