पॉइंट ब्लेंक शूट – 1

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(1) “मैं एक इंसान हूँ… मेरी भी कोई इच्छा-अनिच्छा है यह बात मैं किसी को कैसे समझाऊँ? पिताजी के अनुसार मैं अकेली रहकर खराब हुई जा रही थी. लोग बड़ी आसानी से स्त्रियों को “खराब” की उपाधि दे देते हैं. खराब होना किसे कहा जाता है? पुरुष के साथ संपर्क होने से स्त्रियाँ खराब हो जाती है? लेकिन स्त्रियों के साथ पुरुष का किसी भी तरह का संपर्क पुरुष को तो खराब नहीं करता?

स्त्रियों के चरित्र और चरित्रहीनता का मामला सिर्फ शारीरिक घटनाओं से तय किया जाता है. कितना विचित्र नियम है.”

(2) “मेरा शरीर पुरुष से भिन्न होगा ही, लेकिन इस भिन्नता के कारण मेरी सीमा क्यों बांध दी जाएगी, क्यों मेरी स्वतंत्रता पर आंच आएगी? मैं चाहती हूँ कि मैं एक पूर्ण मनुष्य के रूप में अपनी शाखा प्रशाखा चारों ओर फैलाकर जीती रहूँ… मेरा मन होता है कि अपने ऊपर से दूसरों का अकारण जताया गया अधिकार उतारकर फेंक दूं. मेरा मन करता है, खूब मन करता है कि अकेले जी सकूं. इब्सन का वह कथन जानती हो न – The strongest man in the world is the man who stand most alone. एक आदमी की इच्छा-अनिच्छा के आगे मेरे हाथ-पाँव, मेरा सारा शरीर बंधा रहता है, ऐसा क्यों? इससे मुझे क्या लाभ है?”

(3) इस देश में कोई बच्चा अपनी माँ के नाम से नहीं जाना जाता, वह जाना जाता है अपने पिता के नाम से. स्कूल में भर्ती होने से लेकर नौकरी चाकरी, यहाँ तक कि रिटायर्ड होते समय भी पिता के नाम की ज़रूरत होती है. माँ की नहीं. अब मैं खुद को धीरे धीरे आदमी बना रही हूँ. बहुत दिनों तक मैं रेंगने वाले कीड़े की तरह जीवित रही. कितने दिनों तक रीढविहीन जीवन अच्छा लगता है?”

(4) पहली बात तो मैं कुंवारी नहीं, दूसरी सतीत्व की प्रचलित धारणा में विश्वास नहीं रखती. क्योंकि यह बड़े ही आलीशान ढंग से स्त्रियों पर आरोपित एक संस्कार है. मैं यदि अपने विवेक और बुद्धि से चलना सीख सकूं तो इसे ही मैं ज्यादा बेहतर समझती हूँ. और जहां तक खाना पीना, साफ़-सफाई आदि का काम जो स्त्रियों के लिए अलग से तय कर दिया गया है, मुझे लगता है यदि परिवार दोनों का है तो यह भी दोनों को मिलकर करना चाहिए. घर की बहुएं दरअसल एक तरह की दासियाँ ही होती है– साफ़ सुथरी, सुशील दासी. जिससे खाना भी बनवाया जा सकता है, घर-द्वार की साफ़-सफाई करवाई जा सकती है, और बाहर के लोगों के सामने मान सम्मान की रक्षा भी होती है.

(5) मैं दिन ब दिन बहुत साफ़ होती जा रही हूँ. शायद इसी जगह पर पहुँचने के लिए ऊबड़-खाबड़ रास्तों वाले लम्बे कष्टपूर्ण जीवन का सफ़र मैं तय कर आई. मुझे अभी भी लगता है, मेरी मंजिल यही है. यहाँ आकर स्थिर खड़ी होऊंगी इसीलिए मेरे पिछले जीवन में इतनी भयानक अस्थिरता थी. कितनी बड़ी गलतफहमी के बीच मैं रह रही थी… सोच रही थी मुक्ति शायद सामूहिक जीवन से आती है. मुक्ति शायद प्यार से ही संभव है.

जो समाज स्त्री को पुरुष के शासन और शोषण के बीच रखकर बड़े होने को आदर्श मानता है, जिस समाज में स्त्री पुरुष के पाक-विवाह सम्बन्ध को प्यार समझा जाता है, दरअसल, प्यार का हम लोग गलत मतलब निकालते हैं. पुरुषगण स्त्री के मन और शरीर को अपने अधीन रखना चाहते हैं और स्त्री भी इसलिए पुरुष की मर्जी से बलिवेदी पर अर्पित होना चाहती है. चाहे और कुछ भी कहें, मैं उसे प्यार नहीं कहती. किसी को बंधन में जकड़ने का नाम प्यार नहीं है.
उपरोक्त बातें तसलीमा नसरीन की किताब चार कन्या की कहानी दूसरा पक्ष से हैं.

कुछ किताबें ऐसी होती हैं जिनमें लिखी बातों की समीक्षा नहीं की जा सकती, उसे कितना अच्छा, कितना बुरा के पैमाने पर रखकर तौला नहीं जा सकता… उसमें बुरी बातें भी इतनी सटीक और दिल दहला देने वाली होती है कि हम चाहकर भी उसे नकार नहीं सकते…. बेधड़क ऐसी सटीक बातें लिखने वालों के हाथ में कलम नहीं होती रिवोल्वर होती हैं, जो पॉइंट ब्लेंक शूट करती है… यानी निशाना चूकने की कोई गुंजाइश नहीं…

चार कन्या के मार्फ़त ऐसा ही निशाना तसलीमा ने समाज पर लगाया है, उस समाज पर जहां औरत के अन्दर जन्म ले रही अधिकार बोध की भावना को पुरुष पैरों से कुचलने के बाद भी समाज में अपनी छवि को बेदाग़ बनाए रखने में सफल हो जाता है…

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