झिंगालाला तो होगा ही होगा

तो हुआ यूँ कि पुराने ज़माने में हवाई जहाज़ तो होते नहीं थे. आमतौर पर लोग पानी के जहाज़ से सफ़र करते थे. ऐसे ही एक बार दूर देश में कमाने के उद्देश्य से, गरीबी मुफलिसी से परेशान, सलीम-जावेद भी पानी के जहाज से रवाना हुए.

रास्ते में तूफ़ान आया, जहाज़ डगमगाने लगा और अंत में जहाज़ का कप्तान बोला, भाई जिसे जान बचानी हो कूद कर बचा ले, जहाज़ के बचने की तो संभावना नहीं रही.

सलीम-जावेद दोनों भी समंदर में कूद पड़े, जैसे-तैसे ट्यूब में लटके रहे और सुबह होते-होते डूबते-उतराते एक साथ किसी किनारे पहुंचे.

बुरी किस्मत ने मगर यहाँ भी साथ नहीं छोड़ा. वो द्वीप कुछ आततायी किस्म के आदिवासियों का था जिन्हें अनजान लोगों का द्वीप पर आना बिलकुल पसंद नहीं आया. तो आदिवासियों ने दोनों को बाँधा और अपने सरदार के पास हाजिर किया.

सरदार विदेशियों को देख कर कड़क कर बोला, फ़ौरन तय करो, हमारे द्वीप पर बिना इजाज़त घुस आये लोगों को दो ही सजाएँ दी जा सकती हैं, झिंगालाला या मृत्युदंड! खुद दोनों में से एक चुन लो.

जावेद सोच ही रहा था कि क्या चुनें, इतने में सलीम बोल पड़ा, हुज़ूर मैं अभी मरना नहीं चाहता! मुझे झिंगालाला ही दे दो.

बस सरदार ने इशारा किया और सलीम को कोने में खींच कर एक लम्बा तगड़ा काला हब्शी उस पर टूट पड़ा!

अब जो जावेद ने देखा झिंगालाला… तो उसके तो होश ही उड़ गए! इसपर तो सख्त मजहबी पाबन्दी भी थी.

उसे मौत गवारा थी मगर ये नहीं तो वो बोला सरदार ये तो चलेगा नहीं. आप मुझे मृत्युदंड दे दो!

सरदार मुस्कुराया, बाकियों को इशारा किया, इसके साथ तब तक झिंगालाला हो जब तक ये मर नहीं जाता. ले मृत्युदंड!

तो पाला बदलने वाले जो राष्ट्रवादी थे वो अपनी आईडी डीएक्टिवेट कर लें. घर वापसी की कोशिश के ख़ास लाभ नहीं होने वाले. क्योंकि झिंगालाला तो होगा!

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