अधिक सार्थक होगी अर्थ से जुड़ी हिन्दू एकता

आदमी अपनी रोटी के लिए लड़ता है. हिन्दू इकॉनमी शायद उत्तर है. इकॉनमी से एकता. अपने से गरीब का ख्याल रखें, उसे ऊपर उठाने में सहायता करें. आज बचाए दो पैसे कल महंगे पड़ सकते हैं.

इस बात को यूं समझिए, वैसे ये है काफी कॉमन सैन्स. आदमी अपनी रोटी के लिए लड़ता है. रोजी उसे रोटी देती है. जिससे उसे रोजी मिलती है उसे बचाने के लिए वो लड़ता है क्योंकि वहाँ से उसकी रोटी मिलनी हैं.

उपभोक्ता-ग्राहक होने के कारण हर आदमी दूसरों के लिए रोजी-रोटी का केंद्र होता ही है. कोई कम कोई ज्यादा. एक सोच के तहत इसी बात को समझना है तो हम अपने सामाजिक ताने बाने का संरक्षण भी कर पाएंगे.

जहां संरक्षण आवश्यक होता है वहाँ उसके लिए अलग खर्च आवश्यक होता है, नहीं तो आप का अस्तित्व खत्म हो जाएगा. इसे आप एक continuous war tax समझ लें तो बेहतर है.

बस इतना ही है कि अपनों को सक्षम बनाने में ये दो पैसे ज्यादा देने में दुख नहीं होना चाहिए. और संरक्षण की बात वहीं प्रासंगिक होती है जहां हमला होता है.

इस्लाम और वाम की जोड़ी इस हमले में हमेशा लगी रहती है. हमला करने के लिए पैसे उन्हें भी चाहिए. वामी अपने संस्थानों के लिए सरकार से ग्रांट लेते हैं जिन्हें वे सरकारी खर्चे से सरकार का हिस्सा बनाकर चलाते हैं. हमारे ही खर्चे से हमें जहर पिलाते हैं.

इस्लाम ज़कात से खर्चा जुटाता है लेकिन ज़कात के लिए कमाई तो लगती ही है. वो कहाँ से आती है?

अपने शत्रुओं के आय के स्रोत सुखाना भी रणनीति है. पेड़ काटना मना था फिर भी बनी नादिर के खजूर के पेड़ हुजूर ने इसी लिए काटे थे. सब से सीखना चाहिए, शत्रुओं से भी कारगर रणनीति सीखने से परहेज नहीं करना चाहिए. श्री राम ने लक्ष्मण को रावण के पास भी भेजा तो था ना? हमें भी सीखना चाहिए.

जो समाज आर्थिक दृष्टि से सक्षम होगा उसकी सुनी भी जाएगी, भेड़ों की तरह हाँका नहीं जाएगा. व्यापक राष्ट्र हित में निजी क्षुद्र स्वार्थ से ऊपर उठना आवश्यक है, निजी क्षुद्र स्वार्थ के जाल में आ कर ही आज तक हमारा कैराना होता आया है.

और यकीन मानिए, अगर हम फिर वही गलती दोहराते रहे तो अगली पीढ़ियों को यह पता नभी हीं चलने वाला कि कैराना क्या था, क्योंकि इतिहास लिखने वाले यही लोग होंगे जो अकबर को महान बनाते रहे हैं.

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY