भारत को एक रखने के लिए जंग रहेगी, जंग रहेगी!

एक लक्ष्य है, हमारे दलित भाई अपने परंपरागत व्यवसायों के आर्थिक सामर्थ्य – क्षमता को समझें और यह भी जान जाये कि वामपंथियों की साज़िशों तहत उन्हें उनके व्यवसायों से घृणा उत्पन्न कराई गई है और उनके व्यवसाय त्यागते ही वे व्यवसाय मुसलमानों ने उठाए हैं जिनसे मुसलमान धाकड़ कमाई कर रहे हैं.

कमाई इसलिए कर रहे हैं क्योंकि व्यवसाय में उतना दम था, है और रहेगा. अब यह भी देखें, जानें और समझे कि दलित भाइयों के व्यवसाय त्यागने के कारण एक पीढ़ी बाद यह हुनर रहे, न रहे.

अब परंपरागत व्यवसाय को त्यागे हमारे दलित भाई न घर के न घाट के रह गए. आरक्षण एक समाज को भी पूरा नहीं पड़ सकता, ऊपर से वामपंथी हर दिन आरक्षण के लिए नए दावेदार पैदा किए जा रहे हैं.

बहुत दुख होता है जब एक सक्षम समाज को अर्धसत्य बोलकर अपनी सदियों की अर्जित और उत्तरोत्तर विकसित की गयी क्षमताओं से शर्मिंदा किया जाता है और उनसे विमुख किया जाता है.

उससे भी ज्यादा दुख तब होता है जब इस समाज में जो हताशा, जो निराशा पनपती हैं उसे हवा दे कर पूरे देश का विरोधी बनाया जाता है और शत्रुता की दुर्भावना को बढ़ावा दिया जाता है.

एक उदाहरण देता हूँ. कश्मीर को बड़ी समस्या बनाया गया बेरोजगारी से. कमाई के स्रोत सुखाये गए और इस्लाम का पलीता लगाया गया. टूरिज़्म आधारित अर्थव्यवस्था हमेशा बहुत भंगुर होती है. कोई संक्रामक रोग निकला तो लोग बड़े समय तक दूर रहते हैं. बम फूटने लगे तो कौन जाएगा पैसे देकर जान मुश्किल में डालने? अपहरण हुए, हत्याएँ हुई.

ऊपर से धारा 370 के कारण कोई बाहरी व्यवसायी इंडस्ट्री में निवेश नहीं करेगा. वहाँ के नेता भी ऐसे कि केंद्र से खींचते रहे, लेकिन समस्या को ठीक करने के लिए हस्तक्षेप करने नहीं दिया. सामरिक महत्व के कारण छोड़ भी नहीं सकते थे, कश्मीर और कश्मीरी मुसलमान नाजुक जगह का फोड़ा बन गए भारत के लिए.

बेरोजगार बने युवाओं के पास अन्य क्षमताएँ भी उपलब्ध नहीं थी कमाने को. सोचिए, चालीस साल में तीन पीढ़ियाँ बेरोजगार बना दी गई. ऊपर से इस्लाम की पुकार. फिर कहना ही क्या. आज लोग आतंकवाद में कमाई देख रहे हैं, करियर ढूंढ रहे हैं.

इसमें अव्वल दर्जे के कमीने ही पनपते हैं जो शांति और खुशहाली के लिए चलते सभी कोशिशों को अपने लक्ष्य से गद्दारी का तमगा दे कर ऐसे लोगों की क्रूरतापूर्ण हत्या करवाते हैं ताकि लोगों में न केवल मौत का लेकिन ऐसे दर्दनाक मौत का खौफ रहे.

यह क्रूरता इस्लाम और वाम, दोनों का चहेता हथकंडा रहा है. आज केरल में RSS वालों की हत्याओं में यही क्रूरता दिख रही है.

दलितों की समस्या ऐसी ही है. क्या वामपंथी उनको संगठित कर के अपने परंपरागत व्यवसायों को बेहतर नहीं बना सकते थे? क्या इस संगठन की शक्ति से सरकार से व्यवसाय के अपग्रेड के लिए सुविधाएं नहीं मिल सकती थी? आज जो मुकाम मुसलमानों ने पाये हैं, क्या वामपंथी हमारे हिन्दू दलित भाइयों को उस राह में नहीं ले जा सकते थे?

जवाब यही है कि ले तो जा सकते थे लेकिन इनके बेरोजगार होने से, उस बेरोजगारी की आग में जल उठने से ही वामपंथी अपनी रोटियाँ नहीं, अपनी तंदूरी चिकन और बटर नान, AC में बैठकर सेंक सकते थे.

इनकी बेरोजगारी ही वामपंथियों के लिए रोजगार उपलब्ध कराती है. आज भले ही इनके नेताओं के झंडों का रंग लाल नहीं लेकिन भाषा वामियों से अलग नहीं, दोनों सगोत्र हैं.

कोई बात नहीं, समस्या आज हमारी है, हमारी आनेवाली पीढ़ियों की है. यही देखना होगा कि इन व्यवसायों में इनको सम्मान से पुनर्स्थापित कैसे किया जाये, इनको सम्पन्न कैसे बनाया जाये.

यहाँ खादी का उदाहरण प्रासंगिक होगा. मिल के कपड़े के बनिस्बत खादी का कोई मुक़ाबला नहीं, लेकिन हम जानते हैं कि देश ने इसे क्यों अपनाया था. ऐसे ही हमे हमारे भाइयों को सक्षम करना होगा.

संपन्नता में कमाया हिस्सा हमेशा अधिक सम्मान का होता है, दूसरों से लूट को वाम और इस्लाम की विचारधाराएँ ही सम्मान देती हैं. लूट का ठोस प्रतिकार किया जाये तो अपने आप मेहनत की तरफ पाँव बढ़ते हैं जब उसको सम्मान के साथ धन भी मिलता दिखता है.

भारत की स्वतन्त्रता बनाए रखना भी एक संघर्ष ही है और जब तक वाम और इस्लाम रहेंगे, इस संघर्ष में जन सहयोग जरूरी रहेगा. इस वाक्य से किसी को आपत्ति है तो अपनी बात साबित करना मेरे लिए खुशी की बात होगी.

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