भारतवर्ष के मूलाधार पर प्रहार-3 : भारत के आज़ाद युवा ने भारतीय आत्‍मा को पहना दी बेड़ियाँ

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मूलाधार चक्र किसी भी तरह सुरक्षित न रह पाए इसको सुनिश्चित करने के लिए जिस प्रभावशाली माध्यम का सहारा लिया गया वह मनोरंजन और सिनेमा था. संगीत, नृत्य, कला इत्यादि व्यक्तिगत एवं सामूहिक संवेदनाओं को व्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम रहे हैं इस भारतवर्ष में.

स्वतंत्रता के पश्चात जैसे-जैसे वैज्ञानिक प्रगति हुई और नए-नए साधन आ गए इस अभिव्यक्ति को आम जनमानस तक पहुंचाने की उसका एक जबरदस्त प्रभाव मूलाधार चक्र पर भी पड़ा.

दृश्य एवं श्रव्य माध्यम के साथ ही कथा, अभिनय, कला, संवाद, संगीत वातावरण सबके सहयोग से यह दर्शकों तक कोई भी सन्देश जिस तेजी से पहुंच सकता है, दूसरा कोई भी माध्यम नहीं.

चूँकि यह एक ऐसा माध्यम है जिसका प्रभाव बहुत ही तेजी से व्यक्ति के मन-मस्तिष्क पर बहुत ही गहरा पड़ता है तो इनके द्वारा परोसी जाने वाली सामग्रियां ही आदर्श का रूप लेती हैं.

उदाहरण के लिए संगीत को ले लीजिये. संगीत का मुख्य उद्देश्य शरीर और आत्मा को एक रूप देने के लिए है, लेकिन व्यवहार में इसका उद्देश्य मनोरंजन के लिए है. भारत वर्ष में ही सबसे पहले संगीत की उत्पत्ति हुई. इसका आधार सामवेद है और मार्ग भक्ति रहा है.

मानव प्रगति के लिए शिक्षा एक माध्यम है और यह उद्देश्ययुक्त होनी चाहिए अथवा वह व्यर्थ है. शिक्षा के विकास के क्रम में एक ऐसी स्थिति आती है जबकि मनुष्य निश्चित रूप से मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों या आदर्शों का निर्माण कर लेता है. इन आदर्शों के समग्र रूपों को ही हम संस्कृति कहते हैं जिसकी उत्पत्ति संस्कार से होती है अर्थात जो मानव जाति को सभ्य जीवन जीने के लिए अवसर दे, मार्ग प्रशस्त करे.

जीवन को उत्तम, उन्नत बनाए , वही संस्कृति है. संस्कार बनते हैं माता -पिता तथा घर के वातावरण से , शिक्षा-दीक्षा से तथा संगत और साहित्य से. वातावरण, शिक्षा-दीक्षा तो पहले ज्ञान के रूप में होते हैं, किन्तु उनसे प्रेरित आचरण का बार-बार पालन करने से वे संस्कार बन जाते हैं. संस्कार मन पर अंकित होकर संचित रहते हैं और फिर मानव के स्वभाव के रूप में परिणित हो जाते हैं अर्थात प्रवृत्ति के रूप में प्रेरक बन जाते हैं.

हालांकि सिनेमा के आगमन के पूर्व साहित्य समाज को निर्देशित करता रहा , किन्तु सिनेमा के आगमन के बाद समाज को सीधे इसने निर्देशित नहीं भी किया तो प्रभावित करने का कार्य बखूबी किया है. साहित्य और सिनेमा में एक बात तो सामान्य है कि दोनों समाज को प्रभावित करते हैं. वैसे भी कलाएं समाज से उत्पन्न होकर समाज को प्रभावित करते हुए उसी में विलीन हो जाती हैं. स्वतंत्रता के पहले का सिनेमा यदि देखा जाए तो उसमे कथानक समाज को एक दिशा प्रदान करने वाला था.

भारतीय सिनेमा में यद्यपि दादा साहब फाल्के से पूर्व ज्योतिष सरकार ने 1905 में बंग-भंग के विरुद्ध फिल्म बनायी थी, किन्तु ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया था. सन 1900-1930 तक की मूक फिल्मों में भारतीय जनमानस को प्रेरित करने वाले नायकों पर आधारित पृष्ठभूमि का अनुपात अधिक था.

बहुत सूक्ष्म विश्लेषण करने पर मुझे यह समझ में आता है कि स्वतंत्रता के पश्चात जैसे -जैसे राजनीतिक पटेल पर से राष्ट्र के प्रति चिंतन करने वाले ओझल होते गए वैसे-वैसे इस रजत पटल पर एक ऐसा गिरोह सक्रीय हुआ जिसने प्रगतिशीलता एवं प्रयोग के नाम से एक ऐसे वातावरण को तैयार किया जो लोगों को भी बहुत भाया लेकिन उस प्रयोग में से भारतीयता एवं उसकी आत्मा गायब होती गयी.

प्रगतिशीलता एवं प्रयोग के नाम पर एक ऐसे व्यभिचार, एक ऐसी संस्कृति को बढ़ावा दिया गया जिससे यहाँ के समाज, पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं पारम्परिक व्यवस्थाओं को छिन्न-भिन्न किया गया. यह एक बहुत ही सुनियोजित षड्यंत्र था और इनको पेश करने वाले तथाकथित प्रगतिशील मंडली यहाँ के जनमानस का ‘आइकॉन’ या कहिये रोल-मॉडल बन गयी.

स्वतंत्रता के बाद पाले गए स्वराज का भ्रम धीरे-धीरे भारतीय जनमानस की आँखों में चुभने लगा था. पहले गोरे मालिक थे, अब अपने ही रक्त, वर्ण के काले मालिक बन गए थे. साहित्य में रघुवीर सहाय, अज्ञेय, शमशेर बहादुर सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, मुक्तिबोध, निराला, धूमिल, नागार्जुन, त्रिलोचन शास्त्री, प्रेमचंद, आर. के नारायण, राही मासूम रजा इत्यादि.

साहित्यकारों के साहित्य में आज़ादी के बाद खंडित होता स्वप्न दिखता है. उधर समाज में ग्रामों से शहरों की ओर पलायन बढ़ने लगा. शिक्षा, रोजगार प्राप्ति के लिए अब किसान खेतिहर होना नहीं चाहता वह भी अपने बच्चों को ऊँची शिक्षा दिलाकर हाथ में कलम पकड़ने वाला अफसर बनाने का ख्वाब पालने लगा. फलस्वरूप ग्रामीण युवकों का शहर में पलायन, जीवन की जद्दोजहद, शहर की व्यक्तिवादी आत्माविहीन माहौल तथा रोज़गार की तलाश ने उनमे कुंठा और तनाव पैदा किया.

साथ शहरी जीवनशैली, प्रशासनिक दुर्बलताएं, लालफीताशाही, नौकरशाही, अयोग्य पत्रों को मिलती सफलता ने युवा मन में आक्रोश भरा. राजनीतिज्ञों द्वारा युवाओं का अपने स्वार्थ हेतु प्रयोग और बाद में उपेक्षा ने युवामन में आक्रोश, हिंसा, बदले की भावना को बल दिया और इन्हीं भावनात्मक अभिव्यक्तियों को फिल्म होता देख आक्रोशित मन क्षणिक सुखवाद में डूबता चला गया.

यद्यपि इसी दौरान भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों, परिवार मित्र आदि संबंधों में मधुरता को गुलज़ार, हृषिकेश मुख़र्जी, वासु भट्टाचार्य जैसे निर्देशकों ने समझकर अपनी सशक्त कलात्मक फिल्म अभिव्यक्तियाँ दी. यद्यपि भारतीय धर्म एवं समाज में भी प्रेम को पूजा कहा गया है किन्तु उसकी उदारता त्याग और बलिदान में अधिक है लेकिन सिनेमा ने इस प्रेम की उदारता के बदले हुए रूप को प्रस्तुत कर प्रेम का विकृत रूप विवाह-पूर्व सम्बन्ध, कुंवारी माँ, प्रेम के स्थान पर यौनतृप्ति, यौन कुंठा, यौन-लिप्सा, देह-आकर्षण को ही उभारा है.

फलस्वरूप स्त्री भोग की वस्तु मान ली गई न कि प्रेम की. प्रेम के साथ ही हिंसा भी साहित्य से अधिक सिनेमा प्रभावी रहा है. दृश्य-श्रव्य होने के कारण हिंसा के बदलते और नए-नए रूपों में फिल्मकार दर्शकों को रूबरू कराते हैं जिससे दर्शकों में अधिक से अधिक रोमांच जागे. कम से कम अधिक से अधिक बॉक्स-ऑफिस कलेक्शन की चाह ने कब धीरे-धीरे भारतीय जनमानस को भावना, मूल्य, संस्कारों के प्रति उदासीन बना दिया शायद उसे भी नहीं पता.

भारतीय संगीत, भारतीय नृत्य विधाएँ, लोक कलाएं इत्यादि जो मन- मस्तिष्क, आध्यात्मिक एवं साथ-साथ मनोरंजन की भी पराकाष्ठा रही हैं, धीरे- धीरे सिनेमा ने इसको तिलांजलि दी है और यह बस एक भद्दे मनोरंजन का साधन मात्र बन कर रह गई है और जिसके कथानक में भारतीय सामाजिक, पारिवारिक समरसता को तोड़ने का पूरा प्रयास किया गया है.

भारत के इतिहासकारों ने जो तोड़-मोड़कर इस राष्ट्र का एक दिग्भ्रमित इतिहास लिखा है उसको कथानक बनाकर और उसके एक हाथ आगे बढ़कर उसमे काल्पनिक सामग्रियां डालकर उसको ही इतिहास प्रमाणित कुत्सित कार्य किया है. शास्त्रीय संगीत, लोकसंगीत, आदिम संगीत, जन संगीत भक्ति एवं लोकप्रिय संगीत, भारतीय नृत्य, लोक नृत्य हमारे रजत पटेल से गायब होते जा रहे हैं और पाश्चात्य संगीत जिसकी आत्मा नहीं है जो केवल मनोरंजन एवं पैसे कमाने का साधन मात्र है आज इतना लोकप्रिय हो गया है कि वही आज संस्कार बन गया है?

कुछ दिन पहले मैंने पंडित बिरजू महाराज से यही प्रश्न किया था कि आज जब राज-दरबारों का खात्मा हो चुका है जो कभी इन विधाओं के संवर्धक, संरक्षक थे आज के दौर में कला एवं कलाकार के सामने बहुत से प्रश्न खड़े हो गए हैं तो उनका उत्तर था कि ‘ हम सिखाने वालों और सीखने वालों के सामने एक चुनौती तो खड़ी हो गई है, आज हमारे सिखाये हुए शिष्यों के सामने खाने- पीने, ओढ़ने और कमाने का प्रश्न खड़ा हो गया है. इसके फलस्वरूप आकर्षण कम होता जा रहा है और उनके अंदर अब वो समर्पण नहीं रह गया है. ‘

अभी कुछ दिन पहले संजय लीला भंसाली द्वारा निर्देशित फिल्म को लेकर कितना बवाल हुआ. मान लीजिये कोई बवाल नहीं हुआ होता और यह फिल्म बनकर आ जाती तो हमारी पीढ़ी तो उसी कथानक को अपना इतिहास मान लेती और आगे आने वाली पीढियां इस फिल्म को एक प्रमाण के रूप में मान लेती.

क्या इतिहास को उसके वास्तविक रूप में प्रदर्शित करके, उसमें विभिन्न तरह के भारतीय अवयवों को मिलाकर क्या फिल्म नहीं बनायी जा सकती है जिससे हम अपनी आने वाली पीढ़ी को इनको अपनाने के लिए प्रेरित कर सकें.

पिछले 30 वर्षों के सिनेमा को देख लिया जाए तो उसके कथानक, नृत्य, संगीत इत्यादि को देख लिया जाए तो वह पूरी तरह दिशाहीन है. ना तो वह व्यक्ति को दिशा दे रहा है, न तो समाज को और न ही राष्ट्र को. जहाँ सामवेद, भरत का ‘नाट्यशास्त्र’, मातंग का ‘बृहद्देशी’, नान्यदेव का ‘भारतभाष्य’ शारंगदेव का ‘संगीत रत्नाकर, अध्यात्म विवेक, छंदोविच्चति’, पाश्र्वदेव का ‘संगीतसार’ और अनेक ग्रन्थ हो संगीत और अन्य कलाओं पर वहाँ क्या हमें पाश्चात्य को अपनाने की आवश्यकता है.

सीखने में कोई मनाही नहीं है लेकिन उसको संस्कार बना दिया गया. कथानक को उठाकर देख लीजिये जहाँ व्यक्तिवाद को बढ़ावा दिया गया और अधिकारों के नाम पर परिवार, समाज एवं उसकी संरचना को तोड़ा गया है और संबंधों में एक अजीब सी कृत्रिमता को बढ़ावा दिया गया कि सब कुछ छिन्न-भिन्न हो जाए.

सबसे बड़ा दुर्भाग्‍य जो हमारे देशवासियों के साथ है वह यह कि वे हर विषय को बहुत हल्‍के रूप में लेते हैं. संगीत कला तो और भी ज्‍यादा इस हल्‍केपन का शिकार हुई है क्‍योंकि इसका सीधा संबंध मनोरंजन से भी है. जहां मनोरंजन की बात आयी वहां पूरे विश्‍व की मानसिकता एक ही दिशा में जाती हुई दिखाई देती है.

आज पूरा भारत (विशेष रूप से वो अधिकारी जो कुछ करने लायक जगह पर बैठे हैं) संगीत के नाम पर सिर्फ फिल्‍म संगीत सुनना पसंद करते हैं और आज के बच्‍चे म्‍यूजिक वीडियो देखना!

फिल्‍म संगीत साठ के दशक तक फिर भी थोड़ा ठीक था जहां समय समय पर भारतीय वाद्यों का प्रयोग बड़ी सुन्‍दरता से किया जाता था (कम से कम इसी बहाने कुछ भारतीय वाद्यों की आवाजें जनता जनार्दन के कानों में तो पड़ जाती थी).

पर जैसे जैसे भारत का युवा आज़ाद होता गया उसने भारतीय आत्‍मा को तो बेड़ियाँ पहना दी और अपने भौतिक और नश्‍वर शरीर को गिरवी रख दिया पाश्‍चात्‍य संस्‍कारों के बैंक में. अब एक नया भारत आपके सामने खड़ा है जो कार्पोरेट दुनिया का सबसे बड़ा दानव साबित हो रहा है.

जहां भारतीयता नहीं वहां भारतीय आत्‍मा कहाँ मिलेगी. जिस प्रकार भारतीय वाद्य बिना सुर में ढाले नहीं बजाये जा सकते वैसे ही भारतीय आत्‍मा बिना संस्‍कारित हुए प्रज्‍ज्‍वलित नहीं हो सकती है. वैसे भी चाहे कितना ही विदेशी परिवेश में भारतीय जी ले, उनकी चमक दमक अपना ले किंतु वह रहेगा भारतीय ही (संस्‍कारहीन ही सही).

क्या यह मूलाधार चक्र पर प्रहार नहीं है ?

जब उपरोक्त विधियों एवं षड्यंत्रों द्वारा मूलाधार चक्र पर ही प्रहार किया गया तो आप इस बात से इसका आकलन कर सकते हैं कि ऊपर के अन्य चक्रों और तीनों नाड़ियों पर उसका कितना प्रभाव होगा और किस अवस्था में होंगी वह ?

सहस्त्रार तक तो पहुँचते- पहुँचते यह राष्ट्र कितने खण्डों में हो जाएगा इसका अनुमान लगाना एक जटिल प्रश्न है और जिसके लक्षण पिछले तीन वर्षों में दिख रहे हैं.

पहला भाग यहाँ पढ़ें –

भारतवर्ष के मूलाधार पर प्रहार : आवश्यक है पुनः आत्मसाक्षात्कार

भारतवर्ष के मूलाधार पर प्रहार-2 : जहां लहू पीना ही प्रवृत्ति हो वहां निर्मल जल कहां से देगा स्वाद

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