यात्रा आनंद मठ की – 8 : बंद कमरे में बंद पूर्व जन्म का रहस्य

ma jivan shaifaly anandmath yatra

ब्रह्माण्डीय निर्मल नियमों के साथ सामाजिक संस्कारों की पीढ़ी दर पीढ़ी की गयी निर्मम कंडीशनिंग की साझेदारी के परिणाम स्वरूप, प्रकट रूप में प्रेम का अनुभव, देह के मध्य बिन्दु से शुरू होकर जब आत्मा के परमात्मीय छोर तक पहुँचता है, तो अवतरित होता है एक विशेष कालखण्ड, कई युगों तक जिसका उदाहरण हर नए युग के नींव के पत्थर पर लिखकर हम संरक्षित कर लेते हैं उसकी प्राचीनता…

ऐसी ही एक प्राचीन कहानी मैंने अपने इस जन्म की नींव के पत्थर पर पढ़ी है.. जिसका हर किरदार अपने अपने युग से प्रकट होकर मुझे दे जाता है कुछ लौकिक अनुभव अगले जन्म की कुछ अलौकिक झलकियों के लिए…

तीथल के समंदर किनारे से उठाकर लाई प्रकृति की सबसे मादक तरंगों पर ओशो आश्रम की मोहर लगाते हुए जब लौकिक दुनिया में लौटी… तो प्रकृति की सुगन्धित ऊर्जा से मन आलोकित था…

गुजरात यात्रा का उद्देश्य बस एक फेसबुक मित्र के घर ओशो की चरण पादुका को छूने का सौभाग्य और समंदर से लौटते में ओशो आश्रम में मिले बब्बा के इस संदेश तक ही सीमित समझ रही थी कि “खाली दिल नहीं जान वी ये मंगदा, इश्क दी गली विच्चो कोई कोई लंगदा”…

लेकिन हम मानवों की सीमित बुद्धि में यदि ब्रह्माण्ड की असीमितता समा सकती तो इतने जन्मों की यात्रा करने की आवश्यकता ही क्या पड़ती…. और यह बात तब समझ आई जब इश्क की बिसात पर सच में जान की बाजी लगाना पड़ी…

ये जान केवल साँसों का आना जाना ही नहीं, इस जान पर सामाजिक जीवन की जो मोहर लगी होती है उसे ब्रह्माण्डीय नियम के लिए अपने हाथों से जानबूझकर पोंछ देना भी होता है…

इसलिए मैं अक्सर कहती हूँ मेरी यात्राएं और यात्रा में होनेवाली मुलाकातें ऊपरवाला तय करता है… तो वो यूं ही नहीं कह देती…

तो ऐसी ही एक कायनाती योजना के लिए मैंने सामाजिक व्यवहार की तालिका से कुछ नियम उस समय पोंछ दिए… जब दो दिन में वलसाड में सबसे मिल चुकने के बाद एक ऐसे व्यक्ति का बस ज़िक्र भर लोगों के मुंह से उड़ता उड़ता मेरे कानों तक पहुंचा… जिसे पहले मैंने सिर्फ हवा का झोंका समझ कर उड़ रही जुल्फों की तरह कानों के पीछे डाल दिया…

मैं नहीं जानती थी ज़िक्र की मामूली सी हवा जब कानों से गुज़र कर आँखों तक आएगी तो उसे देखते से ही सबसे पहले यही निकलेगा मुंह से … अच्छा हीरो! तो तुमसे मिलने के लिए आई हूँ बाईस साल बाद वलसाड लौटकर…

और वो हीरो, बिलकुल फ़िल्मी स्टाइल में मेरा हाथ थामते हुए चमकती आँखों के साथ कहता है… सुन्दरी, मुझे हीरो समझने की गलती मत करना, मैं हीरो नहीं विलेन हूँ…

उसके साथ पहली मुलाक़ात और पहले संवाद को बाकी सबने हल्का फुल्का मज़ाक समझ मुझे उसके साथ घर जाने के लिए उसकी बाइक के पीछे बिठा दिया… लेकिन मेरी आँखें उसकी आँखों की चमक से चौंधिया गयी थी.. और अनुभव कर पा रही थी उस तरंग को जो मुझसे हाथ मिलाते हुए उसकी ऊंगलियों के पोरों से गुज़रकर मेरी हथेली में फ़ैल रही थी…

बाइक चलाते हुए कहने लगा… दो दिन से सुन रहा था आपका ज़िक्र… मन में ऐसी उत्सुकता आज तक किसी के लिए नहीं जागी… आज तो मिलने का तय कर लिया था मैं भी कि देखूं तो आखिर है कौन ये हस्ती जिसे देखो वो उसका ज़िक्र कर रहा है… जिसके लिए मेरे मन में एक रहस्यमयी छवि बन रही है….
बाइक पर उसके पीछे बैठकर मैंने अपना एक हाथ उसके दायें कंधे पर रख दिया, और बाएं कंधे की ओर से उसका चेहरा गौर से देखने की कोशिश करने लगी… उसको अचंभित सी देखते हुए मैंने बब्बा से पूछा दो दिन इंतज़ार करवाया इसके लिए? कौन से जन्म का रिश्ता है ये और क्या उद्देश्य है इसके मिलने का? इसे भी वैसे ही क्यों नहीं मिलवाया जैसे बाकी रिश्तेदारों से बाईस साल बाद मिली.. वात्सल्य और पुराने दिनों की यादों के साथ…

तभी वो बोल पड़ा… अरे दो दिन बर्बाद कर दिए मैंने.. काश पहले ही मिल लेता आपसे… अब तो 15 मिनट में घर पहुँच जाएंगे… फिर पता नहीं आपसे अकेले में बात हो पाएगी या नहीं…

मैं और बब्बा तो जानते थे… उसको अभी पांच मिनट पहले पहली बार देखना, और पहली ही नज़र में पहचान जाना.. लेकिन इस लड़के के मन में क्या चल रहा है… ये मुझे देखकर क्या अनुभव करते हुए पहली ही मुलाक़ात में ऐसे बातें कर रहा है जबकि मैं उम्र में उससे 17 साल बड़ी हूँ… और बातें ऐसे कर रहा है जैसे किसी 17 साल की लड़की से कर रहा हो….

मैंने कहा, ठीक है ना मुझे घर पहुँचने की कोई जल्दी नहीं… चलो कहीं बैठकर बातें करते हैं… घर पहुंचकर रिश्तेदारों के बीच शायद मैं भी वो सब ना कर पाऊँ जो करने के लिए मुझे वलसाड लाया गया है….

वो हंस दिया और शरारत से पूछने लगा क्या करना चाहती हैं आप..

मैंने कहा ऐसे नहीं कहीं बैठते हैं….

उसने तुरंत गाड़ी घुमाई फिर फ़ोन घुमाया अपने किसी दोस्त से कहा… सिर्फ 15 के लिए तुम्हारा कमरा चाहिए… क्यों कैसे पूछने का समय बिलकुल नहीं है… बस ये समझ लो ज़िंदगी और मौत का सवाल है… ये मौका चूक गया तो जीवन में दोबारा ये मौका नहीं मिलेगा…

मैं अब भी अचंभित थी, ऐसी कौन सी बात है जो ये लड़का मुझसे पहली ही बार मिलकर इतना बेचैन हो रहा है… पिछले जन्म के किरदारों का इस जन्म में मिलन के अद्भुत किस्से कई बार लिखे हैं… इस बार जैसे किस्सा खुद मुझसे होकर गुज़रता सा लग रहा था… और मैं तेजी से चल रही कहानी में अचानक आए ट्विस्ट की तरह मंत्रमुग्ध सी पढ़ रही थी…

वो मुझे अपने दोस्त के घर ले गया, हम उसके कमरे में गए… दोस्त बाहर ड्राइंग रूम में जाकर बैठ गया…

उसने मुझे सामने पलंग पर बिठाया और दरवाज़ा बंद कर लिया… मैं साक्षी भाव से सबकुछ घटित होते देख रही थी… सबकुछ इतनी जल्दी जल्दी घटित हो रहा था कि मुझे उस पर विचार करने का मौका ही नहीं मिल रहा था… 15 मिनट पहले मिले एक पच्चीस साल के लड़के के साथ मैं उसके दोस्त के घर में एक कमरे में थीं…

फिर वो पलंग के पास आया और मेरे पैरों के पास ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया… और अपने हाथ से मेरे जूते उतारने लगा… समंदर किनारे से लौटकर आई थी तो जूते में रेत भरी हुई थी… उसने अपने हाथों में मेरे पैर लेकर साफ किये..

स्वामी ध्यान विनय शुरुआती दिनों में जब साक्षी भाव से जीने को कहते थे.. तो समझ नहीं आता था ये साक्षी भाव होता क्या है…. आज उनके मिलने के आठ वर्ष बाद जब खुद को उसी साक्षी भाव से बोलते, सुनते, देखते, जीते अनुभव करती हूँ तो लगता है जैसे सीधे कायनात से बातें हो रही है….

तो बस मैं उसे देख रही थी और खुद को घटना से गुज़रते हुए… उसने मेरे पैर साफ़ कर फिर से ज़मीन पर रख दिए और अपना चेहरा झुकाते हुए मेरे पैरों तक ले गया… उसने झुककर अपना माथा मेरे पैर पर टिका दिया…

मैंने अपने एक हाथ से उसका चेहरा प्रेम से थामा और दूसरे हाथ से उसके माथे को स्पर्श किया… फिर अपने गले में पहनी ओशो की माला का पेंडेंट उठाकर उसके माथे पर लगा दिया… उसने अपनी आँखें बंद कर ली….

दो मिनट बाद जब उसने आँखें खोली तो उसकी आँखें बदल चुकी थी… पूछने लगा ये आपने क्या किया…

मैंने कहा इसे जादुई स्पर्श कहते हैं….

ये कौन से बाबा हैं लोकेट में जिसके छूने भर से मुझे इतनी शांति अनुभव हो रही है… जैसे मेरे अन्दर किसी ने सबकुछ बदल दिया हो… और मैं तो इन सब बाबा वाबा को जानता नहीं और मानता भी नहीं… मैं शुद्ध भौतिक तल पर जीने वाला… और…

मैंने कहा- साक्षी भाव से शुद्ध भौतिक तल पर जीने वाला ही भौतिक शुद्धता का अर्थ जान सकता है.

उसने पूछा – आप कौन हैं…

मैंने कहा… रिश्ता बहुत दूर का है लेकिन फिर भी तुम्हारी बहन लगती हूँ…

कहने लगा … ना … आप कोई और हैं…

पिछले जन्म का कौन सा रिश्ता था ये मैं नहीं जानती थी, लेकिन जितना जान पा रही थी वहां बब्बा की मौजूदगी को गवाह बनाकर कहा- हाँ मैं कोई और हूँ… गले में पहनी ओशो की माला दिखाते हुए कहा- मैं यात्रा पर निकले लोगों की राह में पड़े पत्थरों को हटाने का काम करती हूँ… हमारे पिछले किसी जन्म का रिश्ता जिस मुकाम पर आकर अधूरा रह गया था यह एक मुलाक़ात उसके पूरे होने की अगली कड़ी है….

इस जन्म में हम जिनसे भी बहुत करीब से मिलता अनुभव करते हैं, वो पिछले किसी जन्म का अधूरा स्पर्श होता है जिसे पूरा करने के लिए नियति हमें दुबारा मिलवाती है…. ताकि पुराने कर्मों के क़र्ज़ से मुक्त होकर आगे का हिसाब किताब किया जा सके…

वो बहुत साधारण और शुद्ध भौतिक तल पर जीने वाला लड़का मेरी बातें समझ नहीं पा रहा था…  और सबसे बड़ी बात वो मुझे जानता ही कितना था…. दूर रिश्ते की बहन… जिसको पहली बार देखते से ही उसे लगा जैसे बहुत पास का रिश्ता हो… पास का रिश्ता तो था लेकिन पिछले किसी जन्म का, जो मैंने उसे नहीं बताया….

बस लग रहा था… जैसे हम बंद कमरे में नहीं किसी उपवन में हरसिंगार के वृक्ष के नीचे बैठे हैं… जिसमें से स्पर्श के कोमल फूल अपने आप झर रहे थे.. और हम उसे इकठ्ठा कर एक दूसरे की झोली में डाल रहे थे….

मैंने एक बार फिर माला में लगे बब्बा के पेंडेंट को उठाकर कहा – ये जादुई स्पर्श तुम्हें आगे की राह दिखाएगा… जब भी किसी दोराहे पर खड़े रहो… इस स्पर्श को याद कर लेना…

कहने लगा मैं नहीं जानता ये जादुई स्पर्श इस लोकेट का था या आपके हाथ का..

मैंने कहा… नहीं ये उस स्पर्श का जादू है जब तुमने मेरे पैर पर अपना माथा टिका दिया था…

उसने अपना माथा मेरे सामने झुकाते हुए कहा- एक बार फिर इस स्पर्श का जादू दिखा दो.. पता नहीं फिर जीवन में आपसे मुलाक़ात हो ना हो…

मैंने दोनों हाथ से उसका चेहरा थाम कर उसके माथे को चूम लिया…

उसने मेरे जूते फिर मेरे पैरों में डाल दिए… हम उठे उसने दरवाज़ा खोला.. तो बाहर वाले कमरे में उसका दोस्त बंद कमरे में एक स्त्री और एक पुरुष की मुलाक़ात का अपने हिसाब से अंदाज़ा लगता हुआ अजीब सी मुस्कान बिखेरता हुआ मिला..

उसने अपने दोस्त का परिचय करवाते हुए मिलवाया… मैंने उसके दोस्त के माथे पर हाथ रखा और मन ही मन कहा …. बंद कमरे का यह रहस्य जानने के लिए अभी तुम्हें दो जन्म और लेने होंगे….

हम दोनों फिर गाड़ी तक आये, मुझे भैया के घर छोड़कर वह अपने घर लौट गया…

फिर दुबारा मिला वलसाड़ के रेलवे स्टेशन पर… ट्रेन छूटने को थी, वो जल्दी से अपना पर्स टटोलने लगा…विदाई से पहले मैंने उससे हाथ मिलाने के लिए खिड़की से बाहर निकाला तो उसने एक पांच का सुनहरा सिक्का मेरे हाथ में देते हुए कहा… રસ્તા માં કોઈ નદી પડે તો એમાં નાખી દે જો… ” (रास्ते में कोई नदी पड़े तो उसमें डाल देना…)

और मुझे लगा जैसे मैं पूरी की पूरी नदी हो गयी हूँ, प्रेम की नदी जिसमें सिक्का डालकर लोग मन्नत माँगते हैं और नदी मन्नत पूरी होने का आशीर्वाद देती है…

(यात्रा जारी है)

पहले भाग यहाँ पढ़ें – 

यात्रा आनंद मठ की – 1 : पांच का सिक्का और आधा दीनार

यात्रा आनंद मठ की – 2 : जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

यात्रा आनंद मठ की – 3 : यात्रा जारी है

यात्रा आनंद मठ की – 4 : Special Keywords To Optimize Your Search

यात्रा आनंद मठ की – 5 : तू आख़िरी स्थिति में ही है, देर न कर, संयोग के बिखर जाने में देर नहीं लगती

यात्रा आनंद मठ की – 6 : आजकल पाँव ज़मीं पर नहीं पड़ते मेरे…

यात्रा आनंद मठ की – 7 : मैं इश्क़ हूँ दुनिया मुझसे चलती है

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