खुद से बेईमानी है किसी एक नेता से देश बदल देने की उम्मीद रखना

भारत की आबादी का एक बड़ा हिस्सा खेती पर निर्भर है. इसलिए जब भारत की बात होती है तो किसानों की भी बात होती है.

ऐसा ही एक किस्सा किसान और उसके बेटे का है, काफी पुराना सा. जैसा कि बाकी सारे किसान करते हैं इसने भी अपने खेतों में फसल लगाई. धान की फसल लगाकर वो पानी के इंतजाम में जुटा.

गाँव से नहर गुजरती थी और आपस में गाँव वाले बारी-बारी करके अपने-अपने खेतों में पानी छोड़ते थे. किसान कामचोर किस्म का था तो वो कम से कम काम करने की कोशिश करता.

जब फसल लगती है तो कई पक्षी आसपास घोंसला बना लेते हैं. धान-गेहूं जैसी फसलें हों तो तीतर और बटेर वहीँ कहीं आस पास या खेत के बीच में ही कहीं घोंसला बना लेते हैं.

तीतर उड़ तो सकता नहीं अच्छे से, इसलिए उसने खेत के बीच में ही छुपकर अपना घोंसला बनाया. तीतर काफी लड़ाकू होते हैं इसलिए उन्हें बिल्ली जैसे शिकारियों की कोई परवाह नहीं होती. फसल काटने के वक्त वो अपना घोंसला छोड़कर दूसरी जगह चले जाते हैं.

जब फसल पक गई तो किसान और उसका बेटा रोज़ की तरह खेतों में टहलते हुए बातें कर रहे थे. किसान ने अपने बेटे से कहा कि फसल पक गई है. कल ही वो अपने रिश्तेदारों को फसल काटने कहेगा.

तीतर तो घोंसले में नहीं थे, लेकिन घोंसले में बैठे उनके बच्चों ने उनकी बातें सुन ली. लौटते ही तीतर के बच्चों ने बताया कि कल किसान रिश्तेदारों को फसल काटने बुलाने वाला है. तड़के ही उन्हें घोंसला छोड़ देना चाहिए. तीतर ने कहा फ़िक्र करने की जरुरत नहीं है. कल फसल नहीं कटेगी.

अगली सुबह किसान और उसका बेटा फिर से खेतों पर आये. किसान ने अपने बेटे से कहा, रिश्तेदार तो फसल काटने आये नहीं, वो अपने पड़ोसियों और दोस्तों से फसल काटने को कहेगा.

तीतर के बच्चों ने फिर बातें सुन ली. तीतर के लौटने पर फिर उन्होंने कहा कि कल किसान के दोस्त और पड़ोसी फसल काटेंगे, अब घोंसला छोड़ देना चाहिए.

तीतर ने कहा फ़िक्र करने की जरुरत नहीं, फसल कल भी नहीं कटेगी. अगले दिन जब किसान और उसका बेटा आये तो सचमुच उसके साथ दोस्त और पड़ोसी नहीं आये थे. फसल नहीं कटी.

किसान ने अपने बेटे से कहा हमारे पड़ोसी और दोस्त भी नहीं आये, कल हम खुद ही अपनी फसल काटेंगे. तीतरों के लौटने पर बच्चों ने किसान और उसके बेटे के बीच हुई बात बताई.

तीतर ने कहा, हर एक को अपना काम खुद ही करना पड़ता है. दूसरे किसी की मदद पर निर्भर रहने वाला मूर्ख होता है. कल तड़के ही हम घोंसला छोड़ देंगे क्योंकि कल किसान खुद काम करने की सोच रहा है.

अगले दिन जब तीतर और उसका परिवार दूर से देख रहा था. सुबह होते ही फसल कटनी शुरू हो गई थी.

बचपन में ये कहानी स्कूल की किताब में थी और आखिरी लाइन होती थी “अपना काम स्वयं करो”.

अब आसपास कहीं भी निगाह डालिए यही कहानी याद आती है. जनता के नाम पर सबसे ज्यादा शोर मचाने वाली बिहार और उत्तर प्रदेश की सरकारें अपने इलाकों में सफाई नहीं करवाती.

हावड़ा स्टेशन का तो पता ही वहां उतरने पर आने वाली मछली की बू से चलता है. पेट्रोल की मिलावट पकड़ने वाले अधिकारी मारे जाते हैं, बालू माफ़िया से सख्ती करने वाले अफ़सरों का तबादला करके नेता उसकी शेखी बघारते हैं.

संदिग्ध परिस्थितियों में मौत की जांच के लिए आन्दोलन चलाना पड़ता है. जांच के बाद पता चलता है कि हत्या मोटरसाइकिल की चाबी से हुई थी. पत्रकार रिश्वत ले-दे कर ख़बरें दिखाते हैं. अदालतों में “तारीख पर तारीख” का मसला है, भ्रष्टाचार भी कहीं कम नहीं.

ऐसे माहौल में किसी सरकार से, या किसी एक नेता से देश बदल देने की उम्मीद रखना तो खुद से बेईमानी है. साठ साल ये कोशिश करके देख चुके हैं हम लोग. हालात सुधारने हैं तो जनता को खुद पहल करनी ही पड़ेगी.

“अपना काम स्वयं करो”

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