धरती का वंश चलाने के लिए ज़रूरी है सूरज का उगना

ma jivan shaifaly article sun and earth

दो मुट्ठी में दो रंगों को भींचें दौड़ती हुई वो आती है और मल देती है दुनिया के चेहरे पर दोनों रंग….

वाह के संग उठती खुशी की आवाज़ों से ढांक देती है माथे की दरारों में पड़ी आह को……..

रंगों से धुंधलाई अपनी आँखें मलते हुए दुनिया कभी नहीं देख पाती उसका वो चेहरा जिस पर लिखा है उसके सारे जन्मों का हिसाब…

बस उसकी मुस्कराहट का उजाला किसी के आंसू पर गिरता है और दोनों के अंधेरे कोने में टिमटिमा उठता है एक दीया ….

ऐसे कई दीयों को रोशन करके उसने अपनी अमावस की रात को दीपावली में तब्दील किया है…

कहते हैं आसमान का कोई सूरज भी बाट जोह रहा है… कि उसकी मुस्कराहट की ठंडक सूरज के कलेजे तक पहुंचे… और नवतपा से तपती धरती पर वो छन्न से जा गिरे….

आसमान में लटके लटके थक गया है उसकी किस्मत का सूरज… उस धरती-सी की कोख में समा जाने को आतुर है…

सुनते हैं हर चेतना को किसी सौभाग्यशाली कोख से जन्म लेने के लिए बरसों तपस्या की अग्नि में जलना होता है…

सूरज की तपस्या का ये आख़िरी साल है… कई प्रकाश वर्षों की यात्रा के बाद उसे धरती की कोख से जन्म लेना है…

लेकिन घर की बूढ़ी परम्पराएं गाली दे रही है…. अरी नखत्री … मीठी कविताएं मत लिखा कर चाँद सी लड़की होगी वरना…

तो वो आजकल खट्टी सी बातें कहा करती है… क्योंकि धरती का वंश चलाने के लिए सूरज का उगना ज़रूरी है…

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