गौरक्षक हिंदाभाई बलिदान दिवस

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योजना आयोग जो अब नीति आयोग के नाम से जाना जाता है उसकी रिपोर्ट के अनुसार 1947 मे देश मे 1 अरब 21 करोड़ गायें थीं, जो लगातार अवैध रूप से कत्लखानों में कटने और विषम परिस्थितियो के कारण घटकर वर्तमान मे केवल 10 करोड़ रह गयी हैं.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने यह घोषणा की थी कि यदि उनकी सरकार बनी तो 11 मार्च को ही रात के 12 बजे से प्रदेश के सभी यांत्रिक कत्लखाने बंद कर दिये जायेगें… गत वर्ष भी गायों और गौरक्षकों को लेकर प्रधानमंत्री ने एक बयान दिया था जिसे लेकर बहुत विवाद हुआ था.

पिछले साल 28 फरवरी 2016 को दिल्ली के जंतर मंतर पर देश भर से लाखों लोग एकत्र हुए थे. उन्होने प्रदर्शन कर गाय को राष्ट्रमाता घोषित करने की मांग की थी. पर सरकार ने इस प्रदर्शन को पूरी तरह नजर अंदाज कर चुप्पी साध ली. इस घटना से प्रेरित होकर गुजरात में एक ह्रदय विदारक घटना घटी थी. जिससे देश के सभी राष्ट्रीय न्यूज चैनल और प्रिंट मीडिया ने आंखे फेर ली और एक महान गौरक्षक के बलिदान को गुमनामी की खाई मे धकेल दिया.

गुजरात के जसदण जिले के गढ़डिया गांव मे रहने वाले हिंदाभाई भरवाड़ पूरे क्षेत्र में गौरक्षक के नाम से जाने जाते थे. वे अपने संगठन ‘गौरक्षक समिति’ और साथियों के सहयोग से राज्य में गायों को कत्लखाने से बचाने का अभियान चलाये हुऐ थे.

उन्होने पूरे राज्य से 29 हजार से अधिक गायों को कत्लखानों में  कटने से बचाया था. साथ ही वे राज्य में चल रहे सभी वैध अवैध कत्लखानों को बंद करने का आंदोलन भी चलाये हुऐ थे… बावजूद इसके पूरे राज्य में कत्लखाने धड़ल्ले से चल रहे थे… उनका आंदोलन पूरी तरह अहिंसक था… बावजूद इसके गुजरात सरकार और प्रशासन उनकी मांगो को लगातार टाले जा रहा था.

गाय को राष्ट्रमाता घोषित करने और पूरे राज्य मे गौमांस की बिक्री को रोकने के लिये उन्होंने अपने साथियों के साथ राजकोट के कलेक्टर कार्यालय में आमरण अनशन शुरू कर दिया… किंतु प्रशासन की बेरूखी जारी रही… इससे व्यथित होकर उन्होने गत वर्ष 17 मार्च 2016 गुरूवार को कलेक्टर कार्यालय परिसर में ही अपने आठ साथियों के साथ कीटनाशक जहर पी लिया…

जिस समय यह घटना घटी वहां बड़ी संख्या मे पुलिस बल भी तैनात था. जहर पीने के बाद जब उनकी तबीयत बिगड़ने लगी तो पुलिस ने उनको अस्पताल मे भर्ती कराया किंतु उपचार के दौरान देर रात को हिंदाभाई भरवाड़ ने दम तोड़ दिया. जबकि उनके साथी कमलेश रबारी, दिनेश लोरिया, अमर धानिधारिया, रघवीर सिंह जड़ेजा, वाला मारू, विजय सिंधव और दीपक वाघेला जीवन और मौत से जूझते रहे… आज इस घटना को घटे पूरा एक साल बीत गया है.

गौरक्षा के नाम पर राजनीति आज भी जारी है…. गायों की तस्करी, कत्ल और गौमांस की बिक्री हर राज्य में चाहे वहां किसी भी दल की सरकार हो खुलेआम या कहीं दबेछुपे चल रही है… जबकि गायों के नाम पर राजनीति करने वाले केन्द्र राज्य और सरकार के बड़े बड़े पदों पर आसीन हो चुके हैं.

किंतु गायें और गौरक्षक आज भी सड़कों पर लावारिस घूम रहे हैं, गायें कभी भूख से तो कभी ठंड या पॉलीथीन खाकर मारी जा रही है… न तो कत्लखाने बंद हुए हैं न पॉलीथीन पर रोक लगी है… जब गुजरात में गौरक्षा की यह स्थिति है तो देश के बाकी राज्यों में क्या होगी इसका अंदाजा आप आसानी से लगा सकते हैं.

आज एक साल बाद हिंदाभाई को सभी लोग भूल चुके हैं.. न कहीं कोई श्रद्धाजंली न स्मरण न ट्वीट न कोई पोस्ट… यदि हिंदाभाई भी गायों का राजनीतिक उपयोग करना जानते तो वे आज न सिर्फ जीवित होते बल्कि किसी विधानसभा या संसद सदस्य के रूप मे सदन की शोभा बढ़ा रहे होते या उससे भी कहीं आगे होते.

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