किसी को भी जलील करने लग जाएं, लेखक होने का इतना मुगालता भी मत पालिये

  • आशीष प्रधान

    एक बार फेसबुक पर एक मोहल्ले में बहुत भीड़ जमा थी, देखा कि एक नवजात लेखक महोदय बुक्का फाड़ रोये जा रहे थे….

    पूछा- क्या हुआ भाई, क्यों रोये जा रहे हो…?

    बोले- “अरे देखते नहीं, हमाई पोस्ट चोरी है गयी ए…?”

    हम बोले तो क्या हुआ जो चोरी हो गयी, इसे चोरी होना क्यों समझते हो, अरे इसे तो एक कॉम्पलिमेंट समझो, पोस्ट चोरी नहीं हुई, बस आगे बढ़ गयी है….

    “अरे, बेवकूफ हो का, जानते नहीं हम कौन हैं…?”

    कौन हो भाई…?

    “हम फेसबुक के उभरते हुए सितारे हैं, बड़े बड़े दिग्गज फेसबुकिया लेखक हमारी पीठ ठोक चुके हैं, रोजाना पांच सौ लाइक कमाते हैं हम… और आज तो हमाई पोस्ट चोरी भई है, कल को तुम्हाई भी हो सकती है, आओ हमाओ साथ दो… लिक्खाड़ एकता संघ जिंदाबाद…”

    वे ताव खा रहे थे और उनसे ज्यादा उनके चेले चपाटे ताव खा रहे थे, यों कर देंगे त्यों कर दंगे, खोद देंगे फोड़ देंगे….. हिम्मत कैसे हुई हमाये गुरु की पोस्ट चुराने की…. कुछ लौंडे उस निरीह गरीब को मेंशन कर रहे थे, आ जा बे ससुरे…

    और लेखक महोदय पूरे बगदादी हो रहे थे, चेलों के जिहाद पे लाइक देकर उनकी हौसला अफ़ज़ाई कर रहे थे, पूरी पोस्ट सीरिया-इराक बनी हुई थी और उनके चेले, काफ़िरों (कॉपी पेस्टियों) का गला काटने को बेताब हो रहे थे…..

    इसी प्रकार पिछले साल एक मिशुर जी मिले थे, बलिया वाले….. फेसबुक पर स्क्रीन शॉट का मजमा लगा कर अपने चेले चपाटों के साथ किसी को कोस कलप रहे थे, हाय हमाई पोस्ट कॉपी कल्लई, (उनकी पोस्ट किसी ने कॉपी कर उन्हें ही पेल दी) अब हम क्या करेंगे, हम जियेंगे नहीं कतई मज्जान्गे….

    मिशुर जी अपनी एकएक पोस्ट पर हज़ार-दो हज़ार लाइक बटोरते हैं, अब जो पोस्ट चुरा के भागा था, कॉपी पेस्ट करने के बावजूद अपनी किसी भी पोस्ट पर 100 लाइक से ऊपर नहीं गया, फिर भी मिशुर जी टेंशनिया के हुआं हुआंई मचाये हुए थे, वही दरद जो औरों को होते थे, हाय हमाई पोस्ट कॉपी कल्लई…… (जो मुझे लगा)

    दअरसल मिशुर जी को असली दिक्कत पोस्ट के कॉपी होने से नहीं उस गरीब के सौ-पचास लाइक से थी, कि ये साले हमाई झोली (पोस्ट पे) में क्यों नहीं आये….. यहां भी मिशुर जी के लौंडे लपाड़े उस गरीब कॉपीकार को मेंशन कर के जलील करने में लगे थे और मिशुर जी, बलिया वाले उनकी बलइयाँ लेने में मस्त थे………

    कॉपी पेस्ट करना कोई मानसिक बीमारी नहीं है, ये तो सोशल मीडिया में एक तरह का चलन है, बल्कि ये तो एक तरह का कॉम्पलिमेंट है आपके लिए, कि आपकी लिखी कोई पोस्ट वायरल हो रही है…. लोग आपके विचारों को ज्यादा से ज्यादा पढ़ रहे हैं, जान रहे हैं, समझ रहे हैं.

    फिर क्या फर्क पड़ता है कि आपकी कोई पोस्ट कॉपी हो गयी या आपका नाम कहीं साभार न हुआ हो…. आप आखिर फेसबुक पर आये क्यों थे, अपने विचार बांटने फैलाने न…. तो क्या हो गया जो किसी ने आपकी कोई पोस्ट धर ली तो…?

    अगर आप किस्से कहानियां, कविता, गज़ल या शेरो शायरियां लिखते हैं तो आप यहां क्यों हैं…? किसी अखबार या पत्रिका में क्यों नहीं हैं, कोई किताब क्यों नहीं लिखते…? वहां आपको हाथों हाथ लिया जाएगा, सर आँखों पर बिठाया जाएगा, नाम और दाम दोनों होगा…

    पर अगर आप फेसबुक पर लिख रहे हैं तो आपका अपने लिखे पर भी कोई कॉपीराईट नहीं बनता, फिर होंगे आप कोई लिक्खड़ खां, पर इस आभासी दुनिया में आपकी औकात दो कौड़ी की भी नहीं है….. लिखना बन्द कर दें तो दो महीने में ही लोग यहाँ भूलने लगते हैं…..

    तो फिर क्या हुआ जो आपकी लिखी पोस्ट किसी ने चुरा ली, क्या हुआ जो कॉपी कर ली, पेस्ट कर के साभार में आपका नाम न दिया…. आप कौन से मुंशी प्रेमचंद के खानदान से हो जो आपकी पोस्ट कोई ले भागा तो आप साहित्य अकादमी से चूक जाओगे.

    करोगे क्या साहित्य अकादमी लेकर, वैसे भी आज कल ये लेने की कम, तमाशा बनाने की चीज ज्यादा हो गयी है… नामचीन होना है तो फिर ये मंच आपके लिए नहीं है…. इसलिए सबसे बड़ी बात यह है कि विचार जितना फैलें उतना अच्छा, लिखकर या कॉपी पेस्ट कर के क्या फर्क पड़ता है……

    एक पहचान के संपादक महोदय ने एक बार मुझसे कहा, कुछ राजनीतिक, सामाजिक या समसामयिक लिख दो हमारे अखबार के लिए.

    मैंने दो दिन बाद लिख कर भेज दिया… उन्होंने मुझे फोन किया, बोले… ये क्या लिखकर भेजा है..? एक-दमइ खुल्ला लिख दिया इस्लामिक आतंकवाद पर, अरे भाई मेरा अखबार बन्द कराओगे क्या..?

    मैंने कहा, क्यों ठीक नहीं है क्या, कुछ गलत लिखा क्या, कोई तथ्य गलत हो तो बताओ…?

    वो बोले – नहीं ठीक लिखा है पर ऐसे सीधे नहीं छाप सकते न, कुछ हल्का कर के दो….

    मैंने सच्चाई को हल्का किया नहीं, उन्होंने भारी सच्चाई को छापा नहीं, शायद उनके अखबार के पन्ने बहुत पतले थे, इतना वजन सह नहीं पाते…. उस दिन के बाद उन्होंने मुझसे कुछ न मांगा और न मैंने भेजा…..

    अगर आप राष्ट्रवाद, इस्लामिक कट्टरता और आतंकवाद पर खुलकर लिखते हैं तो प्रिंट मीडिया में आपके लिए कोई जगह नहीं है, वहां ऐसा कुछ नहीं चलता, वहां छद्म सेक्युलरिज्म की चाशनी में शब्दों को डुबा डुबा के लिखना पड़ता है, ख़याल रखना पड़ता है कि कहीं किसी की भावनाएं आहत न हो जाए वरना अख़बारों के दफ्तर तक जला दिए जाते है…..

    आप फेसबुक पर इसलिये ही तो हैं कि प्रिंट मीडिया में खुलकर जो नहीं लिख सकते, वो सोशल मीडिया में लिख सकते हैं और सोशल मीडिया में (जैसा कि आप जानते ही होंगे) कॉपीराईट नहीं चलता तो फिर ये हाहाकारी रोना धोना क्यों…?

    यहाँ आपका कुछ भी नहीं, सब दूसरों का है क्योंकि आप लिख भी औरों के लिए रहे हैं, लेखक होने का इतना मुगालता भी मत पालिये कि हज़ार-पांच सौ लाइक पाकर आप मद में चूर किसी को भी जलील करने लग जाएं…

    लिखना नींव के पत्थरों सा होना चाहिए, कंगूरों सा नहीं….

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