जीतने और हारने वाले दोनों ही परेशान… क्यों?

चुनाव तो ख़त्म हो गए पर राजनीतिक दलों की समस्याएँ ख़त्म नहीं हुई. जीतने वाले भी परेशान है और हारने वाले तो हैं ही परेशान.

जीतने वाले मुख्यमंत्री और मंत्री चुनने में परेशान हैं क्योंकि प्रचण्ड बहुमत ने प्रचण्ड उम्मीदें और जिम्मेदारी भी दी है.

ऐसी स्थिति में प्रदेश को ऐसा मुख्यमंत्री चाहिए जो सिर्फ ढाई साल में धरातल पर मोदी जी के किए वादों को पूरा करता दिखे, जनता की प्रत्येक छोटी-बड़ी तकलीफ़ का पूरा ख्याल रखे, ऐसे निर्णय ले सके जिसके सकारात्मक परिणाम आम जनता को तुरन्त दिखे.

नहीं तो 27 साल से बेहाल यूपी वालों का धैर्य समाप्त होने में 27 महीने भी नहीं लगेंगे… और 2019 के चुनाव में केन्द्र की सत्ता के रास्ते में यूपी ही रोड़ा बन जाएगा.

यूपी के माथे पर लगे बीमारू राज्य के टैग को हटाना और रोजगार के अवसर प्रदान करके बेरोजगारों का पलायन रोकना भी चुनौती है.

भ्रष्ट नौकरशाही एवं बिगड़ी हुई कानून व्यवस्था से मुक्ति दिलाने का काम त्वरित गति से करने के लिए कठोर निर्णय लेने की क्षमता वाला व्यक्ति ढूँढना आसान तो नहीं ही है.

उधर अखिलेश यादव हैरान तो हैं ही, परेशान भी हैं… क्योंकि अति आत्मविश्वास में स्वयं को कुछ ज्यादा ही आँक गए थे. इस अहंकार में ही पिता और चाचा का अपमान करते रहे.

चुनाव के पहले तक माहौल उनके पक्ष में लग भी रहा था…. पर जैसे-जैसे चुनाव होते गए साइकिल की हवा निकलती गयी. सत्ता विरोधी लहर का उतना असर नहीं होता यदि पारिवारिक कलह नहीं हुआ रहता.

सपा का आँकलन था कि 38% ओबीसी और मुस्लिम मतदाता उसके साथ हैं, लेकिन यहाँ भी धोखा हो गया. यादवों को छोड़कर अधिकाँश जातियों के वोट या तो विभाजित हो गए या सामूहिक रूप से प्रतिद्वंदी पार्टियों को चले गए.

मुस्लिम वोटर्स को लुभाने के अति प्रयास ने हिंदुओं को एकजुट कर दिया. काँग्रेस को सौ सीट दे कर भी अखिलेश यादव ने खुद के पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली.

जनता में इसका सन्देश गया कि सपा हारने वाली है, अखिलेश भ्रम में थे कि काँग्रेस का साथ मिलने से ब्राह्मण वोट सपा की झोली में आ जाएगा.

एक तो ब्राह्मण वोटर्स यूपी में अब रहते नहीं हैं और जो रहते हैं वो राहुल गाँधी को ब्राह्मण मानते ही नहीं हैं.

वोट तो नहीं ही मिले, मुख्यमंत्री की कुर्सी भी गयी और पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी पर भी तलवार लटका ली.

गठबन्धन बना कर खुद का नुकसान तो किया ही टीपू भैया ने, साथ में मायावती की भी लुटिया डुबाने में मदद कर दी.

मायावती इस बार “जय भीम-जय मीम” के भरोसे सत्ता तक पहुँचने की आस लगाए थीं, पर मुस्लिम वोट सपा गठबन्धन और बसपा में बंट गया, किसी को भी एकतरफा वोट नहीं मिल सका.

2007 में मायावती ने सतीश चंद्र मिश्र के सहारे ब्राह्मण वोटर्स को अपने साथ कर लिया था लेकिन इस बार सतीश चंद्र भी विफल रहे… ब्राह्मणों ने तो साथ छोड़ा ही अति पिछड़ों और गैर जाटव वोटर्स ने भी इस बार साथ छोड़ दिया.

पार्टी छोड़ कर गए स्वामी प्रसाद मौर्य, आर के चौधरी आदि अपने साथ अपने वो वोटर्स भी ले गए जिन्होंने 2007 में सत्ता दिलाने में सहयोग किया था.

पर मायावती अपने अहँकार में इस बात को समझ ही नहीं सकी… उनको लगता रहा कि वोट तो उनके कारण मिलता है इसलिए इन वोटर्स को अपनी बपौती मान कर मुस्लिम वोटर्स की मनुहार में लगी रहीं.

सबसे ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार बसपा के ही थे…. मुस्लिम को टिकट देने के लिए मायावती ने कई दलित और अति पिछड़ी जाति के उम्मीदवारों के टिकट काट दिए.

इनको दूर करने का खामियाजा भुगतना पड़ा और अंत में मुस्लिम भी छिटक कर सपा गठबंधन के साथ हो लिए.

इन कारणों पर विचार करने की जगह ईवीएम मशीन की गड़बड़ी ढूँढने में परेशान हैं बसपा सुप्रीमो.

अभी तक शायद मायावती स्वीकार ही नहीं कर पाई हैं कि उनके परम्परागत वोटर्स ने ही साथ छोड़ दिया और मुस्लिमों ने भी भरोसा नहीं किया, इसलिए हर महीने 11 तारीख को काला दिवस मनाने की घोषणा की है.

ऐसा न हो कि पाँच वर्ष में इतना काला रँग इकठ्ठा हो जाए उनके पास कि सूरज की रौशनी में भी बसपा को ढूँढा न जा सके.

बस इतनी सी कहानी है उत्तर प्रदेश चुनाव की…. कथा समाप्त…. प्रेम से बोलो धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो.

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