‘चले गए’ इंसान की तारीफ़ की परंपरा और विपक्षियों का धन्यवाद

हमारे यहाँ ‘चले गए’ इंसान की तारीफ की परंपरा है सो ये फर्ज भी पूरा कर देते हैं.

कुछ भी हो अखिलेश यादव के साथ, एक तथ्य तो सत्य है कि उन्होंने पिता और चाचा के साथ कैसा भी व्यवहार किया हो मगर राजनीति में भाषा का स्तर कभी गिरने नहीं दिया.

ममता बनर्जी, लालू यादव और अरविंद केजरीवाल की तरह बौखलाए नहीं, कांग्रेसी प्रवक्ताओं की तरह अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं किया और पिता की तरह हिंदुओं पर गोलियां चलवाने का श्रेय नहीं लिया.

ये मैं व्यंग में नहीं, दिल से कह रहा हूँ. इस बार विपक्ष में रह कर और परिपक्व होंगे ऐसी आशा है.

लगे हाथ, भाजपा की अभूतपूर्व जीत में सहयोग करने वाले लोगों और शक्तियों को धन्यवाद भी दे ही देना चाहिए.

चुनाव बीत गए हैं और हम जीत गए हैं. जीतने के बाद विजय के अलंबरदारों को धन्यवाद देने की परंपरा है. धन्यवाद.

धन्यवाद श्रीमती सोनिया गाँधी और आप के पुत्र श्री राहुल गाँधी का, जिन्होंने नरेन्द्र मोदी को खून की दलाली करने वाला और मौत का सौदागर कहा. बटला हॉउस के आतंकियों की मौत पर आंसू बहाये और ‘भारत तेरे टुकड़े…’ वालों का इस्तकबाल किया.

धन्यवाद श्री अरविंद केजरीवाल जिन्होंने गिन-गिन कर चुनिंदा गालियां और आरोप देश के प्रधानमंत्री पर लगाए. और शहीद मोहन चंद्रा की लाश पर ठोकर मार दी.

धन्यवाद सर्वश्री दिग्विजय सिंह उर्फ़ दिग्गी राजा, मणिशंकर अय्यर, संजय झा, आलोक शर्मा, राज बब्बर, संजय निरूपम, सलमान खुर्शीद और रॉबर्ट वाड्रा जी.

धन्यवाद माया मेम साब जिन्होंने बार-बार प्रदेश को बताया कि मैंने 105 मुसलमानों को टिकट दिए और उनके सिपहसालार नसीमुद्दीन जिन्होंने दया शंकर सिंह की 12 साल की बच्ची को पेश करने की सार्वजनिक मांग की.

धन्यवाद रविश कुमार और पुण्य प्रसून बाजपेई जो खुद को भारत के लोकतंत्र का मालिक समझते रहे और स्वस्थ तर्क देने वालों की खिल्ली उड़ाते रहे.

धन्यवाद.

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