लम्बे युद्धों की तैयारी

अगर स्पष्ट शब्दों में कह दिया जाए कि “मियां, दाल फ्राई में टमाटर डालने के लिए मरी जा रही कौमें जंग नहीं जीतती” तो कई लोगों के भड़कने की प्रबल संभावना रहती है. छोटी-मोटी हार को ही अंतिम मान लेने या एक आध विजय पर ही हर्षोल्लास में किले में ट्रोज़न हॉर्स ले आने वालों के साथ ये दिक्कत तो रहनी ही है.

पहली समस्या तो ये होती है कि लिखित ना रखने पर कई चीज़ें ध्यान से उतरने लगती हैं. बड़े आतंकी हमलों से ठीक पहले क्या हुआ होता है, गौर किया है क्या?

जैसे ही आतंकियों के खेमे की कोई बड़ी हथियारों की खेप पकड़ी जाती है, कोई उनका पैसे का इंतजाम करने वाला नेस्तनाबूद कर दिया जाता है, या किसी सरगना को फांसी पर टांगा जाता है, वैसे ही आते हैं ये हमले.

क्यों होता है ऐसा?

क्योंकि उन्हें सिद्ध करना होता है कि वो समाप्त नहीं हुए, अभी भी दम-खम बाकी है. जैसे हाल में ही गुजरात में जब सरकार का मुखिया बदला तो सबसे पहले क्या हुआ?

फौरन उना में किसी कथित दलितों पर जुल्म की फर्जी कहानी रची जाने लगी. हालाँकि बाद में पोल खुल गई और गौरक्षा समिति में शामिल समुदाय विशेष के लोग, दलितों का धंधा हड़पने के चक्कर में हमला करवा रहे थे ये भी साफ़ होने लगा, लेकिन फिर भी इस से तात्कालिक नुकसान तो हुआ ही.

हिन्दुस्तान के निवासियों को ये कभी नहीं भूलना चाहिए कि उसने 1200 साल हमले झेले हैं. इतने समय में अन्दर घुस आये शत्रुओं ने निस्संदेह अपने गुप्तचर भी छोड़े ही होंगे. अगर ऐसे समझ ना आये तो थोड़ा सा इतिहास और वंशावली देख लीजिये.

देखिये कि रोहिलखंड के इलाके में औरंगजेब ने कैसे पश्तूनों को लाकर बसाया था. फिर आपको आसानी से नज़ीबउद्दौला और हाफिज़ रहमत खान जैसे नाम दिखेंगे. पानीपत की तीसरी लड़ाई के गद्दारों का नाम ढूंढते ही आपको नज़ीब नाम दोबारा दिख जायेगा.

अगली बार फिर आपको इस इलाके का नाम इसलिए दिखेगा कि शराब-शबाब के शौक़ीन जिन्ना को राजनैतिक समर्थन देने वाला इलाका भी यही था. थोड़ी और मेहनत करेंगे तो नवाब पटौदी भी दिख जाएगा और “तैमूर” नाम पे भावना भी शायद आहत हो जाए.

चार-पांच राज्यों की चुनावी विजय के मद में जब चूर होने लगें तो याद रखिये कि हल्का सा ढीले पड़े तो एन.एच. पर बावरिया गिरोह बलात्कार कर सकता है. दलित लड़की के बलात्कार की रिपोर्ट करने की कोशिश करने से, बहराइच में थाने पर पथराव भी हो सकता है.

डॉ. नारंग दिल्ली में आपके सीने पर कर के, कुछ नहीं हुआ कहा जा सकता है. कैराना हुआ या नहीं हुआ ये विवाद भी हो सकता है. किसी ज़िया उल हक़ के लिए नियम बदल के मुआवज़ा छोड़िये, अख़लाक़ कर के 50 लाख और चार फ्लैट वसूलने का विकल्प भी है. कई दिन से जो नजीब गायब है वही निकल आएगा किसी कब्र से!

मगर हाँ, लम्बी लड़ाई लड़ना और जीतना देखना है तो अंतर्राष्ट्रीय ख़बरें देखिये. हाल की ही ख़बरों में न्यूजीलैंड के माओरी जनजाति के लोगों ने एक लम्बी लड़ाई जीत ली है. लगभग 160 साल लम्बी लड़ाई लड़कर माओरी लोगों ने वांगनूई नदी को मानवाधिकार दिलवा दिए.

ये वांगनूई नदी न्यूजीलैंड की सबसे लम्बी नदियों में तीसरी है और माओरी जनजाति के लोग इस नदी को अपना पूर्वज मानते हैं. न्यूजीलैंड के इस सबसे लम्बे चले मुक़दमे के बाद संसद ने नदी को मानवों के अधिकार के साथ 80 मिलियन डॉलर का मुआवजा और 30 मिलियन डॉलर का फण्ड नदी की हालत सुधारने के लिए भी दिया है.

सन 1840 में वैटांगी के समझौते (Treaty of Waitangi) के जरिये इसाई हमलावरों ने माओरी लोगों से उनके जंगल छीन लिए थे. जंगलों और नदी पर आधारित जीवनयापन के बदले उनसे ब्रिटिश मुकुट की गुलामी कबूल करवाई गई थी.

न्यूजीलैंड के सबसे पिछड़े माने जाने वाले माओरी जनजाति को हाल में ही उनके अधिकार एक लम्बी लड़ाई के बाद वापिस मिलने शुरू हुए हैं. नदी के लिए अभियान 1870 के दौर से चल रहा था. तय हुआ है कि नदी का प्रतिनिधित्व दो लोग करें, जिनमें एक माओरी लोगों का चुना और एक संसद की ओर से चुना व्यक्ति हो.

अब जरा इसकी तुलना भारत से करते हैं. भारत की दो बड़ी नदियाँ गंगा और यमुना में से यमुना का पानी दिल्ली के इलाके में सबसे ज्यादा प्रदूषित हो चुका होता है. निस्संदेह आगरा पहुँचते पहुँचते उसकी हालत वैसी ही होती होगी जैसी हालत में कभी श्री कृष्ण को यमुना को कालिया नाग के चंगुल से छुड़ाना पड़ा होगा.

पिछले दो वर्षों में गंगा की सफाई पर 2958 करोड़ खर्च हुए हैं, यमुना के लिए बजट 1514 करोड़ का था. कब तक हम इस बात से डरते रहेंगे कि गंगा-जमुनी तहजीब की दुहाई देने वाले कुछ तथाकथित “प्रगतिशील”, गंगा को माँ का दर्जा देने पर हमारा मजाक उड़ाने की कोशिश करेंगे?

चुनावी जंग सिर्फ एक मामूली मोर्चे पर जीत है, युद्ध में सपूर्ण विजय अभी बाकी है.

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