जहां भैंस जनता से ज्यादा महत्वपूर्ण हो, वहाँ भैंस से ही मांगो वोट

हार की समीक्षा अगर कोई करना चाहे तो ये कोई रॉकेट साइंस नहीं बल्कि बेहद सरल है, बशर्ते कोई ऐसा वास्तव में करना चाहे. इसका एक उदाहरण देता हूँ.

उत्तर प्रदेश में करारी हार के बाद एक टेलीविज़न एंकर समाजवादी पार्टी के हारवर्ड रिटर्न प्रवक्ता से हार के बारे में पूछ रहा था. उसका वही जवाब था जो उसके बॉस अखिलेश ने कुछ देर पहले ही प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिया था, जिसमें मूल रूप से, ‘जनता समझाने से नहीं बहकाने से वोट देती है और शायद उन्हें एक्सप्रेस वे से ज्यादा बुलेट ट्रेन की जरूरत है’ आदि आदि था.

इसकी प्रतिक्रिया में पास खड़ी आम जनता से पूछा गया तो एक सामान्य नवयुवती ने बड़े सहज ढंग से कहा था कि हमें आधे-अधूरे एक एक्सप्रेस वे की जगह हर जगह अच्छी सड़क चाहिए, बस!

इस सरल से जवाब में ही बहुत कुछ छिपा है. जनता क्या चाहती है? क्या राजनेता इतना भी नही जान पाते? अखिलेश की बातों से तो ऐसा ही कुछ नजर आता है. सच तो ये हैं कि उनकी बातों में अहंकार और कटाक्ष था.

उनसे कोई पूछे कि आप ये व्यंग उन्ही पर क्यों मार रहे हैं जिन्होंने आपको ठीक पांच साल पहले सत्ता सौंपी थी? क्या तब आपने भी जनता को बहकाया था?

मगर ऐसा मीडिया नही पूछेगी. क्योंकि मीडिया पैसों पर चलने वाली कॉर्पोरेट की दुकान है, जो पैसे देकर खरीदी जा सकती है. जिसे इस बार भी अखिलेश को विकास पुरुष गढ़ने के लिए ठेका दिया गया था, मगर वो जनता के बाजार में चल नही पाया.

वैसे कड़वा सच तो यही है कि अखिलेश ने जनता को अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से पिछली बार बहकाया ही था. मगर वो यह नहीं समझ पाए कि जनता सीधी जरूर है भावुक भी है, हरेक को मौका देती है, मगर बेवकूफ नहीं है. और उसने इस बार अपना हिसाब कर दिया.

सच तो ये भी है जिस-जिस नेता ने जब-जब जनता की बुद्धिमानी पर शक किया, मुंह की खायी है. इतिहास साक्षी है, जब कोई मीडिया नहीं था तब भी तानाशाहों को उखाड़ फेका गया.

आखिरकार क्रांतियाँ क्यों और कैसे होती रही हैं. हर बार असंतोष का प्रमुख कारण असमानता और अन्याय ही रहा है. जब-जब आम जनता के मुंह से उसकी रोटी छीनी गई, उसने बड़े-बड़े सूरमाओं को महल से सड़क पर ला खड़ा किया.

जब-जब जनता का हक़ मारा गया उसने अपने नेता को सत्ता से बेदखल कर दिया. असल में जब भी कोई नेता, जनता के सामान्य काम भी नहीं करता और राजनीति खेलते हुए जनता के बीच भेदभाव करता है तो आमजन का गुस्सा फूट पड़ता है.

कोई चाहे कुछ भी कहे, क्या ये सच नहीं है कि अखिलेश ने हर तरह से भेदभाव किया है. यहाँ तक कि कब्रिस्तान और श्मशान के बीच के भेद की कहानी भी सच है. अब सेक्युलर इसे चाहे जिस तरह से पेश करें, मगर ईद और होली में फर्क किया गया.

हिन्दू सहिष्णु है उसे इस बात पर कभी ऐतराज नहीं होगा कि मस्जिद में लाउडस्पीकर लगे या नहीं. लेकिन अगर किसी को मंदिर की घण्टी की आवाज से भी तकलीफ होने लगे और प्रशासन किसी को खुश करने के लिए उस पर रोक लगाने की कोशिश करे तो वो क्यों और कैसे बर्दाश्त कर सकता है.

जिस काम को मुग़ल पांच सौ साल में पूरी तरह नहीं कर पाए वो अब कैसे सम्भव है? क्या इस बात को समझने के लिए किसी विद्वान की जरूरत है क्या? और इस बात को खुले में कहने वाले को अगर आप फिर गधा कहेंगे तो फिर समय आने पर दुलत्ती भी तो खानी पड़ेगी.

क्या यह सच नहीं कि राज्य की लॉ आर्डर व्यवस्था बिखर चुकी थी? आप कुतर्क द्वारा पत्रकारों को तो बेवकूफ बना सकते हैं मगर जो भुगत रहा है उसे नही. वैसे भी आम जन को और कुछ नही चाहिए होता है, वो तो सिर्फ इतना चाहता है कि उसकी सुनवाई हो. मगर जिस राज्य में भैस भी इंसान से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाए वहां फिर वोट भी भैंस से ही पाने की उम्मीद की जानी चाहिए.

सच तो ये है कि सड़क से महल में गए मुलायम तो गरीब के माथे पर आने वाले पसीने की गंध को समझते हैं मगर सोने का चम्मच लेकर पैदा हुए अखिलेश के लिए तो यह दुर्गन्ध ही है.

अखिलेश… अभी तो खेल शुरू हुआ है, अभी तो सिर्फ सत्ता गयी है, अभी बहुत कुछ खोने को तैयार रहो. तुम सैफई में चाहे जो करते रहे हो वो समाजवाद का स भी नही. असल में समाजवाद के आड़ में जो तुम सैफई करते रहे हो वो तुम्हे अब खुद नृत्य करवाएगा, जिसे उत्तर प्रदेश की जनता देखगी.

अखिलेश… समय बड़ा बलवान भी है और क्रूर भी, बाजी पलटते ही बहुत कुछ मिनटों में बदल जाता है. अब तक तुम्हारे घर में जो कुछ चुनाव के पहले हुआ वो सच है या नहीं, पता नहीं, मगर अब जो होगा वो कम से कम नाटक नहीं होगा.

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