आवश्यक है उप्र की प्रचण्ड विजय का सत्य जानना-समझना

ध्वस्त विरोधी शिविर, खंडित छत्र, अपने ही रक्त-स्वेद में सने धरती पर लोटते हुए महारथी, श्लथ-क्लांत कराहते हुए असंख्य पदातिक, भरतपुर लुट गयो रात मोरी अम्मा की रुदाली, भग्न रथ, दुम दबा कर भागती शत्रु सेना, लहराती विजय पताकाएँ, दमादम गूंजते हुए नगाड़े, बजती हुई विजय दुंदुभी, पाञ्चजन्य का गौरव-घोष……

अभी कुछ ही समय बीता है कि इन घटनाओं का कच्चा-पक्का सा भी अनुमान न लगा पाने के कारण सब कुछ जानने, जनाने और जनने का दावा करने वाला मीडिया मनमाना बोलने-कोसने-हाहाकार मचाने में लगा था.

11 मार्च की प्रातः 8 बजे तक इसकी कल्पना भी नहीं की जा रही थी. अगर कोई इस स्थिति का दावा कर रहा था तो माइकधारी सर्वज्ञ एंकर और न जाने किस कसौटी पर कस कर चुने गए विशेषज्ञ, दावा करने वालों की खिल्ली उड़ा रहे थे.

अचानक हू-हू की सियार-ध्वनि करती उच्छ्वासें छोड़ती जमात फूल बरसाने लगी. यह प्रचण्ड चमत्कार कैसे हो गया? जिस बाल्मीक, क्षत्रिय, ब्राह्मण, जाट, वैश्य, कुर्मी, कहार आदि के बूते चौपड़ बिछायी गयी थी, उसने ही बिसात उलट दी.

जिस यादव वर्ग को अपनी पालकी ढोने के लिये बपौती मान कर चला जा रहा था, उसी ने पालकी खड्ड में दे मारी. जिस जाटव वर्ग को ‘देश की मज़बूरी हैं भैंन जी जरूरी हैं’ का अखण्ड कीर्तनिया माना गया था, उसी ने ‘मंगल भवन अमंगल हारी, इस बारी भाजपा हमारी’ का कीर्तन करना शुरू कर दिया.

राष्ट्र के संस्थानों पर पहला हक़ मुसलमानों का है… हम 100 सीटें मुसलमान को दे रहे हैं… हम डेढ़ सौ सीटें अल्पसंख्यकों को दे रहे हैं… जैसी बातें करने वालों की हिमायत छोड़ कर मुसलमानों की आधी जनसँख्या भी बड़े पैमाने पर इसी जमात में सम्मिलित हो गयी.

तीन तलाक़ पर बरेलवी, देवबंदी आलिम भौंहे चढ़ाये, ज़बान लपलपाते, हाथ नचाते मुस्लिम पर्सनल लॉ को अस्पृश्य बताते हुए कथकली कर रहे थे. अब पता चला कि बुर्क़े में बंद अल्लाह की बेज़बान बकरियां भी ख़ामोश गुर्राहट रखती हैं.

ढेर सारे विशेषज्ञ, विद्वान इस परम गौरवशाली विजय का विश्लेषण करेंगे. तरह तरह से इसे विकास की जीत बताएँगे अतः इस प्रचण्ड विजय का सत्य बताना, समाज तक पहुंचना आवश्यक है.

विकास का सच्चा दावा, कृपया ध्यान रखें सच्चा दावा अखिलेश यादव का भी था, वह कैसे हवा हो गया? चाचा, सौतेली माता, सौतेले भाई पर कालिख पोत कर अपनी क़मीज़ सबसे उजली बताने के चरखा दांव के दांत अखाड़े में क्यों बिखर गये?

हरिजनों की एक छत्र साम्राज्ञी की माया अंतर्ध्यान कैसे हो गयी? बाल्मीक, क्षत्रिय, ब्राह्मण, जाट, जाटव, यादव, वैश्य, कुर्मी, कहार…..हर वर्ग ने अपने वर्ग के हित-अहित से ऊपर उठा कर भाजपा का कमल क्यों खिलाया?

इसका वास्तविक कारण केवल और केवल राष्ट्र के मूल स्वरूप की चिंता है. इस तेजस्वी व्यक्ति का नेतृत्व धर्मरक्षा करेगा, का अखण्ड विश्वास है.

धर्मध्वजा उठाने वाले हाथों के लिए उत्तर प्रदेश में 5 साल के लिए अखण्ड राज्य प्रसन्नता का विषय है. राज्य सभा के बदलने जा रहे समीकरण आश्वस्त करते हैं, मगर यह पर्याप्त नहीं है.

भाजपा के वरिष्ठ अधिकारियों! बुर्के में क़ैद रखी जातीं, अल्लाह की जिन बेज़बान बकरियों ने घर के फाड़-खाऊं शेरों की हुक्मउदूली कर तीन तलाक़ के ख़िलाफ़ ख़ामोश गुर्राहट दिखाई है, उनके सरों पर लटकती तीन तलाक़ की तलवार हटानी आवश्यक है. अब समान नागरिक संहिता स्थापित करने का समय आ गया.

आपको समाज ने इन वैचारिक भेड़ियों के दांत, नाख़ून तोड़ने के लिए आश्वस्तकारी बहुमत दिया है और यह आपको मुज़फ़्फ़रनगर, मेरठ, कैराना की नागफनी को जड़ से उखाड़ने के लिये मिला है.

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