क्योंकि बहुत फर्क है ‘प्रेम’ होना और प्रेम ‘होना’ में…

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मेरे किसी भी एक वाक्य का अर्थ एक सांस जितना छोटा हो सकता है, और एक ज़िंदगी जितना लंबा भी… ये पढ़ने वाले पर निर्भर करता है… कि वो उसका अर्थ एक ज़िंदगी की तरह लेते हैं या उस एक ज़िंदगी जितने गहरे अर्थों को केवल एक सांस में समेट लेते हैं..

उसने भी मेरा एक लाइन का वाक्य पढ़ा – बहुत फर्क है ‘प्रेम’ होना और प्रेम ‘होना’ में….

पूछने लगी प्रेम हो जाने के बाद भी अफेयर्स, आकर्षण, मोह होते रहे तो?

मैंने कहा  – तो? मानव स्वभाव है…. अफेयर्स, आकर्षण, मोह होते रहते हैं… होते रहना चाहिए वरना आपके इकलौते प्यार का पौधा सूख जाएगा…

उसने पढ़ा और मेरे पास एक छोटा- सा बक्सा लेकर आई… मैं उस बक्से को फेसबुक का इनबॉक्स कहती हूँ… उसकी बातों के बक्से में चेन लगी हुई थी… बहुत दिनों से खोली नहीं थी तो जंग लग गयी थी चेन में.. लोग कहते हैं मैं बहुत चिकनी चुपड़ी बातें करती हूँ… तो बस उस चिकनी चुपड़ी बातों में आकर उसने अपनी बातों की जंग लगी चेन खोल दी…

ये क्या! चेन खुलते ही उसमें से रंग-बिरंगी तितलियाँ उड़कर बाहर आने लगी…. फूलों की मादक खुशबूओं के संग लहराती बलखाती नदी… एक उछलती कूदती हिरनी और अपनी ही देह पर आत्म मुग्ध नायिका… नाम भी उसी के जैसा… मृदुला.

मृदुला ने जब देखा चेन खुलते ही उसके अकेलेपन के सारे रहस्य निकलकर ऐसे उड़े आ रहे हैं जैसे मैंने उनको उनका आसमान दिखा दिया हो… उसने झट से बातों की चेन फिर बंद कर दी… “आपने ये क्या किया… मैं ये सब दिखाना नहीं चाहती थी आपको…. हाँ कुछ तितलियाँ हैं मेरे अन्दर उमंगों की, जिसे मैंने बहुत कोमलता से सहेज रखा है कि कहीं उसके पंख न टूट जाए…. मेरे सपनों के फूलों की खुशबू से मैं दिन भर सराबोर रहती हूँ… और रात होते ही अपने तकिये के नीचे छुपाकर रख देती हूँ…

फिर न जाने कैसे मेरे सपनों को पता चल जाता है और मेरे ही सपने से निकलकर कोई तकिये के नीचे से खुशबू चुरा ले जाता है… उसे वापस पाने के लिए मैं हिरनी सी उसके पीछे दौड़ पड़ती हूँ लेकिन कई बार वो मेरे सपनों से बाहर आकर मेरे सामने साक्षात खड़ा हो जाता है… मैं रोक नहीं पाती खुद को सपने की आगोश में जाने से…

फिर अचानक मेरे सपने पर ठोस यथार्थ का पैर पड़ता है और वो कच्चे कांच की तरह टूटकर बिस्तर पर बिखर जाते हैं… पीठ में चुभती सपनों की खुरचनों के दर्द के साथ जीना क्या होता है आप क्या जानों…”

मैं मुस्कुराती रही…. मुझसे कहती है आप क्या जानों…. मेरे लिखे एक वाक्य में अपनी पूरी ज़िंदगी का अर्थ निकाल लिया और मुझसे कहती है आप पता नहीं समझ पाओगी या नहीं…

जिन राहों से गुज़र कर आई हूँ उसी का पता तो देती फिर रही हूँ…
सपने पलकों पर सबसे ऊपर मिलेंगे…
प्यार दिल में सबसे नीचे…
दर्द धड़कनों में बसा है, मर्ज़ दिमाग की नसों में…
गुस्सा भौंहों के बीच, सम्मान अपनों के बीच…
ये अपने बेगानों के बीच, और बेगाने हर जगह संस्कारों का झंडा गड़ाए खड़े मिलेंगे और उसकी अगुआई करता हुआ मिलेगा तुम्हारा ही कोई बहुत अपना… अक्सर किसी पुरुष का रूप धारण किए हुए होते हैं ये संस्कार … कभी भाई, कभी पिता, कभी दोस्त, प्रेमी और हाँ सबसे महत्वपूर्ण… पति के रूप में…

“लेकिन वो हमारा भला ही तो चाहते हैं ना?” – उसका सवाल.

यदि भला चाहते हैं तो रहो ना भलाई से… शिकायत क्यों है कि जी तो रहे हैं उनके साथ लेकिन उनकी शर्तों पर, उनकी दी हुई गाइड लाइन पर चलते हुए… जैसे भगवान ने उन्हें समझदार बनाकर इस धरती पर अवतरित किया है और हम सब मूर्ख औरते हैं… जिनका उन समझदार मर्दों के बिना बेड़ा पार नहीं हो सकता…

फिर अपना ही लिखा पढ़वाया उसे –

आपने कभी दिन और रात को आपस में अपने अपने अस्तित्व के लिए लड़ते देखा है? दिन जब पूरी तरह थक कर सो जाता है तो रात जागती रहती है… और रातभर जागकर दिन को सुलाए रखने के बाद सुबह की पहली किरण के साथ दिन की आगोश में छुप जाती है….

दिन के पास सूरज का गर्म उजाला है तो रात के पास ठंडी सी पुरवाई, जहां न जाने कितने रहस्य अँधेरे में मुंह छुपाये पड़े रहते हैं, जिसको खोजते हुए दिन चला आता है……..

औरत और मर्द का रिश्ता भी बिलकुल वैसा ही है एक के बिना दूजे का कोई अस्तित्व नहीं… लेकिन इंसान और प्रकृति में यही तो अंतर है …. दोनों के पास अपनी अपनी भाषा है अपने अस्तित्व को परिभाषित करने के लिए…

हमने एक भाषा तो सीख ली है जिससे हम एक दूसरे पर आक्षेप लगाते हुए अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते रहते हैं… जिस दिन हम प्रकृति की भाषा सीख जाएंगे उस दिन नारीवादी सवाल और बवाल नहीं खड़े करने होंगे, ना महिलाओं को, ना उसके जवाब में मर्दों को…

जिस दिन हम प्रकृति की भाषा सीख जाएंगे उस दिन तुम दिन की तरह मुझे जीवनदायी उजाला देना और मैं तुम्हारे सामने रात की तरह सारे रहस्य खोल कर रख दूंगी….

उसने पूछा – रहस्य? मेरे पास तो कोई रहस्य नहीं…

मैंने पूछा कृष्ण कि पत्नी तो रुक्मणी थी, फिर राधा और मीरा को कृष्ण के नाम के साथ क्यों जोड़ा गया वो भी हमारे सनातन धर्म में? इस रहस्य को एक औरत से अधिक कौन समझ पाएगा…

जानती हो ये वामपंथी किस बात पर हमसे बहस में जीत जाते हैं, क्यों हर बार शुरू हो जाता है उनका नारी सशक्तिकरण का ड्रामा. उनका कहना है कृष्ण तो रुक्मणी, राधा, मीरा, कुब्जा और बाकी सारी गोपियों के साथ एक साथ उपस्थित है, लेकिन हमारे धर्म ग्रंथों में ऐसी कोई नायिका नहीं…

मुझसे पूछा है तो आज मैं कहती हूँ – रुक्मणी होते हुए भी, राधा तत्व और मीरा तत्व के साथ जीवन को प्रेम से भरा जा सकता है… लेकिन मैं जानती हूँ जिस कृष्ण तत्व को तुम खोज रही हो वो तुम्हें पति में नहीं मिलता.

लेकिन कृष्ण तत्व को वहां अवतरित होना ही होता है जहां राधा तत्व का उद्गम हुआ हो. राधा हो जाओगी तो पति को समझा पाओगी कि मैं किसी गैर मर्द से प्यार नहीं करती मैं उस कृष्ण तत्व से प्रेम करती हूँ जो पूरी 16 कलाओं में पूर्ण है… और इस युग में वो 16 कलाएं एक पुरुष में नहीं मिलती. इसका मतलब ये कतई नहीं है कि मैं उसे 16 मर्दों में खोज रही हूँ, लेकिन प्रेम द्वि-आयामी नहीं, बहुआयामी होता है. जिस ओर ये कृष्ण तत्व मिल जाए उसे निहारो, स्वीकारो और उसे सपनों में भरकर आसमान में उड़ने दो.

अपने संग अपने जीवन साथी को भी उन रंग बिरंगी तितलियों का दीदार करवाओ जो तुम्हारे सपनों को रंगीन कर देती हैं लेकिन हकीक़त के धरातल पर केवल श्वेत और श्याम दो ही रंग दीखते हैं.

अपने अन्दर छुपी प्रेमिका को बाहर आने देना है तो पति को भी प्रेमी हो जाने का मौका दो… क्योंकि अफेयर्स, आकर्षण, मोह होते रहते हैं… होते रहना चाहिए वरना आपके इकलौते प्यार का पौधा सूख जाएगा…

लेकिन ये सब तभी हो सकेगा जब खुद को इस अपराध बोध से मुक्त करोगी कि पति के अलावा किसी और मर्द का ख़याल तक आ जाना पाप है. ये पाप नहीं प्रकृति है. यदि ख़याल नहीं आता है तो चिंता वाली बात होगी. तब ये सोचना कहीं तुम्हारा इकलौता प्रेम सड़ तो नहीं गया है.

क्योंकि बहुत फर्क है ‘प्रेम’ होना और प्रेम ‘होना’ में…

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